बेईमान संयुक्त राष्ट्र और बेईमान पत्रकारिता को धिक्कार है…

प्रभात रंजन दीन
भारतीय मीडिया में राष्ट्रहित की अक्ल होती तो क्या ऐसा होता! देश और समाज के हित में क्या छापना है, क्या नहीं छापना, इसकी सूझबूझ नैतिक अनिवार्यता है, लेकिन मीडिया का नैतिक सूझबूझ से क्या लेना-देना! अब देखिए न जिस दिन कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी को गोलियों से भून दिया जाता है, उसी दिन अहमक अखबार संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट छापते हैं कि कश्मीर में सेना मानवाधिकार का उल्लंघन कर रही है. विडंबना देखिए कि यूएन की रिपोर्ट प्रमुखता से छपती है और उसके बगल में पत्रकार की हत्या की खबर सिंगल कॉलम लगी होती है. जबकि वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की आतंकवादियों द्वारा की गई नृशंस हत्या की खबर लीड बननी चाहिए थी और संयुक्त राष्ट्र की विद्वेषपूर्ण रिपोर्ट सिंगल कॉलम खबर, वह भी समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ.

शुजात बुखारी अलगाववादी या पाकिस्तानपरस्त विचार वाले नहीं थे, इसीलिए आतंकवादियों ने उन्हें रमजान के आखिरी दिन भून डाला. कश्मीर में मानवाधिकार हनन की यूएन की ‘प्लांटेड-रिपोर्ट’ छापने वाले अखबार इतना भी ध्यान नहीं रखते कि ठीक एक दिन पहले वे कश्मीर में चार जवानों की शहादत की खबर छापते हैं. उसके एक-दो दिन पहले ही मीडिया ने सत्ता-निरूपित संधि के कारण कश्मीर की गलियों और सड़कों पर फौजियों पर बर्बरतापूर्वक पत्थर बरसाए जाने, उन पर हमला किए जाने, उन्हें सरेआम पीटे जाने और मारे जाने की खबर भी छापी और दिखाई थी. इसके बावजूद अखबार वालों ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त (ओएनसीएचआर) की रिपोर्ट आंख मूंद कर छाप दी. रिपोर्ट पढ़ी नहीं, अगर पढ़ते तो समीक्षा करते, और तब लिखते कि ओएनसीएचआर की रिपोर्ट नितांत एकपक्षीय और पूर्वाग्रहग्रस्त है. …और अगर रिपोर्ट पढ़ कर छापी है तो फिर समझ लें कि देश के अखबार वाले कितने देश-विरोधी और शातिरदिमाग हैं. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त की रिपोर्ट आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने को मानवाधिकार हनन साबित करने की मनोवृत्ति से लिखी गई है.

फिर ऐसी रिपोर्ट की निष्पक्षता की आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं! उस रिपोर्ट की ‘एक्जेक्यूटिव समरी’ ही आप पढ़ लें तो आपका मन गुस्से और चिढ़ से भर जाएगा. फिर रिपोर्ट की भूमिका देखें, जो बुरहान वानी से ही शुरू होती है. संयुक्त राष्ट्र की यह कैसी मानवाधिकार संस्था है जो आतंकवादी बुरहान वानी की मौत को मानवाधिकार हनन बताते हुए अपनी रिपोर्ट प्रारंभ करती है! यह कैसी संवेदनशील संस्था है जो अपनी रिपोर्ट में कश्मीर में सुरक्षा बलों पर हो रहे बर्बर हमलों और जवानों को सरेआम ‘लिंच’ किए जाने (भीड़ द्वारा दुर्गत करके मारने) की वारदातों पर चिंता नहीं जताती! यह कैसा मानवाधिकार का दृष्टिकोण है, जिसमें अलगाववादियों और आतंकवादियों द्वारा की जा रही आम कश्मीरियों की हत्या शीर्ष प्राथमिकता पर नहीं, लेकिन बुरहान वानी की मौत का प्रसंग सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहता है! यह किस तरह के मानवाधिकार संरक्षण की संस्था है जो कश्मीरी पंडितों के सिलसिलेवार हो रहे मानवाधिकार हनन को महत्व के साथ रेखांकित करता! …और यह कैसा मीडिया है जिसे देशहित की बातें खिझाती हैं और देश-विरोधी बातें नचाती हैं!

आप जब संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त की रिपोर्ट पर निगाह डालेंगे तब आपके मन में यह स्वाभाविक जिज्ञासा जागेगी कि आखिर ऐसी बेहूदा रिपोर्ट लिखने वाला संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रकोष्ठ का उच्चायुक्त कौन शख्स है? संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त का नाम है प्रिंस जैद बिन राद अल हुसैन. ये साहब दक्षिण पश्चिम एशिया में सीरियाई मरुस्थल के दक्षिण स्थित अरब देश जॉर्डन के राजघराने से सीधा ताल्लुक रखते हैं. इस परिवार का सम्बन्ध कभी ईराक राजघराने से भी रहा है. आप जानते ही हैं कि जॉर्डन का इजराइल के साथ पुश्तैनी झगड़ा है. जॉर्डन के लोग इजराइल और उसके साथ सम्बन्ध रखने वाले किसी भी देश से घृणा करते हैं.

