4 pm के साथ बदल रही है पत्रकार की परिभाषा !

घोड़ों के सामने न घास है न दाना। लश्कर के सब आदमी भूखे बैठे हुए हैं और ऐसे में कल के लड़कों से भूखे आदमियों की कहासुनी हो गयी, और तो और जुर्रत देखिये पनाहगार बनी 4 pm के कार्यालय में घुस आये, 4pm के लश्कर को धमकाने, इनका अपराध तो बनता ही है, सोशल मीडिया पर 4 pm को समाजवादी सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पढ़ते नही देखा, अधिकारीयों से नज़दीकी चित्रों को वायरल किया फिर भी नही जानते 4pm समाचार पत्र को।

8 pm नहीं ये 4pm का दफ्तर हैं जहाँ संजय शर्मा बैठते हैं , बड़ी व महंगी लक्जरी गाड़ी, पॉश इलाके में कार्यालय और रहने कें लिये घर नहीं पैंट हाउस हैं, फिर चाहे अख़बार की प्रतियां मात्र 500 ही क्यों न छपे लेकिन ढिंढोरा सोशल मीडिया पर पीटने की कला आती है, ऐसे में इन बेचारों का दोष सिर्फ इतना कि जिन्होंने गरिया, जिन्होंने धमकाया और भाग कर 4 pm के कार्यालय के अंदर घुस गए उनका पीछा करते करते ये भी आ धमके,, डरना चाहिए था, सरकार समाजवादी की भले ही न हों, इस सरकार में दाल गले य न गले संजय शर्मा से डरना चाहिए, उसके रसूख से डरना चाहिए था
संजय शर्मा की शान में ऐसी गुस्ताखी, हालाँकि ये उम्र ही ऐसी होती है, जिसमे युवाओं से ऐसी गलती हो जाती है लेकिन संजय शर्मा की न तो उम्र ही ऐसी है और न ही ऐसी नादानी को ऐसे सुनहरे अवसर को जाने देते, मौका जो मिल गया, योगी सरकार के प्रदेश में राज काज सँभालते ही हालात बदल गए थे, समाजवादी चोला उतार कर भगवा रंग में रंगने के बाद भी दाल नही गल रही थी, न कोई घास डाल रहा था न दाना, मानो दिल की हसरत पूरी हो गयी और शातिर दिमाग ने इस पूरी घटना का फायदा उठाने का षड्यंत्र रच डाला, बेचारे लखनऊ के पत्रकार साथी ये समझ बैठे की समाचार पत्र के कार्यालय पर सचमुच हमला हुआ है और संघठित होकर इसको इन्साफ दिलाने के लिए तपती धूप में निकल पड़े, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव, DGP से लेकर सभी को ज्ञापन दिया और कार्यवाही की।

मांग की गयी , पत्रकारों के संघठित रूप को देखकर प्रशासन शासन तुरंत सक्रीय हुआ और फिर जो हुआ उससे लखनऊ ही नही पूरे देश की मीडिया शर्मसार हुई, संजय शर्मा की सुरक्षाकर्मी की चाहत सामने आ गयी और पूरी घटना का खुलासा भी हो गया, लेकिन शर्म की शिकन भी शर्मा जी के चेहरे पर न आई, इसके विपरीत आये दिन इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर अपने रसूखों की दूकान सजा ली, कभी किसी नेता के साथ तस्वीर तो कभी गृह मंत्री के यहाँ से फोन, तो पार्टी के प्रवक्ता, नेताओं के साथ तस्वीर सोशल मीडिया पर लगा अपनी घटिया हरक़त छुपाने में लगे हैं।
संजय शर्मा जैसे पत्रकारों नें पत्रकारिता दागदार की है और आज के दौर में लग्ज़री गाडी, पाश् इलाके में कार्यालय, पैंट हाउस होने पर फक्र महसूस करते हैं , क्या ये किसी पत्रकार के लिए संभव है ,, यदि नही तो कौन हैं संजय शर्मा जो खुद को पत्रकार बताते हैं ।।

