प्रभात रंजन दीन: जब हिल गया था राजभवन का राजद्वार

मनोज दूबे
अग्रज प्रभात रंजन दीन ने उत्तर प्रदेश मान्यता समिति के अध्यक्ष पद के लिए खुद को ‘आफर’ किया है और इस तरह अभी तक गुमनाम व अनजान रहने वाले पत्रकारों के इस संगठन को देशभर के पत्रकारों के बीच चर्चा में ला दिया है। अपनी बेबाक बयानी, खोजी निगाह और निर्भीक लेखनी के बलबूते पत्रकारिता जगत में एक ऊंचा मुकाम रखने वाले प्रभात रंजन दीन एक एक्टिविस्ट भी हैं। एक्टिविस्ट उनके व्यक्तित्व का एक अनिवार्य पहलू है और इनके साथ रहे लोग इस पहलू से भली-भांति वाकिफ हैं।
पत्रकार साथियों के हितों और उनके किसी संकट में उपलब्धता के अपने दायित्व को लेकर प्रभात रंजन दीन हमेशा ही सम्पन्न रहे हैं। जनसत्ता अखबार के संपादक रहते हुए पत्रकार साथी पारितोष पाण्डेय की हत्या की खबर मिलते ही प्रभात जी अपने साथी पत्रकारों को लेकर आधी रात को राजभवन का राजद्वार हिलाने पहुंच गये थे। यह घटना उनकी नेतृत्व क्षमता और सत्ता प्रतिष्ठान से टकराने की उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और क्षमता का प्रमाण है।
प्रभात जी ऐसे पत्रकार हैं जो उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को आंख में आंख डालकर आईना दिखाने का जज्बा रखते हैं। उनके एक साथी पत्रकार ने कुछ साल पहले उनके बारे में एक किस्सा सुनाया था, एक बार उन्होंने किसी खबर पर वर्जन लेने के लिए उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को रात को 11 बजे फोन किया। प्रमुख सचिव महोदय को रात के उस पहर में किसी पत्रकार का फोन करना नागवार गुजरा। प्रभात जी ने दूसरे दिन उन प्रमुख सचिव की प्रेस ब्रीफिंग के दौरान भरी सभा में उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया और उन्हें दो टूक शब्दों में बताया कि किसी भी महत्वपूर्ण और जरूरी विषय पर किसी भी समय पत्रकारों से बात करना उनकी ‘ड्ïयूटी’ है।
ऐसा नहीं कि प्रभात जी सत्ता प्रतिष्ठान से ही टकराते रहे हों, खुद अपने प्रतिष्ठान के भीतर भी उनकी टकराहट की अनुगूंज कई बार सुनी जाती रही है। कई ऐसे किस्से हैं जब उन्होंने प्रबंधन की मर्जी की अनदेखी करते हुए प्रबंधन को असहज करने वाली खबरें केवल इसीलिए फ्लैश की क्योंकि वे खबरें जनहित में थी और पत्रकारिता का दायित्व बोध उनके प्रकाशन की दरकार रखता था।
ऐसे जुझारू पत्रकार को मान्यता समिति के प्रमुख का दायित्व सौंपा जाना पत्रकारों के सम्मान के हित में ही होगा। अब यह पत्रकार बंधुओं का दायित्व है कि वे प्रभात रंजन दीन को हाथों-हाथ लें। क्योंकि पत्रकार होने का सही मायने सिर्फ खबर ही हो सकती है… इससे इतर चौथे खंभे की आड़ में ‘धंधे’ से ज्यादा कुछ नहीं।

Ashok Mishra जहा तक मैं प्रभात सर को जानता हूँ। किसी भी प्रकार का चुनाव लड़ना उनके स्वभाव में नहीं था।अचानक उनका मैदान में आना विस्मयकारी था। क्या यह मात्र संयोग ही नहीं हैं कि जब पत्र और पत्रकारिता पर हर तरफ से हमले हो रहे हो।पत्रकार व्यवस्था का हिस्सा बन गए हो ऐसे में प्रभात सर का चुनाव मैदान में आना उन पत्रकारों के लिए एक उम्मीद नहीं है जो जो अपने पथ प्रदर्शक को ईमानदार चाहते हो।मनोज जी आपने सच ही कहा पत्रकारों का दुर्भाग्य ही होगा अगर ये अवसर हाथ से निकल गया तो।प्रभात सर के रूप में जो अवसर मिला हैं उसे हांथो।हाँथ लेना चाहिए।अन्यथा बहुत देर हो जायेगी।

