अमर उजाला, उत्तराखंड में वरिष्ठता हो रही लहूलुहान, कई नाराज

अमर उजाला, उत्तराखंड में वरिष्ठता हो रही लहूलुहान, कई नाराज
अमर उजाला, उत्तराखंड में वरिष्ठता को लहूलुहान किया जा रहा है। यहां सेटिंग और गेटिंग का ऐसा काकटेल बना है जिससे न पीने वाला भी अब पूरे नशे में है और बिना कुछ देखे ही फैसले पर फैसले किए जा रहा है। दो दो सीनियरों के रहते हुए कम अनुभवी और जूनियर को स्थानीय संपादक की कुर्सी सौंपना और यह भी न सोचना कि अखबार का भविष्य क्या होगा, अखबार की साख तो प्रभावित नहीं होगी, वरिष्ठों में क्या संदेश जाएगा को दरकिनार करके अखबार को पूरी तरह से मटियामेट करने पर तुला हुआ है। हालांकि उसके इस फैसले से अंदरखाने काफी नाराजगी है पर कोई भी उस फैसले के खिलाफ बोल नहीं रहा है जिससे वह निशाने पर आए जाए। जैसा कि अखबारों में होता रहा है। यदि आपने किसी अधिकारी के खिलाफ, उसके आदेश के खिलाफ आवाज उठाई तो उसे अनुशासनहीनता मानी जाएगी और आपकी नौकरी उसी दिन संकट में पड़ जाएगी जिस दिन आपने मुखालफत की, पर उत्तराखंड में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि यहां सीनियरों के साथ न केवल नाइंसाफी हुई है बल्कि दो दो सीनियरों के रहते हुए कम अनुभवी अनूप बाजपेयी को हल्दवानी की कुर्सी सौंपकर प्रबंधन ने सभी को ताकीद कर दिया है कि कंपनी के लिए आप जिएं या मरें आगे वही बढ़ेगा जो सेटिंग गेटिंग के फार्मूल में आगे रहेगा।

एक सूत्र ने बताया कि इस अखबार में एक पूर्व संपादक की अभी भी तूती बोलती है। अनूप वाजपेयी को लाने में उनका रोल अहम माना जा रहा है। उन्होंने सुनील शाह के आकस्मिक निधन के बाद लाबिंग की और फिर डीएनई के रूप में तैनात अनूप वाजपेयी को हल्दवानी की कुर्सी दिला दी। जबकि देहरादून में ही एक सीनियर एनई पुरुषोतम कुमार और एनई ओमप्रकाश तिवारी पहले से ही मौजूद थे। उसपर भी मजेदार बात यह कि ओम प्रकाश तिवारी को तीन साल से नोएडा इसीलिए साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता रहा है कि आने वाले दिनों में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। पर प्रबंधन ने उनके भी इस दावे पर विचार नहीं पर चलिए यदि प्रबंधन ने ओमप्रकाश तिवारी को कमान नहीं दिया सो नहीं दिया पर हल्दवानी में सीनियर एनई पुरुषोतम कुमार की दावेदारी तो बनती ही थी। अनूप वाजपेयी रिपोर्टिंग के आदमी हैं, बेहतर हैं, पर डेस्क का अनुभव उनके पास कम है इसलिए इस लिहाज से भी देखा जाए तो पुरुषोतम कुमार और ओमप्रकाश तिवारी की दावेदारी अनूप से ज्यादा बनती थी। पर ऐसा नहीं किया गया। यहां वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए अनूप को कुर्सी दे दी गई। एक सूत्र ने बताया कि अखबार के एक पूर्व संपादक पहले से भी इस गुणाभाग में रहे हैं कि कैसे अपने ही लोगों को उच्च कुर्सियों पर विराजमान कराया जाए और अखबार को अखबार के बाहर रहकर भी नियंत्रित किया जाए। वे नियंत्रित करते भी हैं पर प्रबंधन आंख पर पट्टी बांधे हुए हैं और लोग अपनी मनमानी करते जा रहे हैं। ये ऐसे लोग हैं जो अखबार के बाहर रहकर अखबार को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

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देहरादून में कर्मचारियों की कमी
यहीं नहीं देहरादून में कर्मचारियों की भी कमी है। उसपर यहां से कुमार अतुल और प्रवेश कुमारी का भी तबादला कर दिया गया। खबर है कि कुछ लोग यदि साप्ताहिक अवकाश पर होते हैं तो संपादक को यहां दो दो बजे रात तक रुककर पेज बनवाना पड़ता है। फिर वह संपादक अखबार के बारे में क्या सोचेगा जो रात्रि के दो दो बजे तक पेज लगवाता रहता है।
पर जो भी हो इस समय अमर उजाला उत्तराखंड अपने बुरे दौर से गुजर रहा है जहां यूनिट ने न तो कर्मचारी हैं और न ही चैन। सभी बेचैन हैं और आने वाले दिनों में मौके की ताक में है कैसे यहां से नई गाड़ी पकड़े। हालांकि कुछ लोगों ने हिंदुस्तान की राह पकड़ भी ली है।

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