6 महीने हो गये सुब्रत रॉय की मौत को लेकिन ये सवाल सवाल ही रह गया कि आखिर वे 25,000 करोड़ रुपये आए कहां से थे?

1978 में शुरू की गई सहारा कंपनी पंख फैलाकर भारत में छाने की तैयारी कर रही थी कि सब चौपट हो गया. 2010 से पहले सबकुछ ‘अच्छा’ चल रहा था. कंपनी लगातार बढ़ रही थी. सहारा ग्रुप, ग्रुप न होकर खुद को एक परिवार कहता था. परिवार की कहानी भी बड़ी रोचक है, आगे बताएंगे. 2010 में सहारा ग्रुप की एक कंपनी ‘सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड (Sahara Prime City Limited)’ ने बाजार नियामक SEBI के पास आईपीओ लाने के लिए DRHP जमा किया. हर कंपनी बाजार से पैसा उठाने से पहले ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) जमा करती है, जिसमें कंपनी से जुड़ी पूरी वित्तीय जानकारी होती है.

IPO लाने की नहीं सोचते सुब्रत रॉय तो सबकुछ चलता रहता OK! जानिए सहारा के ‘बेसहारा’ होने की पूरी कहानी

अप्रैल 2017 में जेल से अस्थायी रिहाई के बाद सुप्रीम कोर्ट में सुब्रत रॉय (फोटो: गेटी इमेजेज़)सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय (Subrata Roy) की मृत्यु के साथ ही शायद यह राज हमेशा के लिए राज रह जाएगा कि आखिर वे 25,000 करोड़ रुपये आए कहां से थे. सहारा ग्रुप से लिए गए 25 हजार करोड़ रुपये अब भी शेयर मार्केट रेगुलेटर सेबी के पास रखे हुए हैं, जिन पर किसी ने भी दावा नहीं किया है. रहस्य बरकरार है कि इतना पैसा कहां से आया? निवेशकों को अपना पैसा वापस पाने के लिए पोर्टल खुले भी कई साल हो गए हैं, मगर अभी तक केवल 138 करोड़ रुपये ही क्लेम किए गए हैं. 25,000 करोड़ में से केवल 138 करोड़!

14 नवम्बर 2023 को सहारा चीफ सुब्रत रॉय ने अंतिम सांस ली. सुब्रत रॉय की मौत के बाद से ही खबरें हैं कि सेबी के पास रखे बे-दावा (Unclaimed) 25,000 करोड़ रुपये सरकार के कंसोलिडेटेड फंड में जमा किया जा सकता है. मगर अहम सवाल वहीं का वहीं है कि हजारों करोड़ रुपये आए कहां से थे? किसके थे? कोई क्लेम करने क्यों नहीं आया? क्या से पैसा आसमान से टपका था? हम इसे आसान भाषा में समझाने की कोशिश कर रहे हैं.

1978 में शुरू की गई सहारा कंपनी पंख फैलाकर भारत में छाने की तैयारी कर रही थी कि सब चौपट हो गया. 2010 से पहले सबकुछ ‘अच्छा’ चल रहा था. कंपनी लगातार बढ़ रही थी. सहारा ग्रुप, ग्रुप न होकर खुद को एक परिवार कहता था. परिवार की कहानी भी बड़ी रोचक है, आगे बताएंगे. 2010 में सहारा ग्रुप की एक कंपनी ‘सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड (Sahara Prime City Limited)’ ने बाजार नियामक SEBI के पास आईपीओ लाने के लिए DRHP जमा किया. हर कंपनी बाजार से पैसा उठाने से पहले ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) जमा करती है, जिसमें कंपनी से जुड़ी पूरी वित्तीय जानकारी होती है.

कंपनी के पास कैश तो काफी था, मगर उसे अपनी ‘बड़ी योजनाओं’ को सिर चढ़ाने के लिए और पैसे की जरूरत थी. कंपनी बढ़ते भारत के साथ खुद बढ़ने के लिए बड़े पुल, एयरपोर्ट्स, और रेलवे सिस्टम से जुड़े इंफ्राप्रोजेक्ट्स में हाथ डालना चाहती थी. इसी कारण सहारा अपना आईपीओ लाना चाहती थी. ड्राफ्ट जमा होने के बाद सेबी उसे पूरी तरह से एनालाइज़ करता है. इसी प्रक्रिया में सेबी ने पाया कि सहारा ने अपनी 2 अन्य कंपनियों के माध्यम से पहले ही 19,000 करोड़ रुपये जुटाए हैं. इसके लिए दोनों कंपनियों ने 2 करोड़ों निवेशकों से पैसा लिया था. ये दो कंपनियां थीं- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड. बस, सेबी की इसी फाइडिंग के बाद से सहारा और सुब्रत रॉय के सितारे गर्दिश में जाने लगे.