शेखर पंडित के फेसबुक वाल से

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मिड डे एक्टिविस्ट से निकाले गये संजय शर्मा

sanjai sharma

वीकेएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा  को मिड डे एक्टिविस्ट से  निकाल दिया गया है। संजय शर्मा की कारगुजारियों को कुछ न्यूज पोर्टल्स ने जमकर छापा था, उसके बाद ही ऐसा माना जा रहा है कि अखबार के मालिक उमेश कुमार ने संजय शर्मा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है या आप कह सकते हैं कि उन्हें एक प्रकार से नाता तोड़ने के लिए कह दिया गया था। ऐसा बताया जा रहा है कि मिड डे एक्टविस्ट का एक गुट संजय शर्मा के अखबार निकालने के तरीके को लेकर काफी खफा था क्योंकि संजय शर्मा अखबार नहीं बल्कि सपा का मुख्य पत्र निकालने लगे थे। इसे लेकर कुछ सोशल मीडिया में भी बातें आईं खुद संजय शर्मा ने अपने फेसबुक पर लिखा कि वे मिडडे एक्टविस्ट से नाता तोड़ रहे हैं। पर लोगों को लगा कि यह सिर्फ सोशा ही है पर मिड डे एक्टविस्ट के दूसरे धड़े ने ही शायद उनपर दबाव बनाया था कि वे अखबार से किनारा कर ले और इसे ही देखते हुए संजय शर्मा ने फेसबुक पर इस खबर को हवा दे दी। हालांकि कुछ लोगों ने आगे बढ़कर संजय शर्मा का इतिहास भूगोल सब बाहर कर दिया। एक विनीत राय हैं जो फेसबुक पर संजय शर्मा के बारे में वह सब जानकारी दे डाली जिसपर आज तक पर्दा पड़ा हुआ था। वे तो मुख्यमंत्री पर भी प्रश्नचिंह खड़ा किया है कि अखिलेश को इस बारे में सोचना चाहिए। वे फेसबुक पर लिखते हैं कि मिड डे एक्टविस्ट हो या फिर वीकएंड टाइम्स समाजवादी पार्टी के कार्यालय के अलावा शहर के किसी भी कोने में दिखाई नहीं देता है। संजय शर्मा अपनी पूर्व रिसेप्शनिस्ट से इंटरव्यू करवाकर अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट करतें हैं। संजय शर्मा का नाम हरदोई मिड डे मिल योजना में बर्तन खरीद घोटाले में आया था, वहीं गोमती नगर लखनऊ में एक कर्नल के मकान के कब्जे का महान काम भी ये भाई साहब कर चुके हैं। जिसको लेकर उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय तक को हस्तक्षेप करना पड़ा था। यही संजय शर्मा अपनी जन्मभूमि बदायूं के भगौड़े हैं क्योंकि बैंक ने इनकी कुर्की के फरमान जारी किये थे। अगर ऐसा दागी व्यक्ति युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का प्रिय है तो ऐसे में मुख्यमंत्री को भी एकबारगी सोचना चाहिए कि वह कैसे व्यक्तियों से घिरे हुये हैं। खैर जो भी हो आजतक संजय शर्मा सोशल मीडिया पर भी खूब छाए हुए हैं साथ ही उनके क्रियाकलापों को लेकर प्रश्नचिंह खड़े किए जा रहे हैं।

संजय शर्मा पर यशवंत सिंह के इस प्रायोजित खबर को कुछ यूं आईना दिखाया विनीत राय ने

लखनऊ वाले पत्रकार संजय शर्मा ने अखिलेश यादव के लिए इमानदारी का सर्टिफिकेट जारी किया

