कुछ यूं याद किया यूपी के नए डीजीपी को दिल्ली के एक खोजी पत्रकार ने..

सुलखान सिंह नए डीजीपी। लगता नहीं था कि कोई इतने ईमानदार अफसर को कभी कमान देगा। लईया-चना हमेशा याद रहेगा। लखनऊ में खबर करने गया था। सोचा चलो एक दो अफसर से तो मिलता चलूँ। फिर याद आया कि चलो एडीजी जेल से मिलते है। फोन किया और उधर से वही अपनेपन से भरी हुई आवाज शहर में आएँ हो क्या। चलो आएँ हो तो आ जाओं। मिलने पहुंच गए खाने का समय हो चुका था तो पूछा कि आपने लंच तो नहीं लिया होगा तो हमारे साथ लोंगे। मैंने जवाब दिया कि सर मैं तो दोपहर में खाना नहीं खाता हूं। उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं जो हम खाते है वही खा लेना। और उन्होंने कहा कि ले आओं भाई। लेकिन अर्दली आया और बोला सर आज तो आया नहीं है।

उन्होंने पूछा कि क्यों क्या हुआ वो तो कभी छुट्टी करता नहीं है। मेरी नजर में ये खाने को लेकर बातचीत लग रही थी। लेकिन अर्दली ने कहा कि सर छुट्टी तो नहीं थी लेकिन बाहर नगरनिगम की गाड़ी उठाकर ले गई। इस बात पर एडीजी साहब अचानक हैरान हो गए कि वो तो लाईन से खड़ा होता है और आसपास सफाई भी रखता है। हां सर लेकिन वो माने नहीं। एडीजी साहब ने कहा कि कमिश्नर को फोन लगाईँये। मेरी दिलचस्पी बढ़ गई कि बात लंच की हो रही है कहानी म्यूनिसपल कमिश्नर तक जा रही है। एक दम से पूछना अच्छा नहीं लगा तो चुपचाप देखता रहा और फोन मिल गया।

 एडीजी साहब ने कहा कि आज क्या अतिक्रमण हटाओं अभियान था क्या कमिश्मनर साहब। उधर से कुछ ऐसा ही जवाब आया जो फोन के दूर होने से पता नहीं चला। लेकिन तभी एडीजी साहब ने कहा कि अभी मैं बाहर निकल कर आपको आपके ऑफिस तक पहुंचता और रास्तें में अधिकारियों के घर के बाहर कब्जां कर बनाएं गए हुए गार्डन और रास्तों को पार्किंग बना खडे हुए रईसों की गाडियों के फोटो सहित आ जाता हूं ताकि आपको साथ ही लेकर हटाओं। उधर से फिर कुछ आवाज थी लेकिन समझ में नहीं आई।

एडीजी साहब ने कहा कि कमिश्नर साहब एक लईयाचने वाले को उठा कर काफी कानून का पालन कर लिया। काफी कापी भर गई होगी एसीआर की। एक लईया चना वाला जो सरकारी कर्मचारियों को कुछ पैसे में दोपहर में पेट भर देता है उसका कब्जा काफी बड़ा गुनाह लगा होगा। मुझे लगता है कि आपको पहुंचने वाली राशि कुछ कम हो गई होगी। लेकिन आप को उस कुएं में बदल रहे है जो पानी को खुद ही पा रहा है। और आधे घंटे बाद लईया-चना वाला वापस अपनी जगह पर लोगों के पेट भर रहा था और वही से एक गर्मागर्म लईया चने का लिफाफा हमारी टेबिल पर भी आ गया।

तब पूछने पर पता चला कि यही लईया चना दोपहर में एडीजी साहब खाते है। ये मेरी सुलखान सिंह साहब के साथ हुई एक मुलाकात थी। फिर तो कई मुलाकात हुई और अपने मन में ये तस्वीर साफ थी कि अपनी साफगोई और ईमानदारी से बदनाम हो चुके सुलखान सिंह को कौन डीजीपी बनाएंगा। इंवेस्टीगेशन की रिपोर्टिंग करने के चलते अक्सर पुलिसअधिकारियों से साबका पड़ता ही रहा है। ऐसे में जिस भी अधिकारी से बात हमेशा एक ही बात सुलखान सिंह का परिचय रही कि बहुत ईमानदार अफसर है और कड़क भी।

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हालांकि कड़क पन उनके काम करने के तरीकों में होगा व्यवहार में तो हमेशा नर्म। और बातचीत में काफी बार इस बात पर भी बात होती थी कि सरकार को आखिर कैसे अधिकारी चाहिएं जो मंत्रियों की झोली भऱ दे और काले को सफेद और सफेद को काला कह दे सरकार के ईशारे पर। जाविद अहमद साहब दिल्ली में सीबीआई में थे तो कई मुलाकात हुई अच्छे अफसर है लेकिन बुलंदशहर रेप केस में जिस तरह से आरोपियों के नामों का खेल किया लगा कि पद की लालसा किस तरह से रीढ़ को तोड़ कर फेंक देती है। जवाहर बाग जैसा कांड जिसमें दुनिया के किसी भी तख्तें पर पुलिस की गलतियां सामने आ खड़ी होंगी उस पर भी लीपा-पोती दिखी।

इससे पहले इतने सारे सीनियर अफसरों को धता बता कर जिस तरह से जाविद अहमद साहब सामने आएं थे तो लगा था कि प्रदेश में एक ईमानदार अफसर सुलखान सिंह शायद ही कभी उस कुर्सी पर बैठ पाएंगे जिस पर उनका दावा उनके सीनियर होने और काम के प्रति निष्ठा के चलते सबसे आगे था। अब तो काफी समय से बात नहीं हुई लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कई लोगों से बात हुई लेकिन मुझे नहीं लगा कि सुलखान सिंह को बनाने का जोखिम आज कल की पॉलिटिक्स उठा सकती है क्या। लेकिन आज शाम को इस खबर ने एक यकीन तो दिला ही दिया कि आपको हौंसला बनाएं रखना चाहिए कभी न कभी तो आपको रास्ता मिल ही जाता है।

अब उम्मीद करता हूं सुलखान सिंह अपने विश्वास को आधार बना कर इस समय वर्दी और बिना वर्दी के बीच कुछ तो अंतर दिखा पाएंगे। और अक्सर गुंडों से ज्यादा डरावनी बनती जा रही यूपी पुलिस के अंदर कोई बदलाव पैदा करेंगे। ( मैं किसी पुलिस अफसर के लिए कोई लेख लिखता नहीं हूं लेकिन सुलखान सिंह मेरी नजर में उत्तरप्रदेश की पुलिस में एक विश्वास का प्रतीक है इसलिए ये लेख उनके साथ हुए इंटरक्शन पर है। आगे उनका काम जनता को बताएंगा कि मैं सही था या गलत )

(धीरेन्द्र पुंडीर न्यूज़ चैनल न्यूज़ नेशन में संपादक है, यह लेख उनके फेसबुक वाल से लिया गया है)

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