4-पीएम वाले संयज शर्मा: खुद की मान्यता है फर्जी, बन बैठे हैं मान्यता देने वाले एसोसिएशन के पदाधिकारी

एक तरफ जहां फर्जी पत्रकारिता और फर्जी पत्रकारों पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कई तथाकथित अखबारों की डीएवीपी को रद किया वहीं प्रदेश की पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार और वर्तमान की योगी सरकार ने नियम-कायदों को ताख पर रखते हुए रेवड़ी की तरह मान्यताएं बांट दी हैं।

सवाल यह उठता है कि प्रदेश सरकार के इस कदम ने असली और फर्जी पत्रकारों के बीच की सीमा को खत्म कर दिया है, या यूं कहें कि खत्म ही नहीं किया बल्कि इन फर्जी पत्रकारों के आगे असली पत्रकार लगातार गायब होते जा रहे हैं। ये पत्रकार गलत तरीके से मान्यता लेकर सरकार द्वारा पत्रकारों को मिलने वाले सहयोग को भुना रहे हैं और तो और अपने पास एक से ज्यादा शहर में मकान होने के बावजूद भी सरकार के तलवे चाटकर सरकारी मकानों पर कब्जा किये बैठे हैं।

ताजा मामला 4पीएम के तथाकथित सम्पादक, यहां तथाकथित शब्द इसलिए भी प्रयोग कर रहे हैं कि इनके जैसे पत्रकार और सम्पादक ही पत्रकारिता को बाजार में रखकर अपना घर चला रहे हैं। समझ से परे है कि संयज शर्मा को 4पीएम या अन्य वो कौन सा अखबार है जिसके नाम पर इनको मान्यता दी गयी है। कायदे और कानून की बात करें तो ऐसे अखबार जिनका डीएवीपी न हो या जिनका डीएवीपी रद हो चुका हो उन अखबारों के कर्मचारियों को मान्यता नहीं मिलती है। डीएवीपी अखबारों में भी मान्यता केवल संवाददाताओं को ही मान्य है। लेकिन कारपोरेट कल्चर के अनुयायी संजय शर्मा के मसले में किसी नियम का पालन नहीं किया गया।

मजेदार बात यह है कि बिना डीएवीपी और बिना सूचना विभाग में रजिस्टर्ड हुए ही संयज शर्मा ने अपने चाटुकारिता मिजाजी के चलते करोड़ों का सरकारी विज्ञापन उठाया। इतना ही नहीं अपने इसी चाटुकारिता मिजाज के चलते कई विभागों में रौब भी गांठते मिल जाता है। संजय शर्मा तो एक इकलौता बानगीभर है। सूचना विभाग स्थित एक कर्मचारी ने नाम न छापने के शर्त पर बताया कि वर्तमान में मान्यता प्राप्त पत्रकारों में 55 प्रतिशत ऐसे हैं जो वास्तव में पत्रकार हैं ही नहीं। अगर यह सत्य है तो सूचना विभाग पर किस तरह का और किसका दबाव है, जो सबकुछ जानते हुए फर्जी पत्रकारों को मान्यता बांटती जा रही है और तमाम विरोध के बावजूद भी इन मान्यताओं को रद नहीं किया जा रहा है। इन्हीं मान्यता प्राप्त फर्जी पत्रकारों की देन है कि पत्रकारिता शर्मसार होती जा रही है। कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक साप्ताहिक अखबार के ब्यूरोचीफ का पहचान पत्र वायरल हो रहा था कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन जब उस पहचान पत्र को ठीक से देखा गया तो ब्यूरो शब्द की स्पेलिंग भी गलत लिखी गयी थी।

इस बात को कहने का आशय सिर्फ इतना है कि ऐसे-ऐसे पत्रकार हैं जिनको ब्यूरोचीफ की स्पेलिंग भी नहीं आती और वो जिला स्तर पर मान्यता प्राप्त पत्रकार होते हैं। अखिलेश सरकार में मान्यता तो ऐसे बांटी गयी जैसे आप आइये कुछ चाटुकारिता कीजिए और मान्यता हाथों-हाथ ले जाइये। सरकार बदली तो यह उम्मीद जगी कि इन तथाकथित मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर ब्रेक लगेगा और जो वास्तव में पत्रकारिता के मरम में डूबे हैं उन्हें उनकी पहचान मिलेगी। वर्तमान सरकार में मान्यता बांटने का काम कुछ कम तो हुआ है लेकिन इन तथाकथित चाटुकार फर्जी मान्यता प्राप्त पत्रकारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह सब कुछ लिखने का अभिप्राय इतना है कि जब हम फर्जी पत्रकारिता कर रहे होते हैं तब हम पत्रकारिता नहीं कुछ और कर रहे होते हैं।

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बार-बार संजय शर्मा का नाम इसलिए आ रहा है क्योंकि इनकी पत्रकारिता तो फर्जी है ही इसी मान्यता और पत्रकारिता के चलते ये उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसिएशन के पदाधिकारी का पद भी हथियाये हुए हैं। हालात तो यह है कि यह महानुभाव जब से एसोसिएशन के पदाधिकारी हुए हैं तब से यह रह-रहकर गुंडों की भाषा भी बोलने और लिखने लगे हैं। अपने प्रिंटिंग मशीन के दफ्तर को ही अखबार का दफ्तर बनाकर बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों एवं कुछ वरिष्ठï लोगों, नेताओं, पत्रकारों को बुलाना और उनके साथ गलबहियां कर फोटो खींचवाना इनका शगल है। इन्हीं फोटो को ताल्लुकात का शकल देते हुए संजय शर्मा सरकारी मुलाजिमों को तो अपने अर्दब में लेते ही हैं कभी-कभी तो पत्रकारों को भी धमकियाते दिख जाते हैं।

अभी हाल में हुए उनके प्रोपेगैंडा का जब खुलासा उन्हीं के कुछ साथियों ने करना शुरू किया तो संजय ने अपने फेसबुक के माध्यम से लोगों को धमकाना भी शुरू कर दिया। अपने व्यक्तिगत झगड़े को जिसका पूरा जिम्मेदार संजय शर्मा व उनके सड़कछाप कर्मचारी थे, पत्रकारिता पर हमले का नाम देते हुए ऐसा ताना-बाना बुना कि सालों से खबर की खाक छानने वाले लखनऊ के समझदार पत्रकार भी झांसे में आ फंसे। इस प्रोपेगैंडा को खुद संजय शर्मा ने ही बुना था… वो भी केवल अपनी व अपने दो कौड़ी के अखबार की ब्रांडिंग के लिए। सूबे की बदली सरकार व उसके अधिकारियों को पत्रकारिता के नाम पर अर्दब में लेने के लिए। जिसमें कुछ हद तक संजय शर्र्मा को सफलता भी मिली। नतीजनत पूरी पत्रकार लाबी जिसमें कुछ बड़े और अच्छे पत्रकार भी थे अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगे।

संजय शर्मा की पत्रकारिता पूर्णतया पाखण्ड और चाटुकारिता पर ही टिकी है। मुश्किल से 100-200 प्रतियां छापकर और इन प्रतियों को बड़े-बड़े ब्यूरोक्रेट्स के बीच पहुंचाकर प्रोपेगैण्डा खड़ा करते हैं और इसी प्रोपेगैण्डा के तहत अपनी दुकान मजे से चला रहे हैं।

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