Yashwant Singh : संजय शर्मा मित्र हैं. कई वर्षों से. उनके घर मेरा आना जाना है. दुख सुख के साथी रहे हैं. बदायूं से चलकर लखनऊ में जमने की उनकी कहानी प्रेरणादायी है. अपने दम पर आगे बढ़े हैं यानि सेल्फ मेड हैं. एक जमाने में सहारा के रिपोर्टर हुआ करते थे. अब लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों में से एक. प्रिंटिंग मशीन के मालिक हैं. वीकएंड टाइम्स नामक अपना अखबार निकालते हैं. मायावती जब यूपी की मुख्यमंत्री हुआ करती थीं तो संजय भाई सत्ता के पोलखोल के जरिए सीधे सीएम साहिबा से पंगा ले लिया करते थे. उनकी सरोकारी सक्रियता देखने लायक हुआ करती थी. जबसे यूपी में अखिलेश यादव की सरकार आई है और संजय शर्मा पार्टनरशिप वाले अखबार मिड डे एक्टिविस्ट के संपादक हुए हैं, इनके लिखने पढ़ने का अंदाज टोन बदल गया है. ये सेलेक्टिव, चूजी हो गए हैं. अब ये सीधे-सीधे सर्टिफिकेट जारी करने लगे हैं. कौन इमानदार और कौन भ्रष्टाचारी. देखिए उनका अखबार. वीकएंड टाइम्स. अखिलेश यादव को ईमानदार सीएम घोषित कर दिया है. यह कुछ वैसे ही है जैसे लोग अब भी कहें कि मनमोहन सिंह बड़े ईमानदार हैं. अरे भाई, जब पूरा सिस्टम सत्ता तंत्र आपके संरक्षण में लूट उगाही गुंडई अनीति में लगा हुआ है तो आप काहें के इमानदार हो. लेकिन लखनऊ के पत्रकारों को इमानदारी का सर्टिफिकेट जारी करना पड़ता है. संजय शर्मा भी अब उसी गिरोह के हिस्से बन गए दिखते हैं जो सत्ता की जयगान कर नाना प्रकार के लाभ हासिल किया करता है. इनके अखबार में अफसरों की पोल खूब खुलती है, नेताओं मंत्रियों की भी. लेकिन बस अखिलेश यादव और उनके खानदान को छोड़कर. मुलायम, अखिलेश, शिवपाल, रामगोपाल आदि को बख्शे रहना है, यह अघोषित आदेश है. आदेश कहां से है, सीएम कार्यालय से या अंतरआत्मा से, ये तो नहीं पता लेकिन इनका मिडडे अखबार देखकर लगता है कि यह अखिलेश पोषित अखबार है. हाल के दिनों में अखिलेश से संजय शर्मा की नजदीकियां बढ़ी हैं.  मिडडे एक्टिविस्ट अखबार की लांचिंग में अखिलेश यादव आए थे. अखिलेश यादव रोजाना संजय शर्मा के दैनिक और वीकली अखबार को पढ़ते हैं. अखिलेश यादव की छोटी खबर भी लीड स्टोरी के रूप में इन अखबारों में छप जाया करती है. अब तो हद तब हो गई जब अखिलेश यादव की इमानदारी का सर्टिफिकेट जारी करते हुए खुद संजय शर्मा ने प्रथम पेज लीड स्टोरी लिख दी है. समझ नहीं आ रहा कि ये हार्ड न्यूज है, तेल लेपन है या प्रशस्ति गान. संजय शर्मा लगातार तरक्की कर रहे हैं. पिछले दिनों नई कार खरीदने की तस्वीर फेसबुक पर जारी की थी. जाहिर है, उनका धंधा चल निकला है. बस गर्त में कुछ गया है तो जन सरोकार और पत्रकारिता के मानक. वैसे भी, आज के बाजारू दौर में कौन नियमों सिद्धांतों नैतिकताओं सरोकारों की परवाह करता है. ये सब किताबी बातें हैं जिन पर कुछ पागल किस्म के लोग यकीन किया करते है. बाकी तो जो है सब बाजारू और लाभ ओरियेंटेड है. संजय शर्मा गाहे बगाहे भड़ास ( www.bhadas4media.com ) की आर्थिक मदद कर दिया करते हैं. पर अब तय किया है कि आगे से उनसे एक पैसा नहीं लेना है. आखिर पैसा असर दिखाता तो है ही. लिखने से रोकता है, आलोचना करने से डराता है. कलम तभी तक बेबाक है जब तक वह वित्त पोषित नहीं है. जैसे कि खुद संजय शर्मा पर किसी के पैसे का तगड़ा असर हुआ दिख रहा है. उम्मीद है संजय भाई बोलेंगे और बताएंगे कि आखिर उनका अखबार अखिलेश यादव को इमानदारी का सर्टिफिकेट जारी कर इस खबर को पहले पन्ने पर लीड क्यों छापता है? संजय भाई के खिलाफ यह सब इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि उन्हें मैं लखनऊ के दूसरे दलाल पत्रकारों से अलग मानता था. मित्र मानता था. पर लगता है उन पर भी सोहबत का असर पड़ने लगा है. उम्मीद करता हूं हम दोस्तों की गुहार पर फिर वह रस्ते पर लौटकर आ जाएंगे.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

