‘द वायर’ वालो, ‘मोदी-विरोधी’ होने से गबन और क़त्ल करने का लाइसेंस नहीं मिलता

मृणाल प्रेम

द वायर वालों को विचारों की कितनी कमी पड़ रही है, यह उनके लेखों को देखकर साफ हो रहा है। जनेऊ को हौव्वा बनाने से शुरू हुआ इनका मानसिक स्खलन इतना नीचे जा पहुँचा है कि अब ये कातिलों से लेकर गबन के आरोपियों का बचाव केवल इस आधार पर करना चाहते हैं कि फलाना मोदी के खिलाफ बोला था, ‘एंटी-RSS’ था, तो अगर इसे जेल भेजा गया तो सरकार के खिलाफ बोलने वालों में ‘डर का माहौल’ बन जाएगा।

चोरकटई से इंकार नहीं कर पा रहे अपने साथियों की 

सबसे महत्वपूर्ण और गौरतलब बात यह है कि पत्रकारिता का समुदाय विशेष अपने संगी-साथियों के कुकर्मों से ना नहीं कर पा रहा है। इसे उस समय से तो ‘इम्प्रूवमेंट’ मान ही सकते हैं जब मोदी के दानवीकरण की ‘चीफ आर्किटेक्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ को निर्दोष साबित करने के लिए मीडिया गिरोह पन्ने-पर-पन्ना काला करने में लगे रहते थे। लेकिन दोगलई और मोदी से नफरत इनकी नसों में शायद खून की जगह बह रहे हैं। वो भी इतने ‘ब्लड प्रेशर’ से कि वायर के संस्थापक-सम्पादक सिद्धार्थ भाटिया लिखते हैं कि हालाँकि सीबीआई (‘मानवाधिकार’ गिरोह के वकील आनंद ग्रोवर के खिलाफ विदेश से नियम तोड़कर पैसा लेने का केस दर्ज किया), सेबी (प्रणय रॉय को जालसाजी के आरोप में दो साल आर्थिक बाजार से तड़ीपार किया), प्रवर्तन निदेशालय (राघव बहल के खिलाफ आर्थिक अनियमितता का केस दर्ज किया) और कोर्ट (संजीव भट्ट को हत्या के मामले में उम्र-भर के लिए जेल भेजा) मोदी सरकार के अंतर्गत काम नहीं करते, “लेकिन” यह भी सच है कि बहल, भट्ट और प्रणय रॉय (और उनकी पत्नी राधिका रॉय) मोदी के खिलाफ काम करते थे।

यहीं इनकी असली नीयत, असली चेहरा इसी “लेकिन” में दिख जाता है। बिना कुछ कहे न केवल आरोपित-चूँकि-मोदी-विरोधी-हैं-इसलिए-गबन-से-लेकर-क़त्ल-तक-माफ़-है का संदेश आपके दिमाग में बैठा देते हैं, बल्कि उसके बाद नीचे खुद ही ऊपर जिन प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई वगैरह को ‘क्लीन चिट’ देते हैं, बमुश्किल दस वाक्यों के भीतर-भीतर उन पर भी फिर से हमला शुरू कर देते हैं। हमें यह बताने के बहाने कि सेबी और ईडी ने ‘आश्चर्यजनक तेज़ी से’ रॉय दम्पति और राघव बहल पर कार्रवाई की, अप्रत्यक्ष रूप से पाठक के कान में ‘ये मोदी के इशारे पर हो रहा है’ का मंत्र फूँका जाता है।

राघव बहल का मामला दबाने की कोशिश

वायर के ‘पप्पा’ सिद्धार्थ भाटिया ‘समुदाय विशेष’ के अपने सहोदर राघव बहल के मामले को हल्का करने की भरसक कोशिश करते हैं। बताते हैं कि “महज़ दो करोड़ के लिए ईडी पूरे दल-बल के साथ राघव बहल के पीछे लग गया है, जबकि यह एक ‘रूटीन’ टैक्स इंक्वायरी हो सकती थी।”

‘महज़’ दो करोड़? महज़? दो करोड़ महज़ होते हैं? वो भी उस विचारधारा (शैम्पेन सोशलिज़म) के अलमबरदारों के लिए, जो दिन-रात इस देश के अमीरों के पैसे से डाह पालते नहीं थकते? जिन्होंने हर समय दूसरों की समृद्धि के लिए उन्हें शर्मसार करने में, ‘गैर-बराबरी’ के नाम पर सबके हाथ में कटोरा दे देने की वकालत की हो, वह पत्रकारिता का समुदाय विशेष अपनी काली कमाई के खिलाफ सरकार की कार्रवाई पर उस धनराशि को ‘महज़’ बता रहा है? और चाहता है कि अफसर और जाँच करने वाला विभाग भी उनके हिसाब से तय हों?

