नवनीत सहगल एक्सीडेंट केस : पढ़िए ! “उन्नाव पुलिस” की जुबानी एक्सीडेंट का “असली सच”, आपको भी ‘लखनऊ की “पत्रकारिता” पर ‘शर्म’

navnit-sahagalकुमार सौवीर

लखनऊ : आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे पर एक पखवाड़ा पहले दो कारों के बीच हुई जबर्दस्‍त टक्‍कर का कारण चालकों का शराब पीना नहीं था, जैसा कि मीडिया ने उस हादसे को अपनी इच्‍छा से रंगा-पोता था। बल्कि हकीकत तो यह थी कि लोगान कार पर बैठे दोनों भाइयों ने एक बूंद भी शराब नहीं पी थी। जाहिर है उन्‍नाव पुलिस ने इस मामले में लोगान गाड़ी को चल रहे युवक पर तत्‍सम्‍बन्‍धी कोई धाराओं पर कोई भी कार्रवाई नहीं की।

मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के सपनों की सड़क को साकार करने के तौर पर आगरा एक्‍सप्रेस-वे को रिकार्ड समय में तैयार किया गया था। इस सड़क को वायुसेना के जंगी जहाजों को उतारने-उड़ाने की ताकत जांचने के रिहर्सल के दौरान एक एयर-शो से लौटते वक्‍त मुख्‍यमंत्री अखिलेश के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल की एम्‍बेसेडर कार बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्‍त हो गयी थी। इस हादसे में जिस लोगान कार की टक्‍कर नवनीत सहगल की कार को मिली, वह फर्रूखाबाद के रहने वाले थे और अपनी बहन को लखनऊ के जानकीपुरम स्थित छोड़ कर लौट रहे थे। यह हादसा उन्‍नाव के औरास थाना पुलिस क्षेत्र में हुआ था। इस हादसे में सहगल को गहरी चोटें आयीं और फिलहाल वे गुड़गांव के मेदान्‍ता अस्‍पताल में भर्ती हैं।

इस दुर्घटना को लेकर समाचार संस्‍थानों से प्रसारित सूचनाओं ने पत्रकारों की भूमिका को सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया था। पहले सवाल तो इस हादसे जुड़े मानवीय पहलुओं पर उठे कि क्‍या पत्रकारों को एकपक्षीय समाचार का प्रसारण करना चाहिए। इस पूरे हादसे में एक प्रमुख सचिव और उसके ड्राइवर की हालत की विभेदीकरण और बाकी घायलों की हालत को लेकर भी सवाल उठने लगे। यह भी सवाल उठने लगा है कि क्‍या अति जोश की हिलोरें समाचार-कर्मी के मूल दायित्‍वों को प्रभावित कर सकती हैं, अथवा नहीं। खास तौर पर तब, जब किसी रिपोर्टर का कृत्‍य-आचरण किसी घायल की छवि पर मारक हमला कर रहा हो।

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औरास थाना क्षेत्र में एक्‍सप्रेस-वे हादसे पर हुए इस हादसे में यही हुआ। पत्रकारों ने अपनी अति-सक्रियता का प्रदर्शन करते हुए झूठे और मिथ्‍या तथ्‍यों का सहारा लिया और आम आदमी के बारे में जन-सामान्‍य की छवि पर गहरा आघात पहुंचाया। अधिकांश पत्रकारों ने इस हादसे के लिए लोगान कार पर बैठे लोगों को बेहद अराजक और हमलावर अंदाज में पेश किया और बताया कि यह लोग शराब के नशे में बुरी तरह धुत्‍त पड़े थे। एक अखबार ने तो अपनी सीमा से कई मंजिल कूद कर यहां तक लिख मारा कि:- शराब में धुत्‍त लोगों को पत्रकारों ने जबर्दस्‍ती अपनी कार में बिठाया, और लखनऊ मेडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर पहुंचा कर पुलिस के हवाले कर दिया। जानकार लोग इस खबर को पत्रकारों की अराजकता की श्रेणी के तौर पर देख रहे हैं। खास कर तब, जबकि उप्र के अखबारों समेत विभिन्‍न समाचार संस्‍थानों ने अपनी विश्‍सनीयता के पैरों पर खुद ही कुल्‍हाड़ी मारने का अभियान छेड़ रखा है।

उधर एक्‍सप्रेस-वे पर हुए उस हादसे के क्षेत्र में आने वाले पुलिस थाना के एसओ मोहम्‍मद इरशाद ने प्रमुख न्‍यूज पोर्टल मेरी बिटिया डॉट कॉम के संवाददाता को साफ बताया कि लोगान कार के चालक या उसमें बैठे अन्‍य सवार की जांच में शराब में धुत्‍त होने की पुष्टि मेडिकल कालेज के डॉक्‍टरों ने नहीं की है। अर्थात यह दोनों ही लोग उस समय शराब के नशे में नहीं थे। बल्कि संयत, सजग और सतर्क भी थे। ऐसे में यह अफवाह फैलाना तो मीडिया की घिनौनी हरकत ही तो माना जाएगा।

News courtsy : http://meribitiya.com

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