गौरी के नाम पर सारे गिद्ध सक्रिय हो गए लाश नोच कर अपनी दुकान सजाने में

एक पत्रकार की बहराइच में दो दिन पहले गोली मार कर हत्या कर दी गई। क्योंकि वह किसी विचारधारा का झंडा नहीं उठाता था, वह सत्ता विरोधी खबर नहीं बल्कि जनता के लिये खबर लिखता था इसलिये उसकी मौत दो बोल की हक़दार नहीं है। तब सबके मुंह पर फेविकोल लग गया था।

गौरी के नाम पर सारे गिद्ध सक्रिय हो गए लाश नोच कर अपनी दुकान सजाने? और यह सत्ता विरोधी और सत्ता समर्थक पत्रकारिता क्या होती है कामरेड? जनपक्षधर पत्रकारिता करने वाले क्या धनिया बो रहे हैं कि पड़ोस के जिले में मरने वाले के लिए आंसू नहीं निकलते और जिसका नाम इसे ग्रुप में 90% ने पहली बार सुना है उस पर रुदाली हो रही है। गौरी की हत्या उस कर्नाटक में हुई है जंहा ‘पंथनिरपेक्ष’ सरकार है फिर ये हिंदुत्व और धर्म का विरोध कहां से आ गया?

मुकदमा दर्ज नहीं हुआ और यहाँ गुनाहगार तय मार सजा सुना दी गई? ये किस ‘लाल किताब’ में पढ़ा है कामरेड? यह देश संविधान से चलता है हिंदुत्व और लाल सलाम से नहीं किसी भी पत्रकार की मौत दुखद है, उसकी निंदा होनी चाहिये, आंदोलन होना चाहिये, गुनाहगार को सजा होनी चाहिये, लेकिन चुन कर ‘निष्पक्षता’ का तमगा देने का अधिकार किसने दिया आपको?

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आज बहुत से पत्रकार जो सत्ता विरोधी हो गए हैं पिछली सरकार में सत्ता की गोद मे मलाई खाते थे वह अपने अवसाद से पन्ना काला करने से निष्पक्ष हो गए? या जो कल सत्ता के विरोध में लिखते थे वह आज सत्ता की गोद मे बैठ गए तो वह अतीत में निष्पक्ष कह दिए जाएंगे? सुविधानुसार जब तक शटर खोले और गिराए जाएंगे आप दुकानदार ही कहलायेंगे।

पत्रकारिता इन सत्ता विरोधी और सत्ता समर्थक दुकानदारों की वजह से नहीं चल रही बल्कि गांव, कस्बों, तमाम गुमनाम जगहों पर अपने घर परिवार को छोड़, उसकी बुनियादी जरूरतों को पूरा न कर पाने का दर्द लिए दिन रात एक-एक सूचना के लिए मरने वाले उन पत्रकारों की वजह से चल रही है जिनके मर जाने पर हम सिंगल कालम खबर तक नहीं छापते, मीडिया संस्थान उनको पहचानने से इनकार कर देते हैं और उनके बच्चों के सपने बाप की चिता या कब्र से साथ दफन हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने विचारधारा की किसी दुकान की फ्रेंचाइजी नहीं ले रखी थी।
(रोमिंग जर्नलिस्ट का विचार)

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