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यही काम सिद्धार्थ भाटिया सेबी और रॉय दम्पति के मामले में करते हैं। पता है कि सेबी के फैसले में कोई नुक्ता-चीनी हो नहीं सकती, क्योंकि सेबी ने तसल्लीबख्श सबूत अपने फैसले के समर्थन में रख ही दिए हैं। तो अब सेबी के उनका मामला हाथ में लेने पर ही सवाल उठाया जा रहा है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या सेबी के पास और मामले नहीं थे लंबित, जो प्रणय रॉय के खिलाफ मामले को आगे बढ़ाया गया? केवल इसलिए कि वह एंटी-मोदी हैं? क्या एंटी-मोदी लोगों के मामले अदालतें, पुलिस, जाँच एजेंसियाँ तभी उठाएँ जब बाकी सारे मामले खतम हो जाएँ? ऐसा क्यों? क्या मोदी के खिलाफ हो जाना कोई लाइसेंस है अपराध करने का?

हार्ड कौर पर देशद्रोह योगी नहीं, 26/11 के कारण है

आगे भाटिया बताते हैं कि गालीबाज गायिका हार्ड कौर पर योगी को गाली देने के कारण देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया है। यह सीधे-सीधे झूठ है। हार्ड कौर को देशद्रोह मामले में नामजद इसलिए किया गया कि उन्होंने कथित तौर आरएसएस को हेमंत करकरे का हत्यारा कहा- जिसका मतलब यह था कि उन्होंने देश के दुश्मन हाफिज़ सईद को, फाँसी पर लटकाए गए जिहादी कसाब को 26/11 का दोषी होने से मुक्त करने की कोशिश की। अगर यह देशद्रोह नहीं है कि इस देश के ऊपर हुए इतिहास के भीषणतम जिहाद के घोषित और साबित मुजरिमों को कोई नागरिक बेगुनाह साबित करने का दुष्कृत्य करे, तो और क्या हो सकता है देशद्रोह?

हिरेन गोहैन पर वही मामला है, जो कन्हैया कुमार पर है

आगे भाटिया हिरेन गोहैन के मामले का ज़िक्र करते हैं कि उन पर भी देशद्रोह का मामला चल रहा है। इसे वह मोदी के देशद्रोह कानून के दुरुपयोग का सबूत दिखाते हैं। अगर इस मामले में वायर के ही लिंक पर क्लिक करिए तो साफ़ पता चलेगा कि उन पर मामला इसीलिए चल रहा है कि उनकी अध्यक्षता में हुई बैठक में असम को भारत से अलग करने के नारे लगे थे। ठीक यही मामला कन्हैया कुमार पर चल रहा है। ऐसे में सरकार अगर गोहैन पर मामला न चलाती तो क्या यह कन्हैया कुमार के साथ नाइंसाफी न होती?

सलाह

पत्रकारिता के समुदाय विशेष को सुधरना तो इन्हें तब तक नहीं है, जब तक भगवन खुद उन्हें सद्बुद्धि देने अवतरित न हो जाएँ। केवल एक सलाह दी जा सकती है- मोदी से नफरत करिए, खुल के करिए (क्योंकि अब जब वही खून की जगह आपकी रगों में बह रहा है, तो क्या किया जा सकता है?), पेट भर के करिए। लेकिन नफरत में इतने अंधे मत हो जाइए कि आज गबन वालों के पक्ष में आप खड़े हैं, कल संजीव भट्ट पर आरोपित हत्या का कोई औचित्य निकाल लाइए, और परसों 26/11 या पठानकोट या पुलवामा हमले के पक्ष में खड़े हो जाइएगा। नफरत को दिमाग पर हावी होने से रोकिए। उसे दिल के अजीर्ण तक सीमित करिए।

सभार

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