यशवंत सिंह को विनीत का जवाब

प्रिय यशवंत भाई,

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यशवंत भाई आपके प्रयास और साहस का हमेशा से मुरीद रहा हूं। इस पोस्ट में आप संजय शर्मा की तारीफ कर रहे है या फिर शिकायत कर रहे हैं, यह समझ से परे है। मुझे इस पोस्ट से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप संजय शर्मा को प्रमोट कर रहे हंै। चूंकि लेखनी के आप धनी व्यक्ति है, इसलिए लोग इस मुगालते में रहेंगे कि आप विरोध कर रहे हैं। आप जिस अखबार की बात कर रहे हैं वह संजय शर्मा और समाजवादी पार्टी के कार्यालय के अलावा शहर के किसी भी कोने में दिखाई नहीं देता है।
जहां तक संजय शर्मा की मायावती के खिलाफ मुहिम चलाने की बात है वो तो जगजाहिर है। मायावती के सामने तो आपके तेवर भी ढीले पड़ गये थे तो संजय शर्मा किस खेत की मूली हैं। जो व्यक्ति मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का खास बनने का ढोंग करता हो, अपनी पूर्व रिसेप्शनिस्ट से
इंटरव्यू करवाकर अपनी फेसबुक वाॅल पर पोस्ट करता हो, ऐसे व्यक्ति को यदि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने पास बैठा रहे हैं तो उत्तर प्रदेश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता हैं?
स्ंाजय शर्मा का नाम हरदोई मिड डे मिल योजना में बर्तन खरीद घोटाले में आया था, वहीं गोमती नगर लखनऊ में एक कर्नल के मकान के कब्जे का महान काम भी ये भाईसाहब कर चुके हैं। जिसको लेकर उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय तक को हस्तक्षेप करना पड़ा था। यही संजय शर्मा अपनी जन्मभूमि बदायूं के भगौड़े हैं क्योंकि बैंक ने इनकी कुर्की के फरमान जारी किये थे। अगर ऐसा ढोंगी और दागी व्यक्ति युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का प्रिय है तो ऐसे में मुख्यमंत्री को भी एकबारगी सोचना चाहिए कि वह कैसे व्यक्तियों और नटवर टाइप लोगों से घिरे हुये हैं।
यशवंत भाई, यह मुझसे अधिक भला कौन जानता है कि संजय शर्मा की कारगुजारियों के बारें में मैंने बहुत पहले ही आपको लिखित रूप में अवगत कराया था। मगर आप ने उस वक्त मेरी खबर को तरजीह नहीं दी थी। आपने संजय शर्मा की काली करतूत पर पर्दा डालने का कार्य किया था। फिलवक्त हो सकता है कि संजय शर्मा ने आपको आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी हो। ऐसे में आपकी कुढ़न और चिढ़न इस पोस्ट के माध्यम से सामने आई हो। लेकिन, आप कलम के पक्के कलाकार हैं इसलिये बुराई में भी आपने संजय शर्मा के साथ बिताये दिनों का लिहाज बखूबी बरता है। इसलिये बुराई के माध्यम से संजय शर्मा की तारीफ की है। हो सकता है इससे आप दोनों का कोई बड़ा काम मुख्यमंत्री के दरबार से निकल जाए।

