मुजफ्फरनगर हिंसा : स्टिंग मामले में पत्रकारों को घेरने वाले आजम खान का खेल हुआ बेनक़ाब

न्यूज़ चैनल आजतक पर प्रसारित बहुचर्चित मुजफ्फरनगर दंगों के स्टिंग ऑपरेशन की जाँच के लिए बनी उत्तरप्रदेश विधानसभा की समिति को योगी सरकार ने भंग कर दिया है। यह स्टिंग उस वक्त आजतक के खोजी पत्रकार और वरिष्ठ संपादक (अब इंडिया संवाद) दीपक शर्मा की अगुवाई में किया गया था। यूपी विधानसभा की समिति ने इस स्टिंग ऑपरेशन मामले में आजतक के कई नामी गिरामी पत्रकारों, राहुल कँवल, पुण्य प्रसून बाजपेयी, गौरव सावंत, खोजी पत्रकार अरुण सिंह और हरीश सिंह को भी आरोपी बनाया था।

इस मामले सपा के दिग्गज नेता आजम खान ने आजतक चैनल के चेयरमैन अरुण पुरी का नाम घसीटने की भी कोशिश की थी। हालाँकि इस स्टिंग ऑपरेशन पर अगर आजम खान को कोई ऐतराज था तो वह नियमानुसार आजतक पर मानहानि का मुकदमा ठोक सकते थे। लेकिन आजम खान जानते थे कि इस मामले में कोई दम नहीं है। इसलिए आजम खान ने मामले को विधानसभा की अवमानना मानते हुए एक जाँच समिति गठित करवा दी। इस जाँच समिति में आजम खान ने सपा विधायक सतीश निगम को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

इस जाँच समिति के गठन का उस वक्त बीजेपी ने बहिष्कार किया था। खुद इस समिति के अंदर से ही कई सदस्यों ने समिति का विरोध कर इसमें आने से ही इंकार कर दिया था। जिसके बाद आजम खान ने दबाव बनाकर इस मामले में उन्हें एकतरफा करवाई करके के लिए मजबूर किया। यह कोई पहला मामला नहीं था जब आज़म खान ने अपने व्यक्तिगत मामले में पत्रकारों को विधानसभा के जरिये घसीटा। इससे पहले वह न्यूज़ चैनल आईबीएन-7 के वरिष्ठ संपादक राजदीप सरदेसाई को भी विधानसभा में अपमानित कर चुके हैं।

दरअसल आजम खान समाजवादी पार्टी की सरकार में मुजफ्फरनगर के प्रभारी मंत्री थे और आजम खान के दांवपेंच की वजह से ही मुजफ्फरनगर में दंगे जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। आजम ने चैनल के इस स्टिंग ऑपरेशन को गलत साबित करने के लिए एक जाँच समिति बनायी और समिति में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य को आगे कर दिया। दरअसल आज़म खान इस स्टिंग मामले में पत्रकारों पर कार्रवाई के जरिये खुद क्लीन चिट पाना चाहते थे। बहरहाल वक़्त बदला और अब आज़म खान का सारा खेल बेनक़ाब हो चुका है।

सूत्रों की माने तो संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने जाँच समिति की इन फाइलों को परखा। उन्हें बताया गया कि जिस तरह आज़म खान ने अपने व्यक्तिगत मामलों को सूबे की सबसे बड़ी पंचायत यानी विधानसभा से जोड़ा, उससे एक नई परिपाटी शुरू हो गई। जिसमे नेताओं के व्यक्तिगत मामलों को निपटाने के लिए विधानसभा की समितियां बनायीं जाएँगी। लिहाजा गुरुवार को इस मामले में योगी सरकार ने कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। हकीकत को समझें तो स्टिंग में यह दिखाया गया कि किस तरह नेताओं के दबाव में पुलिस मुजफ्फरनगर के घटनाक्रम में कार्रवाई कर पाने और हिंसा पर काबू पाने असफल रही।

सुप्रीम कोर्ट ने भी माँगा था यूपी सरकार से जवाब 

26 सितम्बर 2013 को छपी NDTV की एक रिपोर्ट (मुजफ्फरनगर हिंसा : कोर्ट ने स्टिंग ऑपरेशन पर यूपी सरकार से मांगा जवाब) के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने कथित रूप से राजनीतिक दबाव के कारण मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा पर काबू पाने में उत्तर प्रदेश पुलिस की निष्क्रियता के आरोपों को ‘बहुत गंभीर’ बताते हुए राज्य सरकार से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा।

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सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इन दंगों की एसआईटी या न्यायिक आयोग से स्वतंत्र जांच कराने के लिए दायर याचिकाओं पर भी राज्य सरकार से जवाब मांगा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की आड़ में आज़म खान ने जल्दबाजी में सुप्रीम कोर्ट को जवाब नहीं दिया लेकिन विधानसभा में उस स्टिंग पर जाँच समिति बना ली।

इसी जाँच समिति की आड़ में आज़म खान में खुद को बचाने की कोशिश की और कुछ हदतक तक वह इसमें कामयाब भी हुए। 15 अक्टूबर को आज़म खान की समिति ने कहा कि इस स्टिंग की फुटेज से छेड़छाड़ की गई है और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। लेकिन हकीकत में इस मामले में स्टिंग की फुटेज की जाँच करने वाली गांधीनगर लैब के वैज्ञानिक एचजे त्रिवेदी ने बताया कि स्टिंग में जो भी फुटेज चलायी गई उसमे कोई एडिटिंग नहीं की गई है और फुटेज (continuity) निरंतरता में है।

जानेमाने वैज्ञानिक त्रिवेदी ने कहा, उनको जो फुटेज उन्हें उपलब्ध करवाई गई उसमे कोई एडिटिंग नहीं की गई थी। 15 अक्टूबर 2014 को समिति ने इस मामले के ऐसे कई महत्वपूर्ण तथ्यों को किनारे रखा।

इस मामले में आजम खान के रसूक के चलते आजतक पर दर्जनभर पत्रकारों पर मुकदमा कर्ज करवाने के लिए दबाव बनाया गया। समिति ने कहा कि आजतक के पत्रकारों पर दंगा करवाने का मुकदमा चलाना चाहिए। बहरहाल आजतक अकेला चैनल नहीं था जिस पर आजम खान ने इस तरह कार्रवाई करने की कोशिश की।

इससे पहले वह इंडिया टीवी के वरिष्ठ संपादक रजत शर्मा पर भी एफआईआर दर्ज करवा चुके हैं। इसके अलावा आजम खान मशहूर टीवी एंकर दीपक चौरसिया और अतुल अग्निहोत्री पर भी निजी मामलों में एफआईर दर्ज करवा चुके हैं।

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