गजब पत्रकार: दलाली भी खा गये, मुकदमा भी दर्ज करा दिया

एक अनजान से चैनल के पत्रकार ने संविदा में काम कर रहे एक सरकारी कर्मचारी का पायंचा दबोच लिया। हाय अम्‍मा, हाय बप्‍पा चिल्‍लाते हुए यह कर्मचारी जब अपने परिचित तारणहार पत्रकारों के पास आर्तनाद करने लगा, तो फिर शुरू हो गयी लेने-देन की कार्रवाई। शुरूआती बोली पड़ी पचास हजार रूपयों की, लेकिन तय-तोड़ करने के बाद आखिरी बोली 20 हजार रूपयों पर टूटी। लेकिन इसी बीच मामले पर सोशल साइट्स पर हंगामा शुरू हो गया, तो उस पत्रकार ने तारणहारी पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का आरोप लगा दिया। अब हंगामा चल रहा है बस्‍ती में।

तो पूरी कहानी जरा शुरूआत से सुन लीजिए। एक चैनल है न्‍यूज वर्ल्‍ड। बताते हैं कि यह मध्‍यप्रदेश का चैनल है। लेकिन यूपी के हर जिले में इसके रिपोर्टर तैनात हैं। बस्‍ती में तैनात उस रिपोर्टर का नाम है विवेक गुप्‍ता। तो विवेक गुप्‍ता ने जिला प्रबोशन अधिकारी कार्यालय में तैनात दो कर्मचारियों के बारे में अलग-अलग सूचनाएं जन सूचना अधिकार कानून के तहत मांगी थी। पता चला कि उस दफ्तर में कार्यरत एक संविदा कर्मचारी ने गैरकानूनी तरीके से एक फर्म बनायी थी और उसके बाद अपने ही कार्यालय से उस फर्म को करीब तीन लाख रूपयों के काम का भुगतान भी ले लिया।

यह जानकारी मिलते ही विवेक गुप्‍ता ने उस कर्मचारी की चूड़ी कसने की तैयारी कर ली। पल भर में उस संविदा कर्मचारी को भनक मिली तो उसने अपने कुछ रिश्‍तेदार पत्रकारों के यहां गुहार लगायी। इन पत्रकारों में से एक का नाम है आज अखबार से मान्‍यताप्राप्‍त पत्रकार जयप्रकाश उपाध्‍याय और दूसरे का नाम है एपीएन न्‍यूज के राजीव शुक्‍ला। जाहिर है कि इन पत्रकारों के बीच पंचायत बैठी। इसमें विवेक गुप्‍ता, जयप्रकाश उपाध्‍याय और राजीव शुक्‍ला शामिल हुए। यह बैठक एक अन्‍य पत्रकार के आवास पर हुई, और वह पत्रकार भी इस समझौता वार्ता में बिचौलिया के तौर पर शामिल रहा।

बैठक के दौरान  उपाध्‍याय और शुक्‍ला ने गुजारिश की कि इस मामले पर वह राख डाल कर मामला रफा-दफा कर दे। लेकिन जैसा कि ऐसी डीलिंग में ऐसी ही गुहार-मनुहारें शुरू की जाती हैं, और उसके बाद ही असल मुद्दे पर तयतोड़ शुरू हो जाता है, इसमें भी यही हुआ। विश्‍वस्‍त सूत्र बताते हैं कि मामला दबाने के लिए विवेक गुप्‍ता ने सीधे पचास हजार रूपयों की मांग कर दी। यह भारी-भरकम रकम की मांग सुनकर ही उस कर्मचारी की हवा ही वापस सटक गयी। बाकी पत्रकार भी हड़बड़ा गये। समझ में ही नहीं आया कि तीन लाख रूपयों के मामले में पचास हजार रूपयों की अदायगी कैसे हो पायेगी। अरे अफसरों को भी तो भारी कमीशन देना-देना होता है, है कि नहीं।

 

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कर्मचारी तो बुक्‍का फाड़ कर रोने लगा। मगर सूत्र बताते हैं कि हड़काया गया कि सवाल तीन लाख या पचास हजार रूपयों का नहीं है, बल्कि उस तथ्‍य को लेकर है जिसमें उस संविदा कर्मचारी की नौकरी हमेशा-हमेशा के लिए दक्खिन लग जाएगी। कुछ भी हो, तय-तोड़ में मामला 20 हजार रूपयों पर टूटा। कई भरोसेमंद सूत्रों ने प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम को बताया कि उस कर्मचारी ने वार्ता के बाद 15 हजार सौंप कर अपना पिण्‍ड छुड़ाया। यह रकम एक बिचौलिया पत्रकार को सौंपी गयी। हालांकि यह भी खबर मिली है कि उस बिचौलिया पत्रकार ने उस 20हजार रूपयों में से अकेले में गुपचुप 5 हजार रूपयों का कमीशन बतौरिया बिचौलिया-टैक्‍स के तौर पर काट लिया था।

इस घटना के कुछ दिन बाद उसी विभाग के एक अन्‍य कर्मचारी की धांधली की खबर बस्‍ती में सक्रिय कई वाट्सऐप ग्रुप्‍स में चल गयी। ऐसे में जयप्रकाश उपाध्‍याय और राजीव शुक्‍ला को भ्रम हुआ कि शायद अपने रिश्‍तेदार की खबर ही विवेक ने वायरल की है। इस पर जयप्रकाश और राजीव ने उन ग्रुप्‍स में अपनी शिकायत दर्ज करते हुए लिख दिया कि जब 20 हजार रूपयों की वसूली हो कर दी है तुम लोगों न, तो अब उस कर्मचारी को क्‍यों परेशान कर रहे हो।

बस क्‍या था। विवेक गुप्‍ता इस पर भड़क गया। उसने शहर कोतवाली में अपनी सांठगांठ से एक रिपोर्ट दर्ज करायी जिसमें जयप्रकाश और राजीव पर मानहानि की धाराएं लगायी गयीं।

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