पत्रकार का मतलब पुलिस का तलवा चाटना नहीं, थाने में घुस कर………………..

चाहे यूपी हो, एमपी, हरियाणा, पंजाब, या फिर देश की राजधानी दिल्‍ली ही क्‍यों न हो, चंद पत्रकारों को छोड़ दिया जाए तो पूरी की पूरी पत्रकारिता अब केवल दलाली के ही सिलेबस पर चल रही है। अब हालत तो यह है कि ऐसे पत्रकार अपनी प्रतिबद्धता आम आदमी और खबरों को छोड़ कर अपने राजनीतिक और अफसरशाही आकाओं के चरणों के सामने माथा टिकाते हैं। उनके सामने अब खबर नहीं, दलाली ही असल पत्रकारिता बनती जा रही है।

लेकिन ऐसा नहीं कि ऐसे लोग अब स्‍वर्ग-सिधार गये हैं, जिन्‍हें पत्रकरिता के आधारों-स्‍तम्‍भों पर आस्‍था ही नहीं रह चुकी है। ऐसे लोग अब केवल पत्रकारिता ही नहीं, बल्कि अपने जीवन, परिवार और अपने आसपास-दूरदूर तक के समाज तक लगातार न केवल कड़ी-तेज नजर रखे रखते हैं, बल्कि उस पर तत्‍काल हस्‍तक्षेप भी करते हैं। भले ही यह हस्‍तक्षेप उनकी कलम से निकलता हो, या फिर उनके बाहुबल से, अन्‍याय का प्रतिरोध कर देना ही उनका लक्ष्‍य है।

आनन्‍द स्‍वरूप वर्मा ऐसे ही शख्‍स हैं, जिससे हमारी पत्रकारिता जिन्‍दा है। श्री वर्मा जैसे पत्रकार भले ही आज लुप्‍तप्राय श्रेणी में पहचाने जाते हों, लेकिन उनके गिने-चुने लोगों ने ही पत्रकारिता और आम आदमी के आक्रोश और अभिव्‍यक्ति को पत्रकारिता की असली पहचान किसी खरे कसौटी-पत्‍थर की तरह कस रखा है। पैंसठ की उम्र के आगे खिसक चुके वर्मा ने देश ही नहीं, विभिन्‍न देशों और खास कर गरीब-बेहाल तीसरी दुनिया के देशों जन आंदोलनों को आवाज देना अपना जीवन मान रखा है। पिछले करीब चालीस बरसों से समकालीन तीसरी दुनिया नाम की अपनी मासिक पत्रिका के संस्‍थापक सम्‍पादक हैं श्री वर्मा। दुख बात यह है कि कठिन आर्थिक संकटों के सामने हर कर फिलहाल यह पत्रिका का प्रकाशन पिछले ही महीने बंद हो गया। फिलहाल अब उनका इरादा फिर से अनुवाद करना है, जिसमें उन्‍हें खासी महारत और शोहरत है।

बलिया के सिकंदरपुर से आगे बेल्‍थरा रोड पर ही लबे सड़क एक गांव के रहने वाले श्री वर्मा ने अपनी पढ़ाई और पत्रकारिता का जीवन यूपी के गोरखपुर से शुरू किया। लेकिन उसके बाद वे दिल्‍ली पहुंच गये। बाद में नोएडा के सेक्‍टर-12 में बस गये। सन-82 से सन-84 तक उन्‍होंने साप्‍ताहिक सहारा में संयुक्‍त सम्‍पादक का काम सम्‍भाला, लेकिन आखिरकार नौकरी को छोड़ कर वे फिर अपनी पत्रिका समकालीन तीसरी दुनिया में जुट गये। पिछले दिनों अपने दिल्‍ली प्रवास के दौरान मेरी उनसे लम्‍बी बातचीत हुई। उसी भेंट में उन्‍होंने उस घटना का ब्‍योरा दिया।

हुआ यह कि श्री वर्मा की एक करीबी बच्‍ची एक दिन अपने मामा के साथ नोएडा में ही रिक्‍शे से जा रही थी। कोई 15 साल पहले की घटना है, जब एक पुलिस वाले ने उन्‍हें टोका और निहायत बदतमीजी से बात करते हुए रिक्‍शे से उतारा। जिस शब्‍दावली में उस दीवान से बात की, उसको यहां बयान कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं। बावजूद इसके कि उस बच्‍ची ने बताया कि मैं अपने मामा के साथ हूं, उस दीवान शालीनता की सारी हदें पार करते हुए उन दोनों को थाने तक घसीट ले गया। खबर मिलते ही श्री वर्मा थाने पहुंचे। रोती हुई बच्‍ची ने पूरा किस्‍सा बयान किया।

यह सुनते ही वर्मा जी का गुस्‍सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्‍होंने आव देखा न ताव, सीधे थाने में घुसे और जिस दीवान की ओर बिटिया ने इशारा किया, उसका कॉलर पकड़ कर उन्‍होंने जुतियाना और लतियाना शुरू कर दिया। यह हंगामा देखते ही पहरे पर तैनात रायफलधारी सिपाही ने वर्मा जी पर हाथ उठाने की हिमाकत की, तो वर्मा जी के एक जोरदार कंटाप-झांपड़ ने उसे चारों खाने चित्‍त कर दिया। बिलकुल चौकोर, हाथ-पांव चियार के। वर्मा जी को याद है कि उस दीवान का नाम था अतर सिंह। बाद में वहां मौजूद पुलिसवालों ने भी बताया कि वे दोनों अभद्र पुलिसवाले विभाग में कलंक हैं, और उनकी करतूतों से वे भी आजिज आ चुके थे। लेकिन अपने बड़े अफसरों का मुंहलगे होने के चलते उनकी दबंगई की दूकान चल रही थी।

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बहरहाल, बात आगे बढ़ी तो कप्‍तान ने उन दोनों को सस्‍पेंड कर दिया। अगले करीब पांच बरसों तक वे दोनों सस्‍पेंड ही रहे और उसके बाद भी बाकी नौकरी उन्‍हें लाइन हाजिरी में बितानी पड़ी।

अब जरा उन पत्रकारों की बात कीजिए, जो पत्रकार होने के बावजूद अपने और अपने आसपास हो रहे अत्‍याचार-अन्‍याय को या तो चुपचाप सहन कर लेते हैं, या फिर उन्‍हें चंद नोटों के सहारे पचा जाते हैं। ऐसी घटनाएं-सूचनाएं उनकी कमाई का जरिया बन जाती हैं। अब आपसे एक गुजारिश है कि आप अपने गिरेहबान में झांकिये कि आपने अपने या अपने किसी दूसरे साथी के साथ हुए ऐसे किसी हादसे पर कोई हस्‍तक्षेप किया या नहीं। अगर आप ईमानदारी से खुद से पूछेंगे, तो आपको इस सवाल का जवाब न से ही मिलेगा। सच तो तो यह है कि अधिकांश पत्रकार अपने और अपने साथियों के साथ हो रहे अन्‍याय-अत्‍याचार की घटनाओं को अधिक से अधिक मूल्‍य वसूल कर बेच देते हैं।

लेकिन शर्मनाक यह कि हमारे पत्रकार पुलिस की दलाली को ही अपनी पवित्र-पत्रकारिता पूजते हैं। बेगैरती का आलम यह कि अपनी सुरक्षा के नाम पर दो-एक चुगद-नुमा पुलिस का अंगरक्षक तक झपट लेते हैं।

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