भारतीय प्रेस-क्‍लब: सिर्फ दारूखोरी और घटिया अराजकता

देश के पत्रकारों की राष्‍ट्रीय एकजुटता की प्रतीक-संस्‍था है भारतीय प्रेस क्‍लब। संसद के ठीक सामने। दिल्‍ली में किसी से भी पूछ लीजिए, कोईै भी शख्‍स आपको बता देगा कि इसका अता-पता। इसके बावजूद आम आदमी को इस क्‍लब में घुसने की इजाजत नहीं होती है। लोगों की नजरें प्रेस क्‍लब के बारे में ठीक उसी तरह चौंक पड़ती हैं, जैसे पार्लियामेंट या चिडि़याघर में बने बब्‍बर शेर की मांद। कोई साहस नहीं करता वहां घुसने की। आखिरकार बड़े-बड़े पत्रकारों का ठीहा माना जाता है प्रेस-क्‍लब, जहां दिग्‍गज पत्रकारीय दायित्‍वों का निर्वहन होता है।

आजकल मैं दिल्‍ली में ही हूं। कोई खास वजह नहीं, सिर्फ तफरीह के लिए, दोस्‍तों से मिलने के लिए, पुराने रिश्‍ते ताजा करने के लिए।  दिल्‍ली के कई मित्रों ने नाश्‍ता कराने के लिए अपनी गाड़ी पर मुझे लाद लिया और मैं सीधे पहुंच गया प्रेस-क्‍लब। तारीख थी 23 मार्च, और समय था सुबह साढे़ नौ बजे। गेट के आसपास ही कुछ अन्‍य भी मित्र मिल गये। काफी देर तक तो सड़क पर उनके गले लगना, हा-हा, हो-हो करना चलता रहा। उसके बाद मैं उन सभी लोग उस इमारत में भीतर घुसे, जिसे पत्रकारों के सर्वोच्‍च सम्‍मान की पहचान माना जाता है।

कहने की जरूरत नहीं कि 23 मार्च हमारे देश के लिए एक अमिट और दुखों के संदर्भ में अविस्मरणीय क्षणों में शामिल है। शायद 30 जनवरी यानी बापू की हत्‍या का काला दिन। इसी 23 मार्च को देश की आजादी के मतवाले भगत सिंह, राजगुरू और बिस्‍मल को गोरी हुकूमत ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था। तो जिस दिन का किस्‍सा मैं बता रहा  हूं, वह यही दुखद दिन है, और कहने की जरूरत नहीं कि ठीक इसी दिन प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया ने अपने इस राष्‍ट्रीय दुख को शराब में डुबो डालने की कसम खाते हुए आने वाले हर पत्रकार और उसके साथ स्‍याह-सफेद धंधेबाजी करने वाले प्रत्‍येक दल्‍लों-फल्‍लों के सामने एक नयाब परियोजना परोस डाली।

लेकिन इसके घुसते ही इसके सम्‍मान को लेकर फैले सारे भ्रम रेत के टीले की तरह ढहने लगे। जो सुना होगा आपने प्रेस क्‍लब के बारे में, उससे ठीक उलट। निरा मृग-तृष्‍णा। रिसेप्‍शन में ही स्‍कूली ब्‍लैक-बोर्ड की मानिंद एक नोटिस बोर्ड पर चाक से लिखी हुई एक नोटिस मेरे दिल-दिमाग को गनागना गयी। पहला भ्रम तो यहीं से टूटना शुरू हो गया। वहां आगन्‍तुकों के स्‍वागत के लिए लिखी इबारतें नहीं, बल्कि किसी घटिया होजरी-सेल का नारा जैसा चस्‍पां था।

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4- फैशन वोदका

5- ओपीएम वोदका

आप नहीं समझे हों तो हम आपको बताये देते हैं। अरे यह कीमती दारू का नाम है और जो आफर दिया गया है, उसका मतलब यह है कि आप दो पैग दारू अगर खरीदेंगे, तो आपको एक पैग मुफ्त में मिलेगा। हमारे यूपी में पैग का मतलब कुज्‍झा, ग्‍लास या चुल्‍लू माना जाता है। मतलब यह कि आप पूर्वांचली अंदाज में अगर दो चुल्‍लू में अपनी नाक डुबायेंगे, तो तीसरी बार आपकी नाक को फ्री में डुबो दिया जाएगा।

आप जरा गौर से देखिये तो यहां पत्रकारिता के पराड़कर नहीं, बल्कि शराबी पत्रकारों और उनके दल्‍लों की आत्‍माएं यत्र-तत्र-सर्वत्र भटक रही है। मानो यह प्रेस क्‍लब जैसा कोई पवित्र स्‍थानन होकर, बल्कि हरियाणा के किसी निहायत देसी दारू का ठेका हो, जहां सिर्फ दारू का साम्राज्‍य होता है, गालियों की नमकीन के साथ।

प्रेस क्‍लब के भीतर आलीशान रेस्‍ट्रोरेंट की शैली में बार यानी दारू का अड्डा बनाया गया है। देशी-विदेशी दारू की चमाचम बोतलें कुछ इस तरह सजायी गयीं हैं, जहां रंग-बिरंगी रौशनी से इन बोतलों और उनमें भरी दारू की रंगत झमाझम खिल जाए। मेरे एक मित्र ने बताया कि यहां 99 फीसदी लोग सिर्फ दारू पीने ही आते हैं।

सुबह सुबह मेरी जिज्ञासा ने मुंह उठाया

और क्‍या। दरअसल यहां तीन तरह के लोग ही आते हैं। एक तो जिनके पास कोई काम नहीं, दूसरे वे जो यहां बैठ कर अपने रिश्‍ते मजबूत करना चाहते हैं, और तीसरे वे, जो फ्री में दारू पिला कर अपनी पैरवी कराने के पहले पायदान यानी प्राथमिक परिचय-तआर्रूफ के इच्‍छुक होते हैं।

यह उन पत्रकारों की दास्‍तान नहीं है, जो खुद को पत्रकार कहला कर पत्रकारिता के मुंह पर कालिख पोतने पर आमादा होते हैं। लेकिन शर्मनाक हालत है कि आज की अधिकांशत: पत्रकारिता ऐसे ही लोगों के हाथों में दबोची जा चुकी है। हमने ऐसे लोगों का खुलासा करने का अभियान छेड़ दिया है।

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