दैनिक जागरण छापता है पेड न्यूज-संजय शर्मा

प्रिया गुप्ता:- आपको किस प्रकार का न्यूज पेपर अच्छा लगता है? 
संजय शर्मा:- न्यूज पेपर वह अच्छा होता है जो पाजीटिव वेव में होता है। आज कल सभी अखबारों के प्रमुख पेज पर मुख्य रूप से ऐसी खबरें होती है। जिसमें क्राइम की खबरें होती है। इससे लगता है कि कही न कही कुछ कमी रहती हैं हिन्दुस्तान और जनसत्ता सबसे बढि़यां होता है।
प्रिया गुप्ता:-केपीएमजी के सर्वे रिर्पोट में दैनिक जागरण हमेशा सबसे आगे रहता है। क्या आपकों लगता है कि दैनिक सबसे बेहतर पेपर है ?
संजय शर्मा:- दैनिक जागरण ने पेड न्यूज के चलते अपनी शाख खराब कर लिया है। जो आकड़े होते है, इन आंकड़ों में बहुत सारे हेर-फेर होते है। ऐसे में कौन आगे है इस रिपोर्ट के आधार पर कुछ नहीं कहा ज सकता है। अखबार का अधिक बिकना मायने नहीं रखता है। अखबार पठनीय होना चाहता है। 
प्रिया गुप्ता:- विकेण्ड टाइम्स कैसा पेपर है ? इसमे आप लोगों को क्या दिखाना चाहते है ? संजय शर्मा:- कोई अखबार ऐसा होना चाहिए कि जो किसी भी सत्ता संस्थानों के दबाब में नहीं आना चाहिए। यह 10 साल में देश का सबसे बढि़या अखबार हो गया है।
प्रिया गुप्ता:- आप एक तीखा पत्रकार है आप सच बोलते है इसमें कितना सच है ?संजय शर्मा:- आप जब पत्रकारिता है कि तो आप समाज को सच बतायेगें। मगर आज अखबारों में बिल्डर और भूमाफिया आ रहे है जो पत्रकारिता को खराब रहे है। 
प्रिया गुप्ता:- आपने एक मिड डे एक्टीविस्ट अखबार शुरू किया है। इसका मुख्य उद्देश्य क्या है ?संजय शर्मा:-लखनऊ में एक भी शाम का अखबार नहीं था। इसलिए शाम का अखबार निकाला है। इसे अप्रत्याशित रूप से ख्याति प्राप्ति हुई है। इसमे ऐसे समाचारों को लगाया गया है जिसे बड़े-बड़े अखबारों ने फालोअप किया है।
संलग्न विडियों को ध्यान से देखने पर सबसे पहले पता लग जाता है कि इस विडियों को संजय शर्मा ने ख्याति प्राप्ति के लिए अपने कर्मचारियों से रिकार्डिग करवाई है। रिकर्डिग के दौरान प्रिया गुप्ता को कैमरे से पिछे एक युवती की आवाज आती है जो सीधा होने के लिए कह रही है। दूसरी बात संजय शर्मा देश के ऐसे ईमानदार पत्रकार है कि उन्हें यह भी पता केपीएमजी रिपोर्ट क्या होती है। शायद यही वजह है कि एक मास काम की स्टूडेन्ट ने संजय शर्मा से पूछा मगर वह इस पर प्रकाश नहीं डाल सका है। संजय शर्मा ने दैनिक जागरण जैसे अखबार को पेड न्यूज छापने का आरोप लगा दिया। मगर वह भूल गये वह स्वयं भी यही कृत्य करते है। सरकारों विभागों के प्रिंटिग्स के ठेके लेने के लिए इनके द्वारा अपने साले से छल कपट कर विकेण्ड टाइम्स अखबार हथिया लिया गया। एक ऐसा व्यक्ति सलाह दे रहा है जो स्वयं भ्रष्टाचार और करप्सन की दलदल में धसा है। ऐसा व्यक्ति अखबार के मूल्यों की बात कर रहा है। संजय शर्मा इस विडियों में कह रहे है कि बिल्डर और भूमाफिया इस क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ जमा कर पत्रकारिता को बदनाम कर रहे है। मगर वह भूल गये कि वह स्वयं अपने गृह जनपद बदायूं के सेन्ट्रल बैंक आंफ इण्डिया के डिफाल्टर रह चुका है। यह भूल चुका है कि यह वही गुण्डा माफिया और पत्रकारिता पर कलंक लगाने वाला दलाल पत्रकार है। जो वर्ष जुलाई माह 2007 में बसपा के गुर्गो के दम पर एक सेवानिवृत्ति सैन्य अधिकारी के मकान पर अवैध रूप से जबरन कब्जा कर रहा है। यह वही पत्रकारिता का भड़वा दलाल है जो जो उस बसपा नेता और अपने एक संत मित्र को लड़कियों की सप्लाई करता था। यह दलाल भूल गया कि इसे गोमतीनगर थाने में सैन्य अधिकारी ने रिवाल्वर लेकर दौड़ा लिया था। आज पत्रकारिता का यह रंगा सियार सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज की कहावत को चरितार्थ कर रहा है।

