पत्रकार वही जिसके पैंट में नहीं, पेट में थैली हो

मनोज दुबे
अभी चंद रोज पहले की बात है। पत्रकारों की वार्ता ‘समारोह’ में उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने पत्रकार बंधुओं को एक मजेदार सीख दी। कलमकारों पर प्रदेश में लगातार हो रहे हमले के सवाल के जवाब में कभी मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जाने वाले (समय-समय पर अपनी कार्यशैली से मुख्यमंत्री पद जैसा ही एहसास कराने वाले) उप मुख्यमंत्री जी ने पत्रकारों से कहा कि पत्रकारिता छोड़कर नेतागिरि शुरू कर दो। पत्रकारों की भीड़ अपने आक्रोश को रोक नहीं पाई, बावजूद इसके कुछ दंत निपोरशंख ‘मीडिया मैन’ अपनी मुस्कुराहट को भी नहीं रोक सके।
यह कोई पहली घटना नहीं है। मुझे याद है… सूबे में पिछली समाजवादी सरकार के दौरान छात्रों के एक समारोह में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बच्चों को एक मजेदार सीख दी थी। उन्होंने बच्चों से कहा था कि खूब मन लगाकर पढ़ाई करो तभी आईएएस बन पाओगे। अगर पढ़ोगे-लिखोगे नहीं तो सिर्फ पत्रकार बनकर रह जाओगे। इस समारोह में अनेक पत्रकार उपस्थित थे। वे मुख्यमंत्री की इस सीख पर खिलखिलाकर हंसे। और कर भी क्या सकते थे। मजे की बात यह है कि इस कार्यक्रम का संचालन एक बड़े मीडिया समूह द्वारा कराया गया था।
तरह-तरह के ‘संगठन’ और ‘गुट’ बनाकर सत्ता के दरवाजे पर हाथ में कटोरा लेकर खड़े होने वाले पत्रकार बंधुओं को मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्रियों की ऐसी ‘चुटकियों’ पर झेंपने जैसा कुछ लगा भी नहीं होगा। वैसे अपने पर हंसना अच्छी बात है और जरूरी भी, खासकर पत्रकारों के लिए तो और भी, क्योंकि वे दूसरों पर हंसने का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहते। लेकिन क्या वहां उपस्थित पत्रकार बंधुओं में से किसी ने भी सत्ताधारियों की उक्त सीख में निहित उपहास को नहीं पकड़ा होगा? क्या किसी के भी मन में यह सवाल नहीं उपजा होगा कि कभी सम्मानजनक माने जाने वाले ‘पत्रकार’ शब्द का इतना अवमूल्यन कैसे हो गया कि वह हास्यास्पद बन गया है? क्या इस सवाल को यों ही छोड़ दिया जाना चाहिए?
कभी सिर्फ पत्रकार होना ही आपकी हैसियत को वजनदार बनाने के लिए काफी हुआ करता था, परन्तु आज ऐसा नहीं है। खुद पत्रकारों के लिए भी ‘पत्रकार’ शब्द खोखला और चमकविहीन हो गया है तभी तो उसे तमाम विशेषणों की बैसाखियों के सहारे चमकाने की कोशिशें की जाने लगी हैं। आज पत्रकारों को छत पर चढ़कर चिल्लाना पड़ रहा है कि वे ‘विश्वसनीय’, ‘बेखौफ’, ‘बेबाक’ आदि हैं। हद तो तब है कि जब कोई पत्रकार अपने आपको ‘देश का सबसे बड़ा पत्रकार’ तक कहने में शर्म नहीं महसूस करता है। हालत यह है कि आज पत्रकारों के बीच होड़ इस बात की नहीं है कि वह कैसे अपने को कलम का जांबाज साबित करें बल्कि होड़ इस बात की है कि कैसे ‘वरिष्ठ’ बन जायें। कलम का जांबाज बनने के लिए कुछ अध्ययन-मनन की, विचारों को पकाने की, कलम को मांजने की जरूरत होती है। यह श्रम साध्य है परन्तु इससे हासिल क्या होगा? बहुत हुआ तो आप अच्छे पत्रकार भर बन पायेंगे। तो इस झंझट में पड़ने से क्या फायदा? भले ही कागज-कलम से आपको कोई वास्ता न हो, कुछ ऐसी जुगत भिड़ाइये, इन्वेस्टमेंट मानकर कुछ ‘मास’ गलाइये और किसी तरह एक बार अपने नाम के आगे ‘वरिष्ठ पत्रकार’ का तमगा टांग लीजिए। इसके फायदे ही फायदे हैं। आप टी.