कारवां तो डॉक्टर साहब से था… अब तो सब गुबार है!

प्रभात रंजन दीन
डॉ. अखिलेश दास जी, यानि, अपने चेयरमैन साहब, अपने डॉक्टर साहब नहीं रहे… अभी-अभी तो थे, अचानक नहीं रहे. योद्धा तो ऐसे ही रहता है. रहता है तो लड़ता है, नहीं तो चल देता है. राजनीतिक जगत का योद्धा, व्यवसायिक जगत का योद्धा और सामाजिक जगत का योद्धा डॉ. अखिलेश दास अब अपने बीच नहीं है. डॉक्टर साहब के बारे में जितने लोग उतनी बातें, प्रशंसा की भी और निंदा की भी. यह अपना समाज है, इसे निंदा रस में अधिक आनंद आता है. जिस भी व्यक्ति में अपने परिवार के अलावा एक भी अतिरिक्त व्यक्ति का पेट लगातार भरने की क्षमता हो, उसे ही ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त व्यक्ति मान लिया जाता है. एक मेहमान कुछ दिन के लिए घर आ जाता है तो बजट आड़ा-तिरछा होने लगता है. …और जो व्यक्ति कई-कई परिवारों का पेट भरता रहा हो, हजारों-लाखों लोगों की आजीविका की व्यवस्था करता रहा हो, जिस एक व्यक्ति के बूते अनगिनत परिवार सम्मान के साथ समाज में जीवन व्यतीत करने में सक्षम होते रहे हों, उस व्यक्ति को आप सीधे सीधे देवदूत मान लें.

यह मैं पूरे आत्मिक बल से कह रहा हूं. कबीर पंथ के मूल गुरु संत विवेकदास आचार्य एक दिन मेरे घर पधारे थे. उन दिनों सहारा समूह के अभिभावक सुब्रत रॉय सहारा की गिरफ्तारी की चर्चा थी. स्वाभाविक है कि निंदा रस का आनंद सर्व समाज ले रहा था. आचार्य विवेकदास ने उस दिन कहा था कि जो व्यक्ति हजारों-लाखों लोगों की आजीविका चलाता हो, उनके पेट भरता हो, ऐसा व्यक्ति देवताओं का भेजा हुआ दूत होता है. मंदिरों, गुरुद्वारों और मठों में निरंतर चलने वाले लगंर की व्यवस्था इसीलिए रखी जाती है कि आगत के पेट भरना ईश्वर का सीधा निर्देश माना जाता है. पैसे कमा कर तिजोरी में बंद कर लेने वाले और पैसे कमा कर तिजोरी खोल देने वाले में फर्क करना और रखना, चैतन्य समाज की जिम्मेदारी है.

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और नहीं रहे हर दिल अजीज अखिलेश दास, दिल का दौरा पड़ने से निधन

डॉक्टर साहब की स्मृति में मैं कुछ और कहने जा रहा था, कहीं और चला गया. अब उस पर लौटता हूं. जनसत्ता एक्सप्रेस और इंडियन एक्सप्रेस की लखनऊ में लॉचिंग हो रही थी. मैं तब हिंदुस्तान का चीफ रिपोर्टर हुआ करता था. मेरे पास जनसत्ता एक्सप्रेस के समन्वय संपादक का प्रस्ताव आया था. एडिटर इन चीफ घनश्याम पंकज जी के साथ मेरा साक्षात्कार भी हो गया था. तभी पता चला था कि जनसत्ता एक्सप्रेस और इंडियन एक्सप्रेस दोनों अखबारों की फ्रेंचाइजी डॉ. अखिलेश दास ले रहे हैं. डॉक्टर साहब ही दोनों संस्करणों के चेयरमैन होंगे. अभी मैंने नया अखबार ज्वाइन नहीं किया था, उन्हीं दिनों मेरे पास एक फोन आया, उधर से आवाज आई, ‘मैं अखिलेश दास बोल रहा हूं.’ मेरे नमस्कार के बीच में ही डॉक्टर साहब बोल पड़े, ‘प्रभात जी, मुलायम सिंह तो आपकी नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं. कह रहे हैं कि वह तो किसी की नहीं सुनता है और कौशल-वौशल उसका दोस्त है.’ मेरा डॉक्टर अखिलेश दास से वह पहला साबका था. मैंने डॉक्टर साहब से पूछा कि इंडियन एक्सप्रेस के चेयरमैन आप हैं या मुलायम? डॉक्टर साहब थोड़ा संभले, फिर बोले कि मुलायम आपका विरोध क्यों कर रहे हैं? मैंने उनसे विनम्र प्रति-प्रश्न किया, ‘आप मुलायम से पूछ क्यों रहे हैं?’ डॉक्टर साहब ने फिर इस प्रसंग को टाला लेकिन मैंने अपनी बात पूरी की. मैंने उनसे कहा कि मैं मुलायम का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे कौशल जैसे सड़कछाप धूल-धक्कड़ में स्कूटर पर घूम-घूम कर दलितों-शोषितों के लिए संघर्ष करने वाले व्यक्ति का दोस्त बताया. मैं तो मर ही जाता जब वे मुझे किसी धन्ना सेठ या किसी घुन्ना नेता का दोस्त बताते. मुलायम ने मेरा विरोध करके तो मेरे फूहड़-फक्कड़पने पर मुहर लगा दी है. मैं किसी की नहीं सुनता, यह तो मेरा पत्रकारीय अनुशासन और नैतिकता है. मेरा यह संवाद पूरा होते-होते डॉक्टर साहब ने कहा था, ‘प्रभात जी, आपके इंटरव्यू में मैं शरीक नहीं हो पाया था. आपसे बात करने का मन था. बात हो गई. मुझे संपादक ही चाहिए और आप ही जैसा संपादक चाहिए.’ उन्होंने मेरे ज्वाइन करने के पहले ही बधाई दी थी और यह भी कहा था कि नेताजी (मुलायम) का नाम ऑफ-रिकॉर्ड रखिएगा. अब डॉक्टर साहब ही नहीं रहे तो क्या ऑफ-रिकॉर्ड और क्या ऑन-रिकॉर्ड, लेकिन इतना कहूंगा कि मैं जब तक जनसत्ता का संपादक रहा, डॉक्टर साहब ने मेरी उस बात का पूरा सम्मान रखा… कि मैं किसी की नहीं सुनता.
इसी से एक प्रसंग जुड़ता है. अचानक रात में एक बजे अपने कलीग जावेद काजिम भागे आए, फोन लिए हुए थे, धीरे से बोले, ‘बॉस का फोन है.’ उधर से डॉक्टर साहब एक खबर का संदर्भ लेते हुए बोले कि क्या वह खबर जा रही है? मैंने उनसे कहा, ‘हां जा रही है’. उन्होंने पूछा, ‘किस पेज पर ले रहे हैं?’ मैंने उन्हें बताया, ‘सर, पहले पेज पर ले रहा हूं.’ डॉक्टर साहब ने आदेशात्मक लहजे में कहा, ‘प्रभात जी वह खबर ड्रॉप कर दीजिए.’ मैंने डॉक्टर साहब से माफी मांगी और कहा, ‘सर वह खबर मेरे संपादक रहते हुए ड्रॉप नहीं हो सकती, आप कृपया इसके लिए आदेश न दें. सामाजिक दायित्व के तहत उस खबर का छपना जरूरी है, इससे अखबार का सम्मान बढ़ेगा, कम नहीं होगा.’ इस पर डॉक्टर साहब थोड़ा नरम पड़े, बोले, ‘उसे कहीं अंदर ले लीजिए, आप समझते नहीं हैं, उसके लिए मुझ पर शेखर गुप्ता (इंडियन एक्सप्रेस समूह के चीफ एडिटर) और कई बड़े-बड़े लोगों का दबाव है.’ मैंने कहा, ‘सर, मैं उसे अंडरप्ले कर दूंगा, लेकिन उसे पहले पेज से अंदर ले जाने के लिए न कहें.’ डॉक्टर साहब ने निहायत ही सादगी और सरलता से कहा था, ‘प्रभात जी, मैं अखबार का आदमी नहीं हूं. आप देख लीजिएगा. मैं ऐसा कोई आदेश नहीं दूंगा कि आप ही न रहें.’ डॉक्टर साहब की वह बातें आज उनके पार्थिव शरीर के पास खड़े हुए बेसाख्ता याद आ रही थीं. वह खबर छपी थी. पहले पेज पर छपी थी. हां, डॉक्टर साहब की बात का सम्मान करते हुए वह खबर सिंगल कॉलम में छपी, लेकिन पहले पेज पर ही छपी. अगले दिन जब उस खबर के छपने के बाद सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में जनसत्ता अखबार की धूम मची, तब डॉक्टर साहब को मेरे उस पत्रकारीय-हठ की सार्थक वजह समझ में आई. इसे उन्होंने अभिव्यक्त भी किया था. ऐसे कई प्रसंग हैं. क्या-क्या कहूं. कभी भी डॉक्टर साहब ने अखबार के एडिटोरियल विभाग के सम्मान पर अपना स्वामित्व नहीं थोपा, बल्कि उसे हमेशा स्थापित करने की ही कोशिश करते रहे. इन्हीं कोशिशों में डॉक्टर साहब ने मुझे जनसत्ता एक्सप्रेस और इंडियन एक्सप्रेस दोनों का ज्वाइंट न्यूज़ कोऑर्डिनेटर भी बनाया था और मैं जनसत्ता का स्थानीय संपादक होते हुए भी दोनों अखबारों का दायित्व संभालता रहा.
एडिटर इन चीफ घनश्याम पंकज जी संस्था से चले गए थे और मैं ही प्रभार संभाल रहा था. डॉक्टर साहब ने एक प्रबंधक रख लिया. उस प्रबंधक की योग्यता सिर्फ इतनी थी कि वह चिकोटी काटने को ही प्रबंधकीय क्षमता समझता था. शाम को पांच बजे जो वाहन मुझे दफ्तर ले जाने के लिए आता था, उसे जानबूझ कर देर कर देना, या उसी समय किसी दूसरे काम पर गाड़ी लगा देना जैसी हरकतें होती थीं उसकी. उसने अखबार के काम-काज में भी झांकने की कोशिश कर दी, तब मैंने डॉक्टर साहब को फोन करके बता दिया कि अब अखबार में काम करने लायक माहौल नहीं रहा. मैं देर रात (तकनीकी तौर पर तड़के) ढाई-तीन बजे के बाद ही दफ्तर से घर लौटता था. अखबार छपने के बाद उसे दुरुस्त देखने के बाद ही घर लौटना सुकून देता था. उस दिन सुबह करीब आठ बजे ही डॉक्टर साहब का एक कारिंदा घर पर एक लिफाफा पकड़ा गया. मुझे लगा अखबार में कोई ब्लंडर छप गया, कि सुबह-सुबह शो-कॉज नोटिस आ गई. मैं अखबार में गलती ढूंढ़ने लगा. पत्नी ने कहा कि पहले लिफाफा तो देख लो आखिर क्या है उसमें. मैंने लिफाफा खोला, उसमें मेरे नाम से एक लाख रुपये का एक चेक रखा था. मुझे समझ में ही नहीं आया कि यह चेक किसे देना है, उसका क्या करना है. मैंने फौरन ही पुराने किले (तब डॉक्टर साहब वहीं रहते थे) पर फोन किया. नेगी जी ने बताया कि डॉक्टर साहब अभी ही दिल्ली जाने वाले हैं. जरूरी बात करने के आग्रह पर डॉक्टर साहब फोन पर आए. मैंने उनसे चेक के बारे में पूछा कि इसका क्या करना है? डॉक्टर साहब के झल्लाने जैसी आवाज आई, ‘अरे भाई, वो आपके लिए है, मुझे दिल्ली जाना है’, और उन्होंने फोन रख दिया. मैंने फौरन जींस चढ़ाई और स्कूटर से आनन-फानन पुराने किले पर हाजिर हो गया. डॉक्टर साहब का काफिला नीचे तैयार था. वे नीचे उतरे. गाड़ी पर सवार होते उसके पहले उनकी निगाह मेरे ऊपर गई. मैं चेक लिए उनके पास गया और फिर से पूछा कि इस चेक का क्या करना है? डॉक्टर साहब ने कहा, ‘आप भी विचित्र आदमी हैं.’ फिर उन्होंने संदीप जैन को आवाज लगाई. संदीप चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. डॉक्टर साहब ने संदीप से कहा कि एक लाख रुपये का चेक लेकर प्रभात जी के लिए एक कार खरीदो. कार की किस्त कंपनी भरेगी, लेकिन कार प्रभात जी के नाम पर होगी. मैंने डॉक्टर साहब से कहा, ‘सर, इस चेक को मैं गिफ्ट समझ कर रख रहा हूं, यह जीवनभर मेरे साथ रहेगा.’ डॉक्टर साहब ने स्नेह से मेरे कंधे पर हाथ रखा और दिल्ली के लिए रवाना हो गए. मैं भी चेक लेकर घर आया. उसकी एक फोटो कॉपी कराई और पत्नी को दे दिया कि इसे सुरक्षित रख लो अपने जीवन के एलबम में.
इस्तीफा देने के बाद मैं दिल्ली गया. लोधी रोड स्थित डॉ. अखिलेश दास के आवास पर उनसे मुलाकात हुई. वे मेरे इस्तीफे से दुखी थे. मैंने वही एक लाख रुपये वाला बियरर चेक जेब से निकाला और टेबुल पर रख दिया. डॉक्टर साहब से उसे कैंसिल कर वापस रख लेने का आग्रह किया. डॉक्टर साहब दुखी भी दिखे और आश्चर्यचकित भी. उनके मुंह से निकला, ‘प्रभात जी, ये क्या बात हुई, ये तो कोई बात नहीं हुई.’ मैंने डॉक्टर साहब से माफी मांगी. मैंने उनसे कहा, ‘सर मैं शिक्षक माता-पिता की संतान हूं. सामान्य मध्य वर्गीय परिवार से आता हूं. मैंने अपने जीवन में कभी एक लाख रुपये का चेक नहीं देखा. आपके इस चेक को मैंने आत्मिक रूप से स्वीकार कर लिया है, भले ही भौतिक रूप से स्वीकार नहीं कर रहा. ऐसा करके मैं एक आत्मिक संदेश आप तक पहुंचाना चाहता हूं. मेरा आपके प्रति प्रेम, आपके प्रति सम्मान और अखबार के प्रति मेरी प्रतिबद्धता, इसे यह अतिरिक्त धन तय नहीं करता. मेरा वेतन और आपके द्वारा सुरक्षित रखा गया मेरा पत्रकारीय-सम्मान मेरे लिए बेशकीमती है. मैं उसे अपने साथ संजो कर रखूंगा.’ मुझे याद है, डॉक्टर साहब ने हरे पेन से उस चेक पर कैंसिल लिखा, उसे अपने ड्रॉअर में डाला, भावुकता से मेरा हाथ पकड़ा, ढेर सारी शुभकामनाएं दीं, पैदल चलते हुए लॉन पार कर मुझे मुख्य दरवाजे तक छोड़ने आए, सब कर्मचारी हैरत में थे कि दाढ़ी वाले बेतरतीब जैसे व्यक्ति को छोड़ने के लिए डॉक्टर साहब गेट तक आए. डॉक्टर साहब ने मुझसे पूछा कि कैसे जाएंगे. मैंने इशारा किया बाहर ऑटो वाला खड़ा था. डॉक्टर साहब की छोटी आंखें उस दिन बड़ी-बड़ी दिख रही थीं, भावुकता और स्नेह से भरी हुईं… वह दिन भूलता नहीं. ऐसे थे डॉक्टर अखिलेश दास, अपने चेयरमैन साहब, अपने डॉक्टर साहब… सादर, प्रभात रंजन दीन

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