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न्यूज पब्लिशर्स (समाचार पत्र प्रकाशक) ने प्रिंट विज्ञापनों की दरों में बढ़ोतरी की तेज की मांग

यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब लगभग सभी इंडस्ट्री बढ़ती लागत का असर अपने ग्राहकों तक पहुंचा चुके हैं। कई कंपनियों ने या तो अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाई हैं या फिर पैकेट का आकार छोटा कर दिया है। पब्लिशर्स का कहना है कि जब दूसरे इंडस्ट्री अपनी लागत की भरपाई कर सकते हैं, तो प्रिंट मीडिया को भी विज्ञापन दरों में संशोधन का अधिकार मिलना चाहिए।

भारत के न्यूज पब्लिशर्स (समाचार पत्र प्रकाशक) ने प्रिंट विज्ञापनों की दरों में बढ़ोतरी की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि न्यूजप्रिंट, ईंधन, परिवहन और अन्य परिचालन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन विज्ञापन दरों में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है। ऐसे में प्रिंट मीडिया का आर्थिक मॉडल लगातार दबाव में आ गया है और विश्वसनीय पत्रकारिता को बनाए रखना पहले से अधिक मुश्किल होता जा रहा है।

यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब लगभग सभी इंडस्ट्री बढ़ती लागत का असर अपने ग्राहकों तक पहुंचा चुके हैं। कई कंपनियों ने या तो अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाई हैं या फिर पैकेट का आकार छोटा कर दिया है। पब्लिशर्स का कहना है कि जब दूसरे इंडस्ट्री अपनी लागत की भरपाई कर सकते हैं, तो प्रिंट मीडिया को भी विज्ञापन दरों में संशोधन का अधिकार मिलना चाहिए।

टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की कंपनी बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO), बोर्ड सदस्य और ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) के वाइस चेयरमैन मोहित जैन ने कहा कि प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री इस समय गंभीर महंगाई के दबाव से गुजर रहा है।

उन्होंने बताया कि रुपये के कमजोर होने, न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों और ईंधन महंगा होने से अखबार प्रकाशित करने की लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है। वहीं डेयरी, FMCG और ऑटोमोबाइल समेत कई इंडस्ट्री पहले ही बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल चुके हैं।

मोहित जैन ने कहा कि न्यूज पब्लिशर्स पर भी वही लागत का दबाव है, इसलिए विज्ञापन दरों में जल्द संशोधन जरूरी है। उनके मुताबिक, न्यूजप्रिंट और वितरण लागत को देखते हुए प्रिंट विज्ञापन दरों में 15 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी की जरूरत है। उनका कहना है कि विश्वसनीय समाचारों का महत्व आज भी पहले जैसा ही है, लेकिन उन्हें तैयार करने और पाठकों तक पहुंचाने की लागत काफी बढ़ चुकी है।

इसी तरह मातृभूमि के प्रबंध निदेशक, इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व सांसद एम. वी. श्रेयम्स कुमार ने भी विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की मांग का समर्थन किया।

उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, न्यूजप्रिंट की बढ़ती लागत और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण प्रिंट मीडिया की आर्थिक स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

श्रेयम्स कुमार ने सवाल उठाते हुए कहा कि अगर विज्ञापन दरें इन वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं बढ़ेंगी तो पब्लिशर अपनी लागत की भरपाई कैसे करेंगे? उन्होंने बताया कि वे काफी समय से बड़े विज्ञापनदाताओं से दरों में संशोधन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है और कोई ठोस फैसला नहीं हुआ।

उन्होंने कहा कि कंपनियां महंगाई का असर अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों तक पहुंचा चुकी हैं। ऐसे में न्यूज पब्लिशर्सों को भी विश्वसनीय पत्रकारिता की बढ़ती लागत निकालने के लिए पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने प्रिंट विज्ञापन दरों में कम से कम 25 फीसदी बढ़ोतरी की मांग की।

पब्लिशर्स का कहना है कि उनकी मांग पर अब तक विज्ञापनदाताओं ने कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है। मोहित जैन और श्रेयम्स कुमार दोनों का कहना है कि वे लंबे समय से विज्ञापन दरों में संशोधन की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।

इसके बावजूद प्रिंट मीडिया आज भी देश के बड़े विज्ञापनदाताओं के लिए एक अहम माध्यम बना हुआ है। FMCG, ऑटोमोबाइल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, रिटेल, रियल एस्टेट, शिक्षा और वित्तीय सेवाओं जैसे कई बड़े सेक्टर अब भी अखबारों में बड़े पैमाने पर विज्ञापन देते हैं।

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की सचिव सुजाता गुप्ता ने कहा कि विश्वसनीय पत्रकारिता तैयार करने की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि पब्लिशर समय-समय पर अपनी व्यावसायिक कीमतों की समीक्षा करें। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विज्ञापन दरों को लेकर अंतिम फैसला हर पब्लिशर अपने बाजार और कारोबारी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र रूप से करता है।

इस मुद्दे पर e4m ने इंडियन सोसाइटी ऑफ एडवरटाइजर्स (ISA) और FMCG व ऑटोमोबाइल क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों से प्रतिक्रिया मांगी। खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला था। वहीं मारुति सुजुकी ने कहा कि कंपनी फिलहाल मेंटेनेंस शटडाउन पर है और अगले सप्ताह इस विषय पर प्रतिक्रिया देगी।

भारत का प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री आज भी सालाना 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का विज्ञापन कारोबार करता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र की वृद्धि काफी धीमी रही है।