SEBI ने सहारा से पूछा कि 19,000 करोड़ रुपये कोई छोटी-मोटी राशि नहीं है. ऐसे में इतना बड़ा फंड जुटाने के बारे में आपने पहले जानकारी क्यों नहीं दी? सहारा की तरफ से जवाब आया कि फंड जुटाने की यह प्रक्रिया आम लोगों के लिए खुली नहीं थी. इसमें केवल मित्रों, कर्मचारियों, और सहारा ग्रुप के ही कुछ अन्य सदस्यों ने हिस्सा लिया था. कुल मिलाकर, यह एक प्राइवेट फंड रेज़ था. चूंकि बॉन्ड्स को स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट नहीं किया जाना था, इसी वजह से SEBI को जानकारी नहीं दी गई.

दरअसल, सहारा की इन दोनों कंपनियों ने लोगों से पैसा जुटाए और इसके बदले में उन्हें OFCDs (ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल अन-सिक्योर्ड डिबेंचर्स) दिए. पैसों के बदले में यह एक तरह की सिक्योरिटी थी कि जब कंपनी लिस्ट होगी तो निवेशकों को इसके बदले में शेयर मिल जाएंगे, जिन्हें बाजार में ट्रेड किया जा सकेगा.

नियम कहते हैं कि इस तरह की प्राइवेट फंडरेजिंग हो सकती है, मगर वह तब तक ही प्राइवेट रहती है, जब तक कि उसमें 50 से कम लोग शामिल रहे हों. 50 से अधिक लोगों से इस तरीके से जुटाया गया फंड पब्लिश इश्यू में आता है, और इसके बारे में सेबी से परमिशन लेना जरूरी है.

10 लाख एजेंट, 3 हजार ब्रांच, 3 करोड़ लोग
हजारों करोड़ की कंपनी भला सेबी के आगे घुटने कैसे टेक देती? सहारा ने दावा किया कि यह पैसा उसने अपने ‘परिवार’ से जुटाया है. सहारा अपने कर्मचारियों, ग्राहकों और खुद को एक परिवार कहता था. इसी ‘परिवार’ से पैसा जुटाने के लिए सहारा ने अपने 10 लाख एजेंट्स लगा दिए. लगभग 3 हजार ब्रांच ऑफिस खोले गए, जहां ‘परिवार के निवेशक’ अपना पैसा जमा करवा सकते थे. लगभग 3 करोड़ लोगों को निवेश के लिए आमंत्रित किया गया. आमंत्रित किए गए लोग जितना पैसा जमा करना चाहते थे, डाल सकते थे. यहां तक कि यदि कोई 20 रुपये देने आया तो उसे भी लौटाया नहीं गया.

क्यों धड़ाधड़ पैसा दे रहे थे लोग
सहारा ने लोगों को कथित तौर पर तगड़े रिटर्न का लालच दिया. कहा गया कि यदि वे अपनी डेली कमाई का कुछ भाग भी निवेश करते हैं तो उनका पैसा दोगुना-तिगुना हो जाएगा. कंपनी ने लोगों को दोगुना-तिगुना रिटर्न दिया भी, जिससे कि लोगों को भरोसा होता गया. मगर इतना मोटा रिटर्न दिया कैसे?

कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि कंपनी नए निवेशकों से जो पैसा ले रही थी, वही पैसा उन लोगों को लौटा रही थी, जिनका टर्म पूरा हो रहा था. मतलब एक हाथ लेकर, दूसरे हाथ दे रही थी. इसी को पॉन्जी स्कीम कहा जाता है. मतलब ऐसा कोई कारोबार नहीं था, जहां से पैसा कमाकर दो-तीन गुना पैसा लौटाया जा रहा हो. हालांकि सहारा के हाथ में तब तक कई काम थे. सहारा के पास फाइनेंशियल इंस्टटीट्यूट था, एक हाउसिंग फाइनेंस करने वाली कंपनी थी, सहारा समय के नाम से एक मीडिया संस्थान था. इसके अलावा एक एयरलाइन, हॉस्पैटिलिटी बिजनेस, और एक फॉर्मूला वन टीम में हिस्सेदारी भी थी. एक समय था, जब सहारा भारत की क्रिकेट टीम को भी स्पॉन्सर करती थी.

भारी पड़ा SEBI को आंख दिखाना
चूंकि सेबी को हजारों करोड़ जुटाने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी, तो सेबी ने इसे अवैध करार दिया. सेबी ने जो कहा, वह महत्वपूर्ण था. सेबी ने कहा- सहारा ने उन निवेशकों के पैसे की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की. कोई लीगल फ्रेमवर्क नहीं था, कोई कंप्लायंस नहीं था. कुछ भी नहीं था. ऐसा कहते हुए सेबी ने आदेश पारित किया कि सहारा अपने सभी निवेशकों को उनका पूरा पैसा लौटाए. साथ ही सहारा प्राइम सिटी के IPO को भी सार्वजनिक होने से रोक दिया.

