मजीठिया वेतनमान की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 03 अगस्त को

bhadas4journalist-logoमजीठिया वेतनमान की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। 03 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा रिपोर्ट पेश की जाएगी, जिससे सिद्ध हो जाएगा कि किसी भी प्रिंट मीडिया संस्थान ने मजीठिया वेतनमान नहीं दिया है। अब आगे का कार्य वकीलों की बहस पर टिका होगा। चूंकि न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 5 की उपधारा 4 के तहत कंपनी या कारपोरेट अवमानना मामले में कंपनी की बागडोर संभाल रहे प्रमुख की गिरफ्तारी होती है और केस अवधि तक कस्टिडी में रखा जाता है। इसलिए उक्त अधिनियम के तहत पक्षकार के वकीलों को मुद्रक प्रकाशक, संपादक आदि की गिरफ्तारी की मांग करनी चाहिए। चूंकि अभी सुप्रीम कोर्ट को मीडिया संस्थान ने मजीठिया वेतनमान के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी। और कोर्ट ने अवसर समाप्ति की घोषणा कर दी। अर्थात् आवेदक के द्वारा लगाए गए आरोप सत्य है। फिर भी कोर्ट ने न्यायालय की अवमानना नहीं माना और राज्य सरकारों के माध्यम से श्रम विभाग की रिपोर्ट मांगी। अब इस रिपोर्ट में यह साबित हो जाएगा कि किसी भी संस्थान ने कर्मचारियों को मजीठिया वेतनमान नहीं दिए तो न्यायालय की अवमानना हुई।

आईडी एक्ट की धारा 20 जे को लेकर पत्रकार साथी आशंकित है। दरअसल यह कोई मुद्दा ही नहीं है। 20 जे का प्रयोग तब होता है जब संशय हो। जैसे मजीठिया वेतनमान के अनुसार वर्तमान डीए दर क्या है कर्मचारियों को या संस्थान को पता नहीं लेकिन इतना अनुमान है कि 80 से 90 प्रतिशत के बीच है। तो कर्मचारी बोलेगा कि चलो फिलहाल आप 85 प्रतिशत डीए दे दो। जैसे ही पता चलेगा सुधार लेंगे। तो संस्थान 85 प्रतिशत की दर से डीए देगा। लेकिन कुछ माह बाद पता चला कि वर्तमान डीए दर 81 प्रतिशत है तो भी कर्मचारी को 85 प्रतिशत की दर से लाभ मिलता रहेगा अब यह पैसा किसी भी कीमत पर वापस नहीं होगा। किंतु उक्त दर की गणना में भारी अंतर होने के कारण कर्मचारी उचित डीए की मांग कर सकता है और इसकी एक प्रति संस्थान को व श्रम विभाग को देनी होती है, जबकि एक दो प्रतिशत की बात उपेक्षा कर दी जाती है। 20 जे इतना प्रभावी हो तो न्यूनतम वेतनमान और वेजबोर्ड की अनुशंसा स्वतः निरस्त हो जाती। दरअसल कभी कभी हम सुनते है कि उस संस्थान का प्रमुख 1 रूपए वेतन पर काम कर रहा है। यह भ्रामक बातें होती है कोई भी कर्मचारी चाह कर भी संस्थान पर ऐसा एहसान नहीं कर सकता। उसे वेतन तो पूरा ही लेना पड़ेगा भले ही वह संस्थान को बाद में दान कर दे। लेकिन मालिक से तुलना नहीं होती है वह एक रूपए वेतन ले रहा है या नहीं ले रहा है। ऐसे समाचार उन्हीं लोगों के आते है जो मालिक होते है।

हम मजीठिया वेतनमान के दायरे में नहीं

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न्यायालय में जब मामला चलता है तो अनावेदक का वकील यह कहता है कि हम मजीठिया वेतनमान के दायरे में नहीं आते। तो पक्षकार वकील भी भ्रम में पड़ जाता है। दरअसल मजीठिया वेतनमान की मांग आईडी एक्ट की धारा 33 सी 2 के तहत की जाती है। और औद्योगिक विवाद अधिनियम उस संस्थान पर लागू होता है जहां 20 कर्मचारी काम कर रहे हो। अर्थात् जिस प्रेस में 20 कर्मचारी हो उसे मजीठिया वेतनमान देना अनिवार्य है। लेकिन जर्नलिस्ट एक्ट की परिभाषा 6 कर्मचारियों से शुरू होती है अर्थात् जिस संस्थान में 6 कर्मचारी है उन्हें वेतनमान का लाभ मिलना चाहिए। मप्र में आईडी एक्ट तब लागू होता है जब किसी संस्थान में 50 कर्मचारी हो। क्योंकि राज्य सरकार ने राजपत्र में कुछ संशोधन किया हुआ है। खैर 3 अगस्त को होने वाली सुनवाई में अधिकांश प्रेस संस्थान कोर्ट से माफी मांग सकते है और माफी का मतलब है फिर मामला लंबा खिचना इसलिए पक्षकार के वकील को जेल की मांग पर अडिग रहना होगा।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र से संपर्क : [email protected]

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