नोट के चक्कर में सम्पादक भूल गये कि घर में लाशें पड़ी हैं

कुमार सौवीर

लखनऊ : बजट पर धंधा उसके कर्ताधर्ताओं में चर्चा और जोश-निराशा का माहौल देखने-दिखाने की बात तो समझ में आती है। यह भी समझ में आता है कि नोटों के बाजार में नोटों की आमद-रफ्त और उसकी आवाजाही में बाजारों की उठापटक में अपने अखबारों के पांव घुसेड़ने के चक्कार में यूपी के अखबारों के सम्पादकों की तो मानो लॉटरी ही लग गयी थी। लेकिन यह समझ में नहीं आता है कि जन-संवेदनाओं की गठरी लादने के दावे करने वाले यूपी के अखबारों के सम्पादकों को अपनी ड्योढ़ी पर पड़ी दर्जनों लाशों की भनक तक नहीं मिली।

यह है इन अखबारों में मानवता और आम आदमी के प्रति इनका समर्पण। इन अखबारों ने केंद्रीय बजट पर जमकर खूब पन्ने रंगे, लेकिन एक अखबार को छोड़ कर किसी भी अखबार ने अपने पहला पन्ना तो दूर, दसवें पन्ने तक पर उन हादसों का जिक्र तक नहीं किया, जिसमें 17 से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी। लखनऊ में पुलिस और अपराधियों की मिली-भगत से एक बहादुर व्यापारी की सरेआम हुई हत्या और उससे उपजे व्यापक जन-आक्रोश को भी अपने पहले पन्ने से दूर ही रखा। इतना ही नहीं, इन अखबारों ने पूर्व राज्य विदेश मंत्री ई अहमद की मौत तक को तरजीह नहीं दी।

डेली न्यूज एक्टिविस्ट इकलौता अखबार मिला, जहां आम आदमी की पीड़ा उसकी धड़कन में तब्दील हो गयी। इस अखबार ने अपने पहले पन्ने पर बजट की खबरों को खूब तरजीह दी, लेकिन आखिरी चंद खबरों में कानपुर और बाराबंकी में हुए हादसे पर जिक्र किया। आपको बता दें कि कानपुर के जाजमऊ में एक निर्माणाधीन सात मंजिली इमारत ढह गयी, जिसमें अब तक सात लोगों की लाशें बरामद हो पायी हैं। घायलों की भी तादात बेहिसाब है। इन सभी हताहत लोग इस इमारत में मजदूरी करते थे। कहने की जरूरत नहीं कि समाजवादी पार्टी के एक नेता ही इस इमारत का मालिक है और उसके इशारे पर ही कानपुर विकास प्राधिकरण ने इस इमारत से अपनी आंखें मूंद रखी थीं। उधर बाराबंकी में यातायात बदहाली का एक भयावह मंजर दिखा, जहां एक बोलेरो पर सवार सभी दस के दस लोगों की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। यह हादसा एक बस से हुआ और उसका कारण अपने आगे चल रही एक बस को ओवरटेक करना ही था। बोलेरो ने जैसे ही अगले वाहन को ओवरटेक किया, सामने आ रही एक दूसरी बस उससे जा भिड़ी। दो महिला समेत आठ लोगों की तो मौके पर ही मौत हो गयी, जबकि दो अन्य ने अस्पताल ले जाते वक्त दम तोड दिया।

मगर इन अखबारों ने इन हादसों से अपनी आंख ही ढांप रखी। उन्हें  केवल बजट और सिर्फ बजट पर सरकारी लहजे का भोंपू बजाने में रूचि थी। यही वजह रही, कि अखबारों ने ऐसे हादसों की ओर से अपनी आंखें बंद रखी। केवल मोदी-सरकार के बजट पर ढफली बजाते रहे। दैनिक जागरण ने तो इस पर पूरा का पूरा 16 पेज छाप दिया। बाकी खबरें उसके बाद ही लगायी गयीं। अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे अखबार भी मोदी-सरकार, वित्त  मंत्री और बजट की वाहवाही में इसी कदमताल में जुटे रहे।

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और हैरत की बात है कि यह सब के सब अखबार खुद को आम आदमी के पहरेदार होने का दावा करते हैं।

(पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम)

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