UPA ने 28 बार चैनल बैन किए थे, तब हल्ला नहीं मचा क्योंकि…

NDTV इंडिया. भारत का पहला चैनल, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के आरोप में सरकार ने एक दिन के लिए बैन करने का नोटिस भेजा. इस मसले पर बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार विपक्ष के निशाने पर है.

चैनल बैन के फैसले को ‘सत्तावादी’, ‘अघोषित आपातकाल’ और ‘अस्वीकार्य’ जैसी उपमाएं दी जा रही हैं. वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन हल्ला ज्यादा मचाया रहा है. यूपीए के समय से चैनलों का टेलिकास्ट रोका जाता रहा है. आइए देखें, किन चीजों पर हुज्जत हो रही है:

यूपीए ने 28 बार बैन किए चैनल

मौजूदा सरकार के पक्ष में सूचना-प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों की दलील है कि चैनलों के खिलाफ ऐसे एक्शन यूपीए के शासनकाल में भी लिए गए और यूपीए ने ही ऐसी कार्रवाइयों की नींव डाली थी. आंकड़े बताते हैं कि 2005 से 2013 के बीच 20 चैनलों को 28 बार ऑफ-एयर किया गया. ये बैन एक दिन से लेकर दो महीने तक के थे.

कब किस पर कितना बैन


 1. जनमत, 2007

2007 में न्यूज चैनल ‘जनमत TV’ का प्रसारण एक महीने के लिए रोक दिया गया था. वजह, एक फर्जी स्टिंग, जिसमें एक लेडी स्कूल टीचर को सेक्स रैकेट मामले में फंसाया गया था. टीचर का नाम उमा खुराना था और स्टिंग का दावा था कि वह स्कूली छात्राओं का सेक्स रैकेट चलाती हैं. खबर के बाद तुर्कमान गेट स्थित सरकारी स्कूल के बाहर जमकर हंगामा हुआ था. भीड़ ने उमा खुराना को जान से मारने की कोशिश की थी और उनके कपड़े फाड़ दिए थे. दबाव के बाद पुलिस ने उमा को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन छानबीन के बाद उमा को बेकसूर पाया गया.

जब ये स्टिंग चैनल पर चला, तब सुधीर चौधरी इसके सीईओ-संपादक थे. अब वो ज़ी न्यूज के एडिटर हैं और उन पर कोल स्कैम की खबर न दिखाने के एवज में जिंदल ग्रुप से 100 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगने का आरोप है. फिलहाल वो जमानत पर बाहर हैं.

2. फैशन टीवी, 2007, 2010, 2013

फैशन के ग्लोबल ट्रेंड्स दिखाने वाले FTV (फैशन टीवी) को 2007 से 2013 के बीच तीन बार ऑफ एयर किया गया. पहला बैन लगा दो महीने का, जब चैनल ने ‘मिडनाइट हॉट’ नाम का प्रोग्राम चलाया था. 2010 में चैनल ने टॉपलेस लड़कियों के विजुअल दिखाए, तो 9 दिनों का बैन लगा. 2013 में अडल्ट विजुअल्स दिखाने पर 10 दिनों का बैन लगाया गया.

3. महुआ टीवी, 2013

25 अप्रैल, 2013 को महुआ टीवी के खिलाफ एक दिन के बैन का आदेश जारी हुआ था, क्योंकि चैनल ने ‘ए’ सर्टिफिकेट वाली दो फिल्में ‘औलाद’ और ‘एक और कुरुक्षेत्र’ दिखा दी थीं.

4. AXN, 2013

25 अप्रैल, 2013 को ही AXN पर भी ‘ए’ सर्टिफिकेट वाली फिल्म ‘डार्कनेस फाल्स’ हिंदी में दिखाने की वजह से एक दिन का बैन लगाने का आदेश जारी हुआ था.

5. मूवीज ओके, 2013

1 मई, 2013 को मूवीज ओके चैनल के खिलाफ एक दिन के बैन का आदेश जारी हुआ था, क्योंकि इसने ‘ए सर्टिफिकेट’ वाली फिल्म ‘दिलजले’ दिखाई थी.

6. कॉमेडी सेंट्रल, 2013

17 मई, 2013 को कॉमेडी सेंट्रल चैनल के खिलाफ 10 दिनों के बैन का आदेश जारी हुआ था, क्योंकि इसने ‘स्टैंड अप क्लब’ प्रोग्राम दिखाया था.

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7. WB, 2014

16 जनवरी, 2014 को ‘WB’ चैनल के खिलाफ एक दिन के बैन का आदेश जारी हुआ था, क्योंकि इसने ‘V/UA’ सर्टिफिकेट वाली फिल्म ‘इट्स अ बॉय गर्ल थिंग’ दिखाई थी.


तब के और अब के बैन में फर्क है?

