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किसके फायदे में है प्रेस सेवा पोर्टल के नए नियम ?

एडवाइजरी के मुताबिक 10 मार्च 2025 के बाद से दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, समाचार पत्र पत्रिकाओं को ओरिजिनल कॉपी के साथ ही ऑनलाइन भी विवरण देना होगा । ऐसा अब जरूरी कर दिया गया है ।

Press Sewa Portal प्रेस सेवा पोर्टल presssewa.prgi.gov.in - Sarkari Yojana  - TheHowPediaअमिताभ पाण्डेय

पत्रकार साथी जिस आर एन आई नंबर के दम पर अपना और अपने अखबार, अपने न्यूज़ बुलेटिन अथवा अपनी फीचर सर्विस अपनी पत्रिका अपनी वेबसाइट का नाम चला रहे हैं । चमका रहे हैं । वह कैंसिल हो सकता है ! पत्रकार साथियों के मीडिया टाइटल को रद्द किया जा सकता है । यह निष्कर्ष उस एडवाइजरी नंबर 03 का है, जो कि दिनांक 10 मार्च 2025 को जारी की गई है । इसको भारत सरकार के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय से जारी किया गया है ।
एडवाइजरी के मुताबिक 10 मार्च 2025 के बाद से दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, समाचार पत्र पत्रिकाओं को ओरिजिनल कॉपी के साथ ही ऑनलाइन भी विवरण देना होगा । ऐसा अब जरूरी कर दिया गया है । इस एडवाइजरी ने समाचार पत्र पत्रिकाओं के कार्यालय का खर्च तथा अतिरिक्त समय बढ़ा दिया है । जिन बड़े समाचार पत्र समूह में कंप्यूटर क्षेत्र में 10-15 से लेकर 50 लोगों तक का स्टाफ बैठता है । उनके लिए प्रतिदिन ऑनलाइन जानकारी भेजना बहुत आसान काम है ।छोटे-मध्यम समाचार पत्र, पत्रिका निकालने वाले जो पत्रकार सीमित संसाधनों के साथ अखबार और परिवार को चला रहे हैं, उनके लिए नए नियमों का पालन करना मुश्किल होगा । इसका कारण यह है कि प्रतिदिन ऑनलाइन जानकारी के लिए टेक्निकल स्टाफ को या तो बढ़ाना होगा अथवा जो अभी काम कर रहा है, उसको अतिरिक्त पैसा देना होगा ।
ऐसा इसलिए क्योंकि रोजाना जानकारी ऑनलाइन जमा करने के लिए अतिरिक्त समय लगेगा । यहां यह बताना जरूरी होगा कि सरकार के केंद्र और राज्य संबंधी कार्यालयों में जब समाचार पत्र, पत्रिका की वास्तविक प्रति उपलब्ध कराई जा रही है तो फिर इसकी ऑनलाइन प्रविष्टि का काम संबंधित कार्यालय को ही दिया जाना चाहिए जहां इनको जमा किया जाता है । शासन के जिन विभागों में अखबार और पत्रिका जमा होती हैं उनकी ऑनलाइन प्रविष्टि का कार्य विभागीय कर्मचारियों को दिया जाए । इस आशय की मांग पत्रकार संगठनों की ओर से भी की जा रही है । इस सिलसिले में एक सवाल यह भी उठ रहा है की प्रेस सेवा पोर्टल पर अखबार, मैगजीन को अपलोड करने की एडवाइजरी आखिर किसको फायदा पहुंचाने वाली है ?
इससे बड़े समाचार पत्र समूहों को तो ज्यादा असर नहीं पड़ेगा लेकिन अपने घर-परिवार के साथ ही पत्रिका-अखबार चलाने वाले पत्रकारों की परेशानी बढ़ जाएगी । ऐसे पत्रकारों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है ।
बढ़ती महंगाई में यह आर्थिक बोझ छोटे समाचार पत्रों, छोटी पत्रिकाओं को चलाने वाले प्रकाशकों के लिए ज्यादा परेशानी बढ़ाएगा ।
आपको बताते चलें कि हम ऐसे समय से गुजर रहे हैं जबकि जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन भत्ते बढ़ने की खबरें आए दिन पढ़ने को मिलती है । इसके बाद भी कुछ नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों के नाम भ्रष्टाचार, छापेमारी के कारण पढ़ने-सुनने को मिलते रहते हैं । आप आंकड़े उठाकर देख लीजिएगा । डेटा भी इस बात को साबित करेगा कि भ्रष्टाचार करने वाले पत्रकारों की संख्या नेताओं, अफसरों की तुलना में बहुत कम है । भले ही बड़े समाचार पत्र समूह के यहां छापे पड़े हों लेकिन अधिकांश पत्रकारों के यहां जांच एजेंसियों के छापे भी नहीं डलते हैं । इस मामले में कुछ मीडिया समूह या पत्रकार अपवाद हो सकते हैं । ऐसे अपवाद के कारण सभी पत्रकारों को भ्रष्ट कहना, बदनाम करना ठीक नहीं है । हमें यह मानना होगा कि बढ़ती मंहगाई और भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा परेशानी समाज के पिछड़े -कमजोर वर्ग, श्रमिकों के साथ पत्रकारों को भी हो रही है ।