विनीत राय के फेसबुक वॉल से

मिड-डे-एक्टिविस्ट के संपादक पर कर्मचारियों ने लगाया मानसिक और आर्थिक शोषण का आरोप

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मिड-डे-एक्टिविस्ट जिस गर्मजोशी के साथ लखनऊ शहर में लांच हुआ और उसके संपादक संजय शर्मा ने पत्रकारिता के प्रति जो जुझारूपन दिखाया उससे इस बात का किसी को अहसास नहीं हुआ कि इस संस्थान में भी कर्मचारियों का मानसिक और आर्थिक शोषण होगा। बड़े-बड़े बातें और वादे करने वाले संजय शर्मा भी उन्हीं कुछ संपादकों में से एक निकले जो अपनी जेब भरने के लिए तो कुछ भी करेंगे लेकिन अपने कर्मचारियों को उचित मानदेय भी मुहैया नहीं करा पाएंगे। शुरू के कुछ महीनों तक तो यह अखबार उत्तर प्रदेश या लखनऊ से रजिस्टर्ड भी नहीं था बावजूद इसके तमाम दंद-फंद अपनाकर अखबार ने सरकारी ऐड उठाए और तो और मिड-डे-एक्टिविस्ट में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी को न तो नियुक्ति पत्र दिया गया और न ही वादे के अनुरूप मानदेय। तमाम गड़बड़झालों के बीच अखबार तो आगे बढ़ता रहा लेकिन अखबार के कर्मचारी पीछे जाते रहे। इसी का नतीजा था कि फरवरी माह के शुरू होते ही एक-एक कर इनके काफी कर्मचारियों ने संपादक संजय शर्मा का साथ छोड़ दिया। संस्थान के मुख्य डिजाइनर ने इस कारण से संस्थान को अलविदा कह दिया कि उन्हें संस्थान के संपादक हर वक्त जलील किया करते थे। इतना ही नहीं जिस मानदेय पर उन्हें लाने की बात हुई थी वह मानदेय भी उन्हें नहीं मिला साथ ही और तो और कागजी तौर पर वह मिड-डे-एक्टिविस्ट के कर्मचारी भी नहीं थे। ऐसा ही कुछ संस्थान के सीनियर रिपोर्टर अरविन्द त्रिपाठी, संजय शर्मा के बाद सारी जिम्मेदारी देखने वाले अरविन्द श्रीवास्तव, मार्केटिंग में कार्यरत एक महिला कर्मी इन्दु, एचआर में शिवानी और प्रिंटिंग का काम देख रहे अमरेन्द्र ने संस्थान को अलविदा कह दिया। इन सारे कर्मचारियों का एक ही आरोप कि संजय शर्मा न तो उचित मानदेय दे रहे थे न ही कोई नियुक्ति पत्र दिया और तो और सुबह साढ़े आठ बजे बुलाकर रात को साढ़े आठ-नौ बजे तक फिजूल में रोके रखते थे। इन सारे कर्मियों ने एक और बड़ा आरोप लगाया। जिसके अनुसार संजय शर्मा नौकरी तो मिड-डे-एक्टिविस्ट की कराते थे लेकिन साथ में वीक एंड टाइम्स का काम भी इन्हीं कर्मियों के जिम्मे था। इसके लिए भी इन्हें कोई अलग से उचित मानदेय नहीं दिया जाता था। संस्थान के मुख्य डिजाइनर ने तो यह तक कहा कि उसी से संपादक संजय शर्मा बैनर और होर्डिंग डिजाइनिंग का काम भी कराते थे। जिस आशा से यह कर्मचारी संस्थान और संजय शर्मा के साथ जुड़े उससे कहीं ज्यादा संजय शर्मा के व्यवहार से दुखी होकर इन्होंने संस्थान को छोड़ा। आने वाले वक्त में मिड-डे-एक्टिविस्ट से कई और लोगों के जाने की सूचनाएं मिल सकती हैं। क्योंकि संपादक के अभद्र व्यवहार के चलते पूरे संस्थान में भगदड़ मची हुई है। आने वाले दिनों में और भी कई सूचनाएं मिड-डे-एक्टिविस्ट के बारे में मिल सकती हैं जो काफी हद तक अव्यवहारिक भी लगें। इंतजार करें…

