उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त समिति द्वितीय का अस्तित्व क्या!

दूरदर्शन गोरखपुर के खाते में पहुंचा 39 लाखगत्ï तीन सालों से प्रदेश में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की एक समिति ने काम करना शुरू किया था। इस समिति की कानूनी वैधता तो नहीं थी लेकिन इस समिति को मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने व अन्य पत्रकारों ने एवं सरकार से लेकर हर सरकारी महकमे ने स्वीकार किया। इस समिति का कार्यकाल दो साल के लिए ही निर्मित किया गया था और दो साल बाद नया चुनाव कराकर नए पदाधिकारियों को स्थापित कराकर आगे अग्रसर करना था। समिति बनने के बाद किन्हीं कारणों से इस समिति ने दो साल में चुनाव नहीं कराया और जिस वैधानिक तरीके से यह अस्तित्व में आया था उसी तरह से इस समिति के पदाधिकारियों का सारा कार्यकाल आगे बढ़ा दिया गया जिसे सबने स्वीकार किया, लेकिन यकायक हमारे कुछ बुद्धिजीवी पत्रकार किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से समिति से अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए तत्काल चुनाव की मांग की। जिसे समिति ने स्वीकार भी कर लिया, लेकिन बावजूद इसके इन नाराज बुद्धिजीवी पत्रकारों ने बिना किसी समझ के एक नई मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समिति का गठन कर लिया। इतना ही नहीं पुरानी मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समिति ने बकायदा मीटिंग करके इस बात को कहा कि समिति एक महीने के अंदर अंदर नए चुनाव कराएगी और जो परिणाम होंगे उसे सहर्ष स्वीकार करके पुन: कारणों को आगे बढ़ाया जाएगा। समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी की इस बात को कुछ बुद्धिजीवी पत्रकारों ने दरकिनार करते हुए एक नई समिति का गठन करके चुनाव कराने की प्रक्रिया को तेज कर दिया था। यह नई समिति अभी चुनाव कराती उसके पहले ही पुरानी समिति ने चुनाव की तारीखों का ऐलान करते हुए चुनाव को सम्पन्न करा दिया और परिणाम भी सबके सामने आ गया। अब सवाल यह उठता है कि जब एक समिति कार्य कर रही थी तो उस समिति को सिरे से दरकिनार करते हुए एक नई समिति का गठन करना कैसे संभव था। सीधी सी बात है प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार चल रही है तो जब तक अखिलेश यादव स्वयं सरकार को डिसाल्व करके चुनाव प्रक्रिया कराएंगे तभी तो चुनाव संभव है। या कभी ऐसा भी हो सकता है कि एक पार्टी की सरकार चल रही है और वहीं उसी पार्टी से कुछ लोग टूटकर या अन्य पार्टियों के लोग मिलकर नया चुनाव करा सकते हैं आप सबका जवाब होगा कत्तई नहीं यह असंभव है। फिर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समिति में यह असंभव कार्य कैसे हो गया। अपनी व्यक्तिगत अभिलाषाओं की कामना के लिए हमारे कुछ पत्रकार बंधुओं ने जो नई समिति का गठन करके चुनाव कराया और मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति को दो भागों में विभाजित कर दिया उससे सबसे ज्यादा नुकसान पूरी पत्रकार बिरादरी का हुआ और होना शुरू भी हो गया है। अब जब प्रदेश में एक साथ दो-दो मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समितियां काम कर रही हैं ऐसी स्थिति में कुछ बड़े सवाल उठते हैं इनका जवाब कौन देगा अब यह तय करना भी मुश्किल है। पहला सवाल यह कि अब किसी पत्रकार की मान्यता कौन सी समिति कराएगी। पत्रकारों की समस्याओं का निराकरण किस समिति के पदाधिकारी करेंगे। एक तरफ मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति का दो भाग में बंटना जहां पत्रकारों के हित में नहीं था वहीं सरकारी महकमे ने अंदर खाने इसको सपोर्ट भी किया और सपोर्ट क्यों न करें। जब एक समिति थी तो वह पूरे पत्रकारों की ताकत थी। अब दो समिति का गठन हो गया है तो पत्रकारों की एकता का भी बंटवारा हो गया और पत्रकारों की एकता के बंटवारे के चलते सरकार पर या सरकारी कामकाज पर ईमानदारी का दबाव बनाना अब मुश्किल होगा। इन सबके बावजूद नई समिति बनने के बाद पत्रकारों के बीच में और ब्यूरोक्रेट्ïस के बीच में एक चुटकुल चल निकला है। अब तो सब यह कहते हैं कि भाई पहले यह बताओ कि तुम किस समिति के पत्रकार हो। माफ कीजिएगा इस सवाल को हमने चुटकुला कहा जबकि यह सवाल अब हम सभी पत्रकारों पर एक सवालिया निशान है। जल्द इसका जवाब ढूंढना होगा।

 

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एस के सिंह के फेसबुक वॉल से

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