सहारा ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी. कई बार सुनवाई हुई, मगर सहारा की कोई दलील अदालत के हलक नहीं उतरी. अंत में अदालत ने कह दिया कि सहारा ने जो भी पैसा इकट्ठा किया है, उसे सेबी के पास जमा करवा दे. सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वह भी ध्यान देने योग्य है-

“आप (सहारा) हमें बताएं कि उस पैसे का सोर्स क्या है? क्या आपने अन्य कंपनियों या अन्य योजनाओं से 24,000 करोड़ रुपये जुटाए? या आपने इतना पैसा बैंक अकाउंट से निकाला? या आपने प्रॉपर्टी बेचकर इसे हासिल किया? यह इन्हीं में से कहीं से आया होना चाहिए. पैसा आसमान से बरसता नहीं है. आपको यह दिखाना ही होगा आप कहां से इतना पैसा लाए… हमारे सामने पुराने पुलिंदे खोलने की जरूरत नहीं है, आप हमें केवल ये बताएं कि इस पैसे का सोर्स क्या है, और हम इस केस को अभी के अभी बंद कर देंगे. बताएं कि 24,000 करोड़ रुपये कैसे जुटाए?”

सेबी की कस्टडी में पैसा
सहारा ने यहां तक भी कहा कि कंपनी उन लोगों का पैसा वापस कर चुकी है, जिनसे लिया था, लेकिन कोर्ट को इस बात पर भरोसा नहीं हुआ. भरोसा इसलिए नहीं हुआ कि इस तरह के किसी इवेंट के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. जब सुप्रीम कोर्ट सहारा के किसी जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ तो, सेबी ने सहारा ग्रुप से कुछ हजार करोड़ रुपये लेकर सरकारी बैंकों में जमा करवा दिए. सरकारी बैंकों के माध्यम से यह पैसा निवेशकों को लौटाने का प्रावधान किया गया. सेबी की ताजा स्टेटमेंट के हिसाब से यह अमाउंट 25,000 करोड़ रुपये था.

क्या अभी भी ले सकते हैं पैसा वापस
जी हां, यदि आप या आपके पास-पड़ोस में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने सहारा में कभी कभी निवेश किया था और अभी तक पैसा वापस नहीं लिया है तो वह अब भी पैसे पर क्लेम कर सकता है. इसके लिए सरकार ने रिफंड पोर्टल शुरू किया हुआ है. इस पोर्टल पर जाकर आपको जरूरी जानकारी देनी होगी और उसके पास पैसा आपको लौटा दिया जाएगा.

सहारा की चेयरपर्सन स्वप्ना रॉय के पास कोई संपत्ति नहीं बची है जिसे कुर्क किया जा सके- जांच रिपोर्ट

सहारा ग्रुप की चेयरपर्सन स्व्प्ना रॉय के पास कोई संपत्ति नहीं बची है जिसे कुर्क किया जा सके. यह एक मामले की जांच कर रहे जांच अधिकारी ने सिद्दार्थनगर पुलिस को लिखकर दिया है.

दरअसल, वाद संख्या- 1234,2022 के मुकदमा नंबर 97,2021 की धारा 406,420 के मामले में एसआई जालंधर प्रसाद हमराह हेड कांस्टेबल अमिताभ सिंह फौजदार के साथ अभियुक्त बने ओमप्रकाश श्रीवास्तव, सुब्रत रॉय और स्वप्ना रॉय के सहारा शहर, विपुलखण्ड, गोमतीनगर.. लखनऊ पहुंचे थे.

एसआई जालंधर के मुताबिक,.. “सिद्धार्थनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित धारा 83 सीआरपीसी का आदेश लेकर पहुंचे थे. पते पर पहुंचे तो घर में ताला लटकने के साथ ही सुब्रत रॉय पुत्र स्व. सुधीर चंद्र रॉय का मृत्यु प्रमाण उपलब्ध कराया गया. इसके बाद उनकी पत्नी स्वप्ना रॉय का पता किया तो उनके वकील चन्द्रकांत राय व गार्डों ने बताया कि सहारा शहर में स्वप्ना रॉय के नाम से कोई चल अचल संपत्ति नहीं है. क्योंकि पूरा शहर साहारा इण्डिया कामर्शियल कार्पोरेशन लिमिटेड के नाम से है. कहा गया कि स्वप्ना राय यहां रहती भी नहीं हैं. पता ठीक न होने के कारण सुब्रत व स्वप्ना पर धारा 83 की कार्यवाही नहीं की जा सकी.” एसआई जालंधर नेउक्त प्रकरण में अन्य किसी पुलिस कार्यवाही की जरूरत प्रतीत नहीं हो रही.

देखें एसआई जालंधर की रिपोर्ट..और उससे नीचे अदालत का कुर्की आदेश…

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