वी. स्क्रीन पर नजर आने लगेंगे। समाचार चैनलों के बहस-मुबाहिसों वाले कार्यक्रमों की चों-चों में वैसे भी कौन किसकी सुनता है? कुछ भी बोल दीजिए (अगर मौका मिले तो) और निकल लीजिए। कुछ दिनों में आपका चेहरा सत्ता के गलियारों में जाना-पहचाना हो जायेगा। इतना होते ही ‘धंधा’ चल निकलेगा। इस ‘धंधे’ की व्याख्या करने की जरूरत नहीं। कम से कम पत्रकारों के बीच तो सभी इससे वाकिफ हैं। ऐसा नहीं कि अपनी पत्रकारिता की ‘साख’ भुनाने में छोटे अखबारों/पत्रिकाओं के छुटभैया पत्रकार ही लगे रहते हों। बड़े अखबारों के बड़े नाम वाले पत्रकार भी इसमें पीछे नहीं हैं। उनकी निगाहें सत्ता की रसूख पर रहती हैं। इन्हें मोटी तनख्वाह भी मिलती है। यह अलग बात है कि यह मोटी तनख्वाह उन्हें पत्रकारिता के लिए नहीं बल्कि मालिकों के हित साधन के लिए दी जा रही है। मोटी तनख्वाह उगाहने वाले पत्रकार भी अगर जमीर गिरवी रख रहे हों तो यह चिंता का विषय अवश्य होना चाहिए।
यह बात बहुत कड़वी लग सकती है, लेकिन है सच। अगर पत्रकारिता की अस्मिता को बचाये रखना है तो इस सच्चाई से रू-ब-रू होना ही पड़ेगा। सबकी बख्यिा उधेड़ने का लाइसेंस लेकर घूमने वाले पत्रकारों को अपने गिरेबान में भी झांकना होगा। हालांकि वहां भरी कालिख दिल दहला देने वाली हो सकती है। फिर भी इससे घबराने की जरूरत नहीं। पत्रकार पीछे मुड़कर देखेंगे तो उन्हें बेहद शफ्फाक विरासत दिखलायी देगी, जिससे प्रेरणा लेकर सारी कालिख को ढका जा सकता है। ऐसे पत्रकारों की एक बड़ी श्रृंखला मिलेगी जो थे तो विशेषणविहीन मात्र पत्रकार, लेकिन जिन्होंने निजी और आत्मीय सम्बंधों, निहित स्वार्थों, लालच और लोलुपता को अपनी कलम और कर्तव्य के आड़े कभी नहीं आने दिया। परम्परा से पूरी तरह कटा हुआ वर्तमान अनुशासनहीन, दिशाहीन और दृष्टिहीन होता है। ऐसे वर्तमान से अच्छे भविष्य की उम्मीद कभी नहीं की जा सकती है। पत्रकारिता के वर्तमान को देखते हुए पत्रकारिता के भविष्य के प्रति आश्वस्त होना संभव नहीं लगता।
नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के तहद बचाव का हक सबको उपलब्ध होता है। हत्यारों तक को भी बचाव का अवसर दिया जाता है। सो आज की पत्रकारिता के बचाव में भी यह चालू तर्क खड़ा कर दिया जाता है कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं रही, यह मीडिया उद्योग का युग है। बेशक ‘प्रेस’ से मीडिया बनने के बीच पत्रकारिता को तमाम बदलावों से गुजरना पड़ा है। परिवर्तन तो अपरिवर्तनीय है ही। इसमें कोई शक नहीं कि मीडिया आज इंडस्ट्री है, लेकिन क्या इंडस्ट्री की कोई नैतिकता या ‘एथिक्स’ नहीं होती? किसी कर्म या उद्यम को सिर्फ इसीलिए आवारा अथवा नीतिच्युत होने की इजाजत नहीं दी जा सकती है कि वह उद्योग है।
एक अन्य तर्क यह हो सकता है कि हमारा समाज ही कुरीतियों और अनैतिकताओं से भरा हुआ है। पत्रकार भी इसी समाज से आते हैं, इसलिए उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे दूध के धुले होंगे। इस संदर्भ में एक प्रख्यात लेखक का यह तर्क कि रेगिस्तान का कठिन और दुर्बह सफर सिर्फ ऊंट ही तय कर सकता है, क्योंकि उसके पेट में एक थैली होती है, जिसमें वह कई दिनों के लिए पानी इकट्ठा कर लेता है, लेखन का (और पत्रकारिता का भी) क्षेत्र रेगिस्तान जैसा ही है और यहां वही चल सकता है जिसके पेट में धैर्य संजोकर रख सकने लायक थैली हो। कम समय में बड़ी सफलता हासिल करने की चाह रखने वाले महत्वाकांक्षियों के लिए तो तमाम और रास्ते खुले हुए हैं। उन्हें पत्रकारिता में आना ही नहीं चाहिए। अगर कोई अपने लिए पत्रकारिता का चुनाव करता है तो उससे यह उम्मीद किया जाना शायद ज्यादती न होगी कि वह पत्रकारिता के पेशे में निहित नैतिक जिम्मेवारियों का निर्वहन करेगा।
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