TOI ने बताया- प्रिंट मीडिया का भविष्‍य खतरे में

देश का प्रिंट मीडिया इन दिनों काफी दबाबों के बीच काम कर रहा है। ऐसे कई दबाब हैं जो प्रिंट मीडिया को कमजोर करने और उसे घेरने के लिए एक साथ मिलकर सामने आ गए हैं। ऐसे में प्रिंट मीडिया का भविष्‍य खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। ऐसा मानना और कहना है देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ का।

इस मामले को लेकर ‘ द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ ने अपने पेज एक बड़ा कॉलमसाइज एडिटोरियल लिखा है। इस एडिटोरियल में बताया गया है कि वर्तमान परिस्थितियों में अपना वजूद कायम रखने के लिए कई बड़े राष्‍ट्रीय अखबार अपने एडिशंस बंद कर रहे हैं, खर्च घटा रहे हैं। स्‍टाफ की छंटनी कर रहे हैं और विस्‍तार नहीं कर रहे हैं अथवा इसमें कम पैसा लगा रहे है। देश में चल रहे हजारों छोटे अखबार पिछले पांच साल से यही सब कर रहे हैं।

अब गुड्स एवं सर्विस टैक्‍स (GST) लागू होने के बाद टैक्‍स बढ़ने पर स्थितियां और बिगड़ने वाली हैं। इसके अलावा यदि दो महीने से चल रहा नोटबंदी (demonetisation) का प्रभाव यदि इस तिमाही से लेकर अगली तिमाही तक भी जारी रहता है और सरकार वेतन आयोग (wage board) मामले में राहत नहीं देती है तो प्रिंट मीडिया का हाल और खराब हो जाएगा।

हाल ही आई वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद से कई प्रिंट कंपनियां पहले से ही परेशान चल रही है। दरअसल, पूवर्वती सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूर कर अखबारों मालिकों पर दबाव डाला था कि वे एरियर के साथ अपने कर्मचारियों के वेतन में 45-50 प्रतिशत की बढ़ोतरी करें। इस आदेश के बाद से इस इंडस्‍ट्री से जुड़े हुए चपरासी, क्‍लर्क और ड्राइवर भी अब तीन गुना सैलरी पा रहे हैं जो देश में किसी भी अन्‍य इंडस्‍ट्री के मुकाबले काफी ज्‍यादा है।

ऐसे में अब तक मुनाफे में चल रहे बड़े पब्लिशर्स काफी घाटे की ओर जा रहे हैं। देश की सबसे बड़ी न्‍यूज एजेंसी ‘प्रेस ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया’ (PTI) पर भी इसका काफी प्रभाव पड़ा है और वर्ष 2013-14 में स्‍टाफ पर किए जाने वाले खर्चे (staff costs) में पहले के मुकाबले 173 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इसका परिचालन घाटा (operating losses) काफी ज्‍यादा बना हुआ है।

नोटबंदी के बाद से भी प्रिंट मीडिया पर एक तरह से कहर टूट पड़ा है। हमारे देश में अखबार का बिजनेस ऐडवर्टाइजमेंट रेवेन्‍यू पर बहुत ज्‍यादा निर्भर रहता है। इसमें कुल रेवेन्‍यू का 70-80 प्रतिशत तक योगदान होता है। पिछले पांच साल से भी टीवी के मुकाबले प्रिंट में पहले ही बहुत कम ग्रोथ चल रही थी। टेलिविजन में जहां यह 15-18 प्रतिशत और डिजिटल में 35-40 प्रतिशत थी, वह प्रिंट में सिर्फ 4 से 6 प्रतिशत थी। लेकिन नोटबंदी के बाद से इस स्थिति को और खराब कर दिया है और सभी कैटेगरी के ऐडवर्टाइजर्स ने अपने खर्चों में कटौती कर दी है। या तो उन्‍होंने अपने ऐड कम कर दिए हैं अथवा पहले की डील को रद कर दिया है।

वहीं सरकार ने मार्केट रेट के मुकाबले सरकारी विज्ञापन देने वाली एजेंसी डीएवीपी (DAVP) के रेट में बढ़ोतरी से इनकार कर स्थिति को और बिगाड़ दिया है। सितंबर 2010 के बाद से सिर्फ एक बार ही DAVP  के रेट संशोधित (revised) हुए हैं।

बड़े अखबारों में सरकारी विज्ञापनों पर अखबारों द्वारा अपनी ओर से सब्सिडी दिए जाने के कारण उनके लिए पेपर की कीमत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि अखबार मालिकों को कितना खर्च उठाना पड़ रहा है।

इन सबके बावजूद भारतीय अखबारों की कीमत पूरी दुनिया में सबसे कम (औसतन तीन से पांच रुपये है।) ताकि इसके वे पाठक आसानी से अखबार खरीद सकें, जिनके लिए यह यह न सिर्फ इनफॉर्मेशन और ऐंटरटेनमेंट का साधन है बल्कि यह उनके लिए शिक्षा व ज्ञान का भी एक बेहतर माध्‍यम है। यही कारण है कि सर्कुलेशन रेवेन्‍यू भी काफी कम है और इसकी प्रॉडक्‍शन कीमत के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता है।