Indrajeet Singh Maurya प्रभात सर नमस्ते जौनपुर के रहने वाले तीन लोग राज्य मान्यता समिति से हैं वह वोट आपको ही दिया जाए

Durgesh Dixit निःसन्देह मनोज जी
आपके विचारों से मैं न केवल सहमत हूँ बल्कि आपके और आदरणीय प्रभात जी के साथ मेरी शुभकामनायें हैं । आपकी बात उन सम्मानित मतदाताओं की समझ में आ जाये तो हमारा आपका और उनका कल्याण सम्भव है ।

Salaam Chhattisgarh मैं कुछेक वर्षों से ही वाकिफ हुआ हूं लेकिन उनके जैसी बेबाकी, निष्पक्षता, प्रहार कर अंतरात्मा को झकझोर कर रख देने वाले लेख और शब्दों की सटीकता का कोई जवाब ही नहीं। मेरे पास शब्द नहीं है और ना ही मेरी इतनी हैसियत है कि आपके लिए अल्फाज़ों में कुछ पेश कर सकूं। बस इतनी ही इल्तिजा कर सकता हूं कि ऐसे पत्रकार विरले ही होतें हैं, इसलिए हाथ से हाथ मिलाकर प्रभात जी को समर्थन दीजिए…

ये मेरा दुर्भाग्य ही है कि आज तक प्रभात जी भेंट एवं दर्शन नहीं कर पाया। किंतु मेरी दिली हसरत है एक बार मिलने की और आशिर्वाद लेने की। बिना किसी से मिले और उसके व्यक्तित्व से बिना परिचित हुए मेरे दिलो दिमाग में इतना सम्मान एवं आदरभाव शायद ही किसी के प्रति होगा जितना कि प्रभात जी के प्रति है।
मैं बेहद मुत्तासिर हूं।

प्रभात जी को संभवतः मेरे जैसे लाखों चाहने एवं सम्मान करने वाले पूरे भारत में हैं या होंगे।
यही प्रभात जी की विशिष्टता है जो उन्हें करोड़ों में एक अलग मुकाम देती है।
हालांकि मैं रायपुर, छग में विगत नौ वर्षों से रहता हूं, किंतु मूलतः यूपी के जिला प्रतापगढ़ का हूं।
और कुछेक वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करके थोड़ी सी पहचान बनाने में सफल हुआ हूं।

मेरा प्रणाम स्वीकार करें आदरणीय प्रभात जी….

भूल-चूक के लिए क्षमाप्रार्थी…

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जावेद अख्तर,
पत्रकार, रायपुर (छ.ग.)

Arun Chauhan कारोबारी पत्रिकारिता के पीत दौर में ऐसे ईमानदार कलमकारों का साथ न देने वाले खुद ही अपना पाला बयां करेंगे। बिरादरी जानती है प्रभात सर तमाम संपादकों के आदर्श हैं। जो खुद को पत्रकार कहते होंगे, वे उनसे किसी भी वैचारिक विरोध के बाद भी उनके साथ ही होंगे। फतह तय है।

Kaushal Pandey बेबाक लेखन की माद्दा एवं दृढ इच्छा शक्ति के धनी आदरणीय श्री प्रभात सर का कोई जोड नही है । वो होगे कामयाब ।आप सबका अपार स्नेह इस बात का संकेत है । सबको मेरा सादर प्रणाम ।

Pranshu Mishra No doubt Prabhat Ranjan Deen is an outstanding editor and a journalist. Equally no doubt about his commitment and integrity…

But electoral politics in any area is not only about ‘presenting’ yourself to the voters at large..refraining from making a direct contact with voters. Big journalists or small, tv or print, urdu or hindi. Small newspaper or big brands…every voter is important and has equal value.

To further make his candidature more serious..he shud not be shy of going and meeting maximum possible number of journalists.

Unfortunately he is not doing that. There is difference in being only an activist and a ‘political journalist activist’

 

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