सोर्स : एक कर्मचारी द्वारा भेजे गये मेल के आधार पर

ऐसा लगा कि सपा के कार्यक्रम में अखबार को किया गया लांच

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शनिवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठन में सांध्य दैनिक अखबार द मिड-डे-एक्टिविस्ट मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आगमन के बाद लांच किया गया लेकिन पूरे कार्यक्रम में जिस तरह से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिंदाबाद, समाजवादी पार्टी जिंदाबाद के नारे लगते रहे उससे यही लगा कि यह किसी अखबार की लांचिंग का कार्यक्रम न होकर समाजवादी पार्टी के किसी राजनैतिक कार्यक्रम में अखबार को लांच कर दिया गया हो। बार-बार पूरे हॉल में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जिंदाबाद, समाजवादी पार्टी जिंदाबाद के नारे लगते रहे और किसी भी व्यक्ति ने उन्हेंं रोकने का प्रयास नहीं किया। बड़ी अजीब विडंबना है। इस अखबार को लांच करने वाले तीन मित्र संजय शर्मा, उमेश कुमार और अमिताभ अग्निहोत्री इन तीनों ने ही बैनरों पर अपनी फोटो के साथ यह लिखकर अखबार की लांचिंग का प्रयास किया था कि देश के विश्वसनीय पत्रकारों की देखरेख में उत्तर प्रदेश में द-मिड-डे एक्टिविस्ट सांध्य दैनिक जिसका पंच लाइन भी दमदार दिख रहा था ‘तीखा….मगर सचÓ यह सब कुछ धरा का धरा रह गया। कार्यक्रम का शुभारंभ अखबार के संपादक संजय शर्मा ने पूर्णतया मुख्यमंत्री की चरण वंदना से किया। जिस उत्तर प्रदेश में उसकी जनता सिर्फ दो साल ढाई सौ दंगों को झेल चुकी हो, विकास का नामोनिशान न हो और राजनीतिक गुंडागर्दी अपने चरम पर हो वह सब संपादक संजय शर्मा की आंखों से ओझल थे। संजय शर्मा ने तो बस अपने पूरे भाषण में मुख्यमंत्री की चरण वंदना को ही जगह दी, लेकिन उनके बाद अखबार के दूसरे सहयोगी अमिताभ अग्निहोत्री ने अपने ही अंदाज में समाजवादी पार्टी और सरकार की बखिया उधेड़ दी। जहां एक तरफ संजय शर्मा के भाषण से ऐसा लगा कि शहर-ए-लखनऊ को एक अखबार नहीं बल्कि अखबार के रूप में एक सरकारी पंपलेट मिलने वाला है वैसे ही अमिताभ अग्निहोत्री की बात को सुनकर लगा कि शायद यह अखबार भी हो सकता है। यह पहली बार देखा गया कि किसी अखबार की लांचिंग के प्रोग्राम में बार-बार समाजवादी पार्टी जिंदाबाद, मुख्यमंत्री जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं। वहीं लांचिंग कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस अखबार के प्रति जो दरियादिली दिखा रहे थे वह भी अखबार को कहीं न कहीं कठघरे में खड़ा कर रहा है। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण के दौरान साफ-साफ कहा कि सरकार एवं स्वयं मुख्यमंत्री इस अखबार को हर तरह की मदद देते रहेंगे। अखबार के बैनरों को देखकर ऐसा लगता था कि शहर को एक और तेज तर्रार अखबार की सौगात मिलने वाली है लेकिन अखबार की लांचिंग में लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब देखना यह बाकी है कि आने वाले समय में यह अखबार कौन रुख अपनाता है। बावजूद इसके bhadas4journalist.com  संपादक संजय शर्मा और उनके सहयोगी उमेश कुमार एवं अमिताभ अग्निहोत्री को बधाई देता है और साथ ही यह उम्मीद भी करता है कि आने वाले समय में द मिड-डे-एक्टिविस्ट अखबारी गरिमा को न सिर्फ बनाए रखेगा बल्कि आगे भी ले जाएगा।