यही सब कारण हैं कि देश के अधिकांश अखबारों के सामने अपने अस्तित्‍व को बचाए रखने की चुनौती बनी हुई है, इनमें वे अखबार भी शामिल हैं जिनकी वित्‍तीय हालत पिछले कुछ वर्षों में ज्‍यादा खराब हुई है।

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उदाहरण के तौर पर- एक बहुत बड़े अखबार ने वर्ष 2011-12 में सिर्फ चार प्रतिशत की compound annual growth rate (CAGR) की घोषणा की थी और वर्ष 2015-16 में इसकी मैन पॉवर कॉस्‍ट (manpower cost) 58 प्रतिशत से ज्‍यादा बढ़ चुकी है। जब इस बड़े अखबार के सामने इस तरह की चुनौती बनी हुई तो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि छोटे अखबारों की क्‍या हालत होगी।

हालांकि प्रिंट मीडिया के सामने आ रही इन चुनौतियों को दूर कर स्थिति को सुधार जा सकता है लेकिन इस दिशा में ठोस कदम तेजी से उठाए जाने की जरूरत है ताकि आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय अखबार कमजोर (sick) न हो जाएं।

सबसे पहले तो सरकार को वेतन आयोग की समीक्षा करनी चाहिए और इसके दायरे से गैर पत्रकार स्‍टाफ (non-journalist staff) को बाहर कर देना चाहिए। देश में प्राइवेट सेक्‍टर की बात करें तो सिर्फ प्रिंट मीडिया ही ऐसी इंडस्‍ट्री है, जहां पर सरकार द्वारा नियुक्‍त वेतन आयोग (wage board) वेतन तय करता है।

राष्‍ट्रीय श्रम आयोग ने 2002 में अपनी सिफारिशों में स्‍पष्‍ट कर दिया था कि देश में किसी भी इंडस्‍ट्री के लिए वेतन आयोग की कोई जरूरत नहीं है। कई मामलों में अब प्रिंट पत्रकारिता की धारणा ही बदल गई है। अब पत्रकार एक तरह से नए प्‍लेटफार्म पर आ गया है। ऐसे में वह एक ही दिन में ऑनलाइन के लिए भी स्‍टोरी फाइल कर रहा है, प्रिंट के लिए भी लिख रहा है और टेलिविजन पर भी दिखाई दे रहा है।

दूसरा, नए जीएसटी में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अखबारों की रेटिंग शून्‍य रखी जाए ताकि वह इसकी उस गाइडलाइन को पूरा कर सकें जिसके तहत टैक्‍स रेट पुरानी दर पर ही रखे जाएंगे अथवा वर्तमान ड्यूटी से कम रखे जाएंगे। लोकतंत्र में फ्रीडम ऑफ स्‍पीच को बढ़ावा देने के लिए करीब छह दशक से अखबारों पर टैक्‍स काफी कम अथवा बिल्‍कुल नहीं लगाया गया था।

अखबारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का भी मानना है कि अखबारों पर किसी तरह का टैक्‍स लगाना ज्ञान (knowledge) पर रोक लगाना है और यह न्‍यूज अथवा शिक्षा के प्रसार के खिलाफ है। जीएसटी में प्रिंट मीडिया के लिए ऐडवर्टाइजमेंट को जीरो रेटेड सप्‍लाई (zero-rated supply) घोषित कर देना चाहिए। इसके अलावा कंज्‍यूमर को अखबार की बिक्री पर छूट देनी चाहिए ताकि उन पर अतिरिक्‍त बोझ न पड़े। इसके अलावा इसे अंतरराष्‍ट्रीय मापदंड की दिशा में चलना चाहिए जिसमें कहा गया है कि पूरी दुनिया में प्रजातंत्र न सिर्फ अखबारों को टैक्‍स से छूट दिलाता है बल्कि उन्‍हें प्रमोट भी करता है।

मीडिया खासकर न्‍यूजपेपर्स इन दिनों नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। न सिर्फ टैक्‍स के मामले में बल्कि रेवेन्‍यू को लेकर भी यह तमाम चुनौतियों से जूझ रहा है। अब समय आ गया है कि इस इंडस्‍ट्री को मजबूत बनाया जाए ताकि शिक्षा के प्रसार में और मदद की जा सके और लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सके। इंडस्‍ट्री की जरूरतें क्‍या है, यह देखते हुए सरकार को जरूरी वित्‍तीय और श्रम नीतियां (fiscal and labour policies) बनानी होंगी।

आप द टाइम्स ऑफ इंडिया में अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख नीचे हेडलाइन पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं…

Indian newspaper industry: Red ink splashed across the bottom line

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