जॉर्डन के प्रिंस साहबान ने कश्मीर की पूरी रिपोर्ट ‘जम्मू कश्मीर कोअलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी’ और आईएसआई पोषित ‘इंटरनेशनल काउंसिल फॉर ह्यूमन राइट्स’ से मिले एकतरफा फीड-बैक पर लिखवा डाली और भारतवर्ष के विचारहीन अखबारवालों ने इसे प्रमुखता से छाप कर अपने ही देश के मुंह पर तमाचा जड़ दिया. यह वही ‘जम्मू कश्मीर कोअलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी’ और ‘इंटरनेशनल काउंसिल फॉर ह्यूमन राइट्स’ है, जिसका एजेंट गुलाम नबी फई अमेरिका में एफबीआई के हाथों कुछ अर्सा पहले गिरफ्तार किया गया था. आईएसआई की फंडिंग पर कश्मीर-अमेरिकन काउंसिल चलाने के नाम पर वह अमेरिका में भारत के खिलाफ मुहिम चलाता था.

तब एफबीआई के जरिए यह खुलासा हुआ था कि गुलाम नबी फई भारतवर्ष के कई स्वनामधन्य पत्रकारों, लेखकों और समाजसेवियों को अमेरिका बुला कर आईएसआई के पैसे पर अय्याशियां कराता था और भारत के खिलाफ लिखवाता, बोलवाता और उगलवाता था. यूएन के नाम पर देशविरोधी बेजा रिपोर्टें प्रमुखता से छापने वाले अखबार के ‘महान’ संपादक आईएसआई के पैसे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों में अय्याशियां करने में शामिल रहे हैं… इन्हीं महान लोगों को मनमोहन सिंह सरकार ने कश्मीर समस्या का समाधान खोजने वाले ‘विचारकों’ की टीम में भी शामिल किया था.

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आप संयुक्त राष्ट्र के कृत्यों का पूरा इतिहास निष्पक्ष नजरिए से पढ़ें तो स्पष्ट पाएंगे कि यह अंतरराष्ट्रीय संस्था आंग्ल-अमेरिकी पूंजी साम्राज्यवाद की दलाल है. यह संस्था ताकतवर वाम-धौंसवाद के आगे भीगी बिल्ली है. बलवान यहूदी-बल के आगे लाचार है और रीढ़हीन कमजोर देशों पर भूंकती है. इसे कश्मीर में मानवाधिकार हनन दिखता है, लेकिन ईराक में ‘विपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन’ का रट्टा लगाते हुए लाखों ईराकी नागरिकों की हत्या करने और ईराक को नेस्तनाबूद करने वाले अमेरिका का कुकृत्य नहीं दिखता. जापान से लेकर वियतनाम, दक्षिण अमेरिकी देशों से लेकर अफ्रीकी देशों, मध्य एशिया के देशों से लेकर दक्षिण एशियाई देशों तक किए गए भीषण जनसंहार संयुक्त राष्ट्र की निगाह में मानवाधिकार हनन नहीं हैं.

कश्मीर मसले पर नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाकर ऐतिहासिक गलती तो की, लेकिन संयुक्त राष्ट्र को देखिए कि वह कश्मीर को लेकर भारत पर हमेशा आंखें तरेरता रहता है, पर उसी कश्मीर के 42,735 वर्ग किलोमीटर हिस्से पर कब्जा जमाए बैठे चीन के खिलाफ चूं नहीं बोल पाता. चीन के नाम से ही संयुक्त राष्ट्र की दुम सटक जाती है. चीन के इउगुर प्रांत में मुस्लिम नाम तक रखने पर पाबंदी लग गई है. चीन के इस मुस्लिम बहुल इलाके में लोग मोहम्मद, जिहाद, इस्लाम समेत 29 इस्लामिक नाम नहीं रख सकते. इसके अलावा इमाम, हज, तुर्कनाज, अजहर, वहाब, सद्दाम, अराफात, मदीना जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया तो जेल में ठूंस दिया जाता है. चीन के उइगुर, शिनजियांग, कशगर जैसे इलाकों में लोग न तो सार्वजनिक रूप से नमाज पढ़ सकते हैं और न ही धार्मिक (इस्लामिक) कपड़े पहन सकते हैं. यहां तक कि बच्चों का मस्जिदों में जाना बैन कर दिया गया है.

मस्जिद में प्रवेश के लिए कम से कम 18 साल की उम्र तय कर दी गई है. इस्लामिक नाम रखना या इस्लामिक शब्द का इस्तेमाल करना ही जहां आतंकवादी घोषित कर दिए जाने के लिए काफी हो, वहां संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त को मानवाधिकार हनन नहीं दिखता. आप यह जानते ही हैं कि भारत समेत तमाम अर्ध विकसित और विकासशील देशों में जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिल कर कितना उत्पात मचाए है. गर्भधारण रोकने के लिए मांओं को वह दवा इंजेक्ट की जा रही है, जो विश्व के कई देशों में खूंखार बलात्कारियों की यौन क्षमता नष्ट करने के लिए सजा के बतौर ठूंसी जाती है. गेट्स फाउंडेशन के पैसे से भारत में वह खतरनाक दवा ‘डिम्पा’ के नाम से इंजेक्ट की जा रही है.

खतरनाक दवाओं का प्रयोग करने के लिए विकासशील देशों के लोगों को ‘गिनि पिग’ बनाने के मानवाधिकार हनन की जघन्य करतूत खुद संयुक्त राष्ट्र की संस्था कर रही है और उसी संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था कश्मीर का राग आलाप रही है, क्योंकि इन सबके पीछे निहित कुत्सित उद्देश्य है. …और क्या-क्या कहें! संयुक्त राष्ट्र की दलाली, मक्कारी, पक्षपात, घात, भितरघात और प्रतिघात के ऐतिहासिक तथ्यों का अंबार है. ऐसा ही कचरा मीडिया के कुकृत्यों का भी है. संयुक्त राष्ट्र जैसी बेईमान संस्था और देश की बेईमान पत्रकारिता को धिक्कार है…

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