बढ़ती मंहगाई में छोटे शहरों में रहने वाले पत्रकारों का जीवन- यापन मुश्किल हो गया है ।
दूसरी ओर कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो कि यह मानते हैं कि मीडिया की लाइन में ऐसे ऐसे लोग आ गए हैं जो इस पेशे की गंभीरता को नहीं समझते हैं । ऐसे लोगों का आचरण, कार्य, व्यवहार, पत्रकारिता के अनुरूप नहीं है । ऐसे लोग जो गरिमा विहीन पत्रकारिता कर रहे हैं, उनको ध्यान में रखकर अब सरकार सख्त नियम लागू कर रही है । बहरहाल अखबार पत्रिका के लिए नए नियमों का समर्थन और विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क लेकिन यह तय है कि इन नियमों की मार छोटे पत्र पत्रिकाओं और अखबार वालों पर ज्यादा पड़ेगी।
इस संबंध में अनेक समाचार पत्रों पत्रिकाओं के प्रतिनिधि अपनी बात भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय तक पहुंचा रहे हैं । प्रिंट मीडिया के अनेकों एसोसिएशन ने इस संबंध में केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री को पत्र लिखा है और नये नियमों को संशोधित करने की मांग की है ।
नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष रास बिहारी और महासचिव प्रदीप तिवारी ने इस विषय पर चर्चा के लिए पदाधिकारियों की बैठक बुलाई है जिसमें आगामी कार्यवाही के लिए विचार विमर्श किया जाएगा ।
भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य एवं ऑल इंडिया स्मॉल एण्ड मीडियम न्यूजपेपर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय महासचिव अशोक नवरत्न भी यह मानते हैं कि नए नियमों को लागू करते हुए छोटे समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं का संचालन करने वाले पत्रकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए । शासन छोटे और मध्य समाचार पत्रों पत्रिकाओं को सीमित विज्ञापन देता है जबकि बड़े समाचार पत्र समूहों को बेहिसाब विज्ञापन देता है । हमारी मांग है कि छोटे-मध्यम समाचार पत्रों, पत्रिकाओं को सरकार अपना संरक्षण प्रदान करे । विचारणीय बात यह है कि सरकार के हर जिले में सीबीसी, आरएनआई और पीआईबी के कार्यालय ही नहीं है । पीआईबी के कार्यालय प्रदेश की राजधानियों में ही है । हर जनपद के अखबार वाले समाचार पत्रों को जमा करने के लिए प्रदेश की राजधानियों में ही जाना पड़ता है । जो कि व्यय साध्य हैं । वर्तमान में अखबार की जिले के सूचना कार्यालयों, प्रदेश की राजधानियों में सूचना निदेशालय में भी जमा करना होता है । तब फिर अखबार की कॉपी को फोटो खींचकर अपलोड करने का क्या औचित्य है । एक तरफ केंद्र सरकार छोटे व मझौले अखबारों को विज्ञापन तक नहीं दे रही हैं । आखिर सरकार प्रिंट मीडिया को क्यों समाप्त करने पर तुली हुई है । भारतीय प्रेस परिषद ने छोटे व मझौले अखबारों को कागज से GST हटाने का प्रस्ताव पारित करके जीएसटी काउंसिल को भेजा । जिस पर आज तक निर्णय नहीं लिया गया है । भारतीय प्रेस परिषद की विज्ञापन संबंधी मामले की उपसमिति ने काफी समय पहले अपनी सिफारिश परिषद को दी थी जिस पर PCI की चेयरपर्सन ने केंद्र और राज्य सरकार को सिफारिशों को लागू करने को कहा है । आज तक सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है । सरकार को सिफारिशों को तत्काल लागू करना चाहिए । सरकार का भी दायित्व है कि वह अपने नियमों का अनुपालन भी कराए । विज्ञापन संबंधी नीतियों का अनुपालन केंद्र और कोई भी राज्य सरकार नहीं कर रही हैं । सरकार कुछ चुनिंदा अखबारों को ही लाभान्वित कर रही है ।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, संपर्क: 9424466269)

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