चैनलों में मुद्दों की कमी

चैनलों में मुद्दों की कमी
Mohammad Anas के फेसबुक वाल से। हिंदी के चैनलों पर दिन भर आईएसआईएस की ख़बरें चलती हैं। मैं पिछले एक हफ्ते से टॉप फाइव टीआरपी चैनलों पर उन न्यूज़ को फॉलो कर रहा हूं जो आईएसआईएस को लेकर भसड़ मचाए हुए हैं। ज्यादातर के पैकज़ों में एक जैसे विजुअल हर बार इस्तेमाल होते हैं।
वायस ओवर में एक ही तरह से सब डराते हैं। अच्छी बात है देश दुनिया की हर ख़बर से मीडिया वाले हमें अवगत कराते रहते हैं। लेकिन क्या वजह है कि म्यांमार में हो रहे मुस्लिम नरसंहार पर कोई ख़बर नहीं दिखाई जाती। क्या वजह है कि पूरा का पूरा देश रोहंगिया मुस्लिमों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देता है। क्या वजह है कि सोशल मीडिया के तथाकथित नास्तिक महात्मा बुद्ध और उनके अनुयायियों को उस तरह अपमानित नहीं कर रहे हैं जिस तरह वे तालीबान, अलकायदा की हरकतों पर भारतीय मुसलमानों को करते हैं। क्या वजह है कि बौद्ध धर्म के भीतर से म्यांमार में हो रही हिंसा पर कोई विरोध नहीं दर्ज़ करवा रहा है। क्या वजह है कि पिछले एक साल से अधिक गुजर जाने पर वैश्विक स्तर पर अमेरिका अथवा यूएन की नज़र बौद्धौं पर टेढ़ी नहीं हुई। क्या वजह है कि सारनाथ से लेकर लुंबिनी तक के बौद्ध सोशल मीडिया या फिर कहीं और खुद को बेकसूर साबित करते हुए नहीं दिखते जैसा दरभंगा से लेकर दम्माम तक के भारतीय और एनआरआई किसी भी आतंकी घटना पर खुद को पाक साफ बताने के लिए हैश टैग शुरू कर देते हैं। मैं लगातार कहता रहा हूं कि अपने मुद्दों को पहचानिए। उनकी शुरूआत कीजिए। उस पर खुद से विमर्श कीजिए। दूसरों की थोपी गई चीज़ों से मत घबराइए। उनको इग्नोर कीजिए। अपना काम कीजिए। मीडिया क्या कहती है कहने दीजिए। जब कोई आतंकवाद की बात करे तो आप भारत में हुए आतंकी वारदातों की लिस्ट पर चर्चा करें न कि विदेश भाग जाए । जब कोई आपको पाकिस्तान भेजने लगे तो आप पाकिस्तान को दस्तावेज़ मुहैया कराने वालों पर चर्चा शुरू कर दें जिनमें पांच फीसद भी मुसलमान नहीं हैं। जब कोई आपको कट्टर कहे तो आप आज़ादी के बाद से हुई उन सांप्रदायिक घटनाओं पर बहस करें जिनमें सिर्फ और सिर्फ आपको नुकसान हुआ है। विमर्श का रूप बदलिए। क्योंकि जो विमर्श आप पर थोपा गया है वह पूरी तरह से झूठा है। फासीवादी है। आपकी कहीं गलती नहीं फिर भी आप जवाबदेही देने लगेंगे? ये कहां की समझदारी है?  फलस्तीन जाने से पहले गुजरात को देख लें। म्यांमार जाने से पहले मुजफ्फरनगर को देख लें। और देखें की आप इन सबसे कैसे लड़ सकते हैं। संविधान ने असल में हमें जगह दी है। इन्हें नहीं। लोकतांत्रिक राष्ट्र के असल नागरिक हम हैं। ये दंगाई नहीं। तो आगे से और आज से कोई नास्तिक, कम्यूनिस्ट, मुस्लिम, संघी, लिबरल कोई भी देश की सरहद से पार होने वाली घटनाओं पर आपसे जवाब मांगे तो उसे इग्नोर कीजिएगा। वे असल में जवाब नहीं चाहते बल्कि आपको शर्मिंदा करना चाहते हैं। ताकि आप खुद की शक्ल आईने में देखने से कतराएं। ताकि आप मुसलमान होने पर शर्माएं। देश के भीतर कौन कितने ब्लॉस्ट कहां कर रहा है, कौन कितने दंगों में शामिल है वह तो आपको पता ही है। और वही लोग खुलेआम मंचों से पुरूस्कार बांटते हैं। वे स्वीकार हैं। क्योंकि वे उनके अपने हैं। आप जिस राजनीति के शिकार हैं। उसकी काट यही है। मुझे पढ़ने वाले लोग कम से कम इस बात को समझेंगे।

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