प्रिंट मीडिया में न्यूजरूम चलाने, प्रिंटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने, कागज खरीदने और अखबारों को देशभर में वितरित करने जैसी कई स्थायी लागतें होती हैं। मौजूदा महंगाई के दौर में इन सभी खर्चों में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

पब्लिशर्स का कहना है कि न्यूजप्रिंट उनकी सबसे बड़ी लागतों में से एक है। इसकी कीमत वैश्विक कागज आपूर्ति, शिपिंग खर्च और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति पर निर्भर करती है। रुपये के कमजोर होने से आयातित न्यूजप्रिंट और महंगा हो जाता है। इसके अलावा ईंधन महंगा होने से देशभर में अखबार पहुंचाने का खर्च भी काफी बढ़ गया है।

पब्लिशर्स का तर्क है कि जब किसी इंडस्ट्री की उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा देती हैं। उसी तरह मीडिया इंडस्ट्री को भी अखबार तैयार करने की बढ़ती लागत के अनुरूप विज्ञापन दरों में बदलाव करने का अधिकार मिलना चाहिए।

हालांकि विज्ञापन क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इस मुद्दे को केवल लागत के नजरिए से नहीं देखते।

एक मार्केटिंग विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि विज्ञापन दरों में किसी भी बढ़ोतरी का फैसला केवल रेट कार्ड बदलने भर का मामला नहीं होता। विज्ञापनदाता किसी भी माध्यम की पहुंच, पाठकों की संख्या, प्रभाव, संबंधित इंडस्ट्री की मांग और डिजिटल, टेलीविजन, आउटडोर व रिटेल मीडिया जैसे अन्य विकल्पों की भी तुलना करते हैं। इसलिए यह फैसला काफी जटिल होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि इंडियन रीडरशिप सर्वे (IRS) वर्ष 2019 के बाद से नहीं हुआ है। ऐसे में प्रिंट मीडिया की मौजूदा पहुंच और पाठकों के आंकड़ों का अभाव भी इस चर्चा को और कठिन बना देता है।

एक अन्य मार्केटिंग विशेषज्ञ ने कहा कि प्रिंट मीडिया आज भी भरोसेमंद, क्षेत्रीय पहुंच वाला और प्रीमियम समाचार वातावरण उपलब्ध कराता है। लेकिन दूसरी तरफ विज्ञापनदाता भी अपने मार्केटिंग बजट पर पहले से ज्यादा सख्ती से नजर रख रहे हैं। अब वे ऐसे प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां निवेश के परिणामों को आसानी से मापा जा सके और जरूरत के हिसाब से विज्ञापन रणनीति बदली जा सके।

भारतीय समाचार पब्लिशर्स के सामने केवल प्रिंट मीडिया की लागत ही चुनौती नहीं है। डिजिटल समाचार कारोबार भी तेजी से बदल रहा है।

वेबसाइट ट्रैफिक में उतार-चढ़ाव, सोशल मीडिया और सर्च प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म में बदलाव, खबरें पढ़ने की बदलती आदतें और AI प्लेटफॉर्म से उचित भुगतान को लेकर जारी बहस ने डिजिटल मीडिया की कमाई पर भी असर डाला है।

इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए कई मीडिया संस्थान वीडियो कंटेंट, इवेंट्स, डिजिटल सब्सक्रिप्शन, B2B सेवाएं, न्यूजलेटर, पेवॉल और बॉट-ब्लॉकिंग जैसी नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। हालांकि इन मॉडलों को बड़े स्तर पर सफल होने में अभी समय लगेगा। फिलहाल अधिकांश पारंपरिक मीडिया संस्थानों के लिए प्रिंट विज्ञापन ही आय का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।

यही वजह है कि विज्ञापन दरों में बढ़ोतरी की मौजूदा मांग केवल कीमत बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बड़े सवाल से जुड़ी है कि जब विश्वसनीय पत्रकारिता तैयार करने और उसे पाठकों तक पहुंचाने की लागत लगातार बढ़ रही है, तब विज्ञापनदाता समाचार माध्यमों का मूल्यांकन किस तरह करें।

प्रिंट मीडिया के साथ-साथ डिजिटल समाचार पब्लिशर भी विज्ञापन दरों को लेकर दबाव महसूस कर रहे हैं।

केंद्र सरकार ने पिछले आठ वर्षों में लोकप्रिय डिजिटल विज्ञापन फॉर्मेट की सरकारी दरों में लगभग 50 फीसदी तक कटौती की है। दिसंबर 2024 में जारी संशोधित दरों के अनुसार, 50 लाख से अधिक मासिक यूनिक यूजर्स वाले ग्रुप-ए पब्लिशर्स के लिए सबसे लोकप्रिय 320×250 पिक्सल बैनर का कॉस्ट पर थाउजेंड इम्प्रेशन (CPTI) वर्ष 2016 और 2020 में 45 रुपये था, जिसे घटाकर 2024 में 25 रुपये कर दिया गया।

एक पब्लिशर ने कहा कि डिजिटल विज्ञापन बाजार तेजी से बदल चुका है, लेकिन इसके बावजूद सरकार की आधिकारिक विज्ञापन दरों में वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि पब्लिशर्स ने कई बार सरकार से इन दरों की समीक्षा करने का आग्रह किया, लेकिन उनकी मांग पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया।

इस तरह प्रिंट और डिजिटल, दोनों ही क्षेत्रों में बढ़ती लागत और अपेक्षाकृत कम विज्ञापन आय भारतीय समाचार पब्लिशर्स के सामने बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है।

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