बैन तो पहले भी लगे हैं. कई चैनलों पर लगे हैं. फिर NDTV के बैन को ही क्यों ‘अघोषित आपातकाल’ कहा जा रहा है? क्यों बाकी चैनलों को बैन किया गया, तो ऐसी आवाज नहीं उठी, जैसी अब NDTV इंडिया के पक्ष में उठ रही है?

अव्वल तो ये कि इससे पिछली सरकार के समय में ‘जनमत टीवी’ को छोड़कर एक भी न्यूज चैनल को बैन नहीं किया गया. वे फिल्मों और मनोरंजन के दूसरे चैनल थे. ‘जनमत टीवी’ वाला केस बेहद लापरवाही भरा था और उसमें एक बेकसूर महिला को एक बेहद गंभीर और घिनौने अपराध में फंसाने की कोशिश की गई थी. ये एक संपादकीय भूल थी और सरकार ने इस पर बड़ा फैसला लिया.

यूपीए के लगाए लगभग सभी बैन अडल्ट और न्यूड कंटेंट दिखाने से जुड़े थे. ज्यादातर मामले केबल टीवी ब्रॉडकास्टिंग नियमों को तोड़ने के थे. लेकिन, सरकार ने NDTV इंडिया पर एक दिन के बैन की वजह ‘कूटनीतिक तौर पर संवेदनशील’ जानकारी के उद्घाटन को बताया है. 26/11 के मुंबई हमले के समय भी टीवी चैनलों पर ऐसे आरोप लगे थे, लेकिन उस वक्त किसी चैनल को नोटिस नहीं भेजा गया. हां, मनमोहन सरकार ने 2008 और 2009 में दो बार टीवी चैनलों को ‘एडवाइजरी’ जरूर भेजी थी.

इस एडवाइजरी में चैनलों से किसी भी एंटी-टेरर ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों की लोकेशन और मूवमेंट के बारे में रिपोर्टिंग न करने को कहा था. इस मसले पर एक अर्जी पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 अगस्त 2013 को एक जरूरी टिप्पणी की. कोर्ट ने मुंबई हमले के समय भारतीय टीवी चैनलों की कवरेज को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाला’ बताया और कहा कि इससे देश-समाज को कोई फायदा नहीं हुआ.

NDTV इंडिया ने पलटवार में कहा है कि पठानकोट हमले की हर न्यूज चैनल और अखबार ने ऐसी ही रिपोर्टिंग की थी और सरकार जान-बूझकर सिर्फ उन्हें निशाना बना रही है. वैसे मोदी सरकार 2015 में एक बैन और लगा चुकी है, लेकिन वो भारतीय चैनल नहीं था. कतर बेस्ड ‘अल जजीरा इंग्लिश’ का प्रसारण 5 दिनों के लिए रोक दिया गया था, क्योंकि उसने भारत का गलत नक्शा दिखाया था.

दूसरी और सबसे अहम बात ये है कि यूपीए के समय जो चैनल बैन किए गए, वो विरोध का नैतिक साहस ही नहीं जुटा सके. उन्होंने रचनात्मक प्रतिरोध की कोई कोशिश नहीं की, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग खुद को जोड़ सकें. एनडीटीवी के बैन की चर्चा पहले से हो रही थी, लेकिन शुक्रवार के ‘प्राइम टाइम’ शो के बाद ये अब और जोर-शोर से हो रही है. रवीश कुमार मूक अभिनय वाले दो कलाकारों को लेकर हाजिर हुए और इसे इस तरह पेश किया जैसे चैनल के सवालों से डरकर सरकार ने नोटिस भेजा है.

इसमें राजनीति नहीं है, कैसे मान लें?

NDTV के बारे में सामान्य परसेप्शन यही है कि उसका सत्ता विरोध जितना मोदी सरकार के समय मुखर है, उतना यूपीए के समय नहीं था. बहुत लोग इसे बहुत सरलीकृत करके भी लिखते हैं, लेकिन ये उड़ी-उड़ाई बात तो नहीं है. बीजेपी समर्थक ही नहीं, बीजेपी भी एनडीटीवी को पसंद नहीं करती है. रवीश के शो के बाद सरकार की तरफ से पहली प्रतिक्रिया सूचना प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू की तरफ से आई है. उन्होंने NDTV पर की गई सरकार की आलोचना को ‘गलत जानकारी’ और ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया है. इसीलिए बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार पर आरोप लग रहा है कि उसने राजनीतिक द्वेष के चलते सिर्फ एनडीटीवी को नोटिस भेजा, बाकी चैनलों को नहीं, क्योंकि वो एक मुर्गा हलाल करके बाकी मुर्गों की हालत परख लेना चाहती है.

लेकिन, चैनल ने शुक्रवार को अपने प्राइम टाइम शो में मूक अभिनय वाले कलाकारों के साथ विरोध प्रदर्शन का जो रचनात्मक तरीका अपनाया, उसकी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है. फिलहाल ये तय करना मुश्किल है कि फ्रंट फुट पर अब कौन है.

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