संजय शर्मा और उमेश कुमार जी अखबार की लांचिंग के लिए राजनीतिक व्यक्ति ही क्यों?

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लखनऊ शहर को जल्द ही एक नए अखबार की सौगात मिलने वाली है। वीक एंड टाइम्स के मुखिया संजय शर्मा और समाचार प्लस के मालिक उमेश कुमार के संयुक्त एजेंडे में लखनऊ शहर को द मिड डे एक्टिविस्ट सांध्य दैनिक संभवत: 27 तारीख की शाम से मिलनी शुरू हो जाएगी। गत्ï दिनों मेधावियों को सम्मानित करने को लेकर अमर उजाला ने एक कार्यक्रम रखा था जिसने प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मेधावियों को सम्मान स्वरूप लैपटॉप बांटे थे लेकिन उसी प्रोग्राम में अखिलेश यादव ने मीडिया को लेकर बहुत ही असभ्य टिप्पणी की थी। उन्होंने बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि अगर आईएएस, आईपीएस या किसी बड़े पद तक पहुंचना है तो मन लगाकर पढ़ाई करो या नकल करके डिग्री हासिल करोगे तो सिर्फ पत्रकार बन सकते हो। एक तरफ दिल्ली से लेकर लखनऊ के पत्रकारों ने इसका खासा विरोध किया वहीं संजय शर्मा और उमेश कुमार के संयुक्त एजेंडे में आने वाले अखबार द मिड डे एक्टिविस्ट का लोकार्पण स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव करेंगे। पता नहीं मीडिया अखिलेश यादव की मजबूरी है या मीडिया की चाटुकारिता जो भी है यह इस समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा है। वैसे भी सरकार मीडिया का दुरुपयोग आए दिन करती रहती है। लेकिन मीडिया को लेकर जिस तरह के बयान अखिलेश यादव ने दिए हैं कम से कम उसको देखते हुए तो मीडिया के लोगों को मुख्यमंत्री को इस तरह के कार्यक्रमों से दूर रखना चाहिए। ऐसा न करना ही पूरी मीडिया जगत पर दलाली का लांछन लगाता है। संजय शर्मा जी को एक नेक राय है कि अखबार का नाम जितना अच्छा रखा है काम भी अगर उतना ही अच्छा करें तो बहुत अच्छा रहेगा। बावजूद इसके भड़ास फॉर जर्नलिस्ट मिड डे एक्टिविस्ट के लिए संजय शर्मा और उमेश कुमार दोनों को बधाई देता है और यह उम्मीद भी करता है कि जैसा नाम है वैसा ही काम भी इस अखबार में देखने को मिलेगा।

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