अखिलेश सरकार द्वारा सच लिखने की सजा मिली थी अनूप गुप्ता को, मान्यता रद्द करने के साथ ही सरकारी मकान भी छीन लिया गया

अखिलेश सरकार का राज्य मुख्यालय में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के प्रति रवैया बडा दुखद और दो नजरिया रहा है। इसी के चलते एक समुदाय विशेष को खुश करने के लिये लगभग चार सौ ऐसे लोगों को मान्यता दे दी गयी, जिनमें से अनेक बमुश्किल एक पैरा भी सही नहीं लिख सकते हैं। इसकी बजाय दलाली और दूसरे काले धंधे महारत हासिल इन लोगों का रंग बडा चोखा रहा है। ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं रही है, जो अपनी भाटगीरी के जरिये मंत्रियों और नौकरशाहों में अपनी खासी पैठ बनाकर लक्जरी कारों में बडी शान से चलते और विलासिता की जिंदगी जीते रहे हैं। इनसे आप कुछ भी लिखवा सकते हैं। किसी पर भी कीचड़ उछलवा सकते हैं। प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुडे पत्रकार इसके अपवाद रहे हैं।

निवर्तमान सरकार के इस रवैये की सिर्फ एक ही जोरदार मिसाल देना काफी होगा। लखनऊ से प्रकाशित पत्रिका ‘दृष्टांत‘ के संपादक अनूप गुप्ता की मान्यता रद्द करने के साथ ही उनको मिले सरकारी मकान से ऐसे वक्त पर उन्हें निकाल बाहर कर दिया गया, जबकि उनका बच्चा बहुत बीमार था। इस पत्रकार का अपराध सिर्फ इतना ही रहा है कि वह अखिलेश सरकार की खामियों को बेखौफ होकर उजागर करने के साथ ही उनके बेहद मजबूत नौकरशाह के भी कारनामों पर धडल्ले से अपनी कलम चलाता रहा है। पेश हैं इसकी कुछ चुनिंदा मिसालें।

इस पत्रिका के मार्च, 2017 के अंक में नवनीत सहगल के बारे में लिखा गया है कि ‘नवनीत सहगल और विवादों का चोली दामन का साथ है। सहगल जहां भी जाते हैं, भ्रष्टाचार और विवाद उनके पीछे-पीछे चुंबक की तरह खिंचे चले आते हैं। सहगल की खूबी है कि सरकार चाहे जिसकी हो, हुकूमत वही चलाते हैं। कभी भाजपाई-बसपाई सरकार में लालजी टंडन के खासमखास रहे नवनीत सहगल के चलते भाई-बहन के प्यार में ही दरार पड़ गयी।……बसपा के शासन में सहगल ने सपाइयों को खूब पिटवाया। लेकिन, सरकार बदली, तो अखिलेश यादव के खासमखास बन गये।………..सपा के प्रवक्ता एक अखबार के मालिक रहे निशीथ राय को सहगल ने भ्रष्टाचार की खबरें छापने के कारण इतना परेशान और प्रताडित किया कि वह सहगल के समक्ष घुटने टेकने को मजबूर हो गये। नवनीत सहगल ने न केवल उनका सरकारी आवास जबरिया खाली कराया, बल्कि राय के इलाहाबाद के घर पर भी कई थानों की पुलिस से छापामारी करके उन पर लगातार दबाव बनाया।

एन.आर.एच.एम. घोटाला हो, टोरेंट पावर का मामला हो, कानपुर की पेयजल योजना का मामला हो, चीनी मिलों की बिक्री का मामला हो, आबकारी नीति में बदलाव का मामला हो, सहगल का नाम सभी मामलों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष जुडता रहा।…….अभी आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे को लेकर वह विवादों में हैं। यह उनकी ही काबिलियत है कि जो सडक केंद्र सरकार के अधीन 16 से 18 करोड रु में प्रति किलोमीटर में बन जाती है, उनके अधीन वाली यूपी ने 30 से 32 करोड रु में बनवाकर अपनी काबिलियत दिखाई है।

इसी पत्रिका के दिसंबर, 2014 के अंक में ‘340 करोड रु के घोटाले का सरगना सपा का भस्मासुर‘ शीर्षक के तहत प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘जिसे वित्तीय अनियमितिताओं का दोषी मानते हुए सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिये था, वह प्रदेश सरकार के अति महत्वपूर्ण विभाग सूचना विभाग का मुखिया बना बैठा है। जिसने बसपा सरकार के कार्यकाल में राजकीय कोष को लूटने में महती भूमिका निभायी, वही वर्तमान सपा सरकार के कार्यकाल में भी सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने में व्यस्त है। जो किसी समय पूर्व मुख्य मंत्री मायावती का बेहद करीबी अधिकारी माना जाता रहा है, वही अब वर्तमान मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की नाक का बाल बना बैठा है। जो ‘टोरंट पावर के मामले में अरबों के हेरफेर का आरोपी रहा हो, वही वर्तमान सरकार के कार्यकाल में प्रमोशन पाने वालों की कतार में सबसे आगे है।

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इसी पत्रिका में ‘कलयुग का वासुदेव‘ शीर्षक से प्रकाशित आलेख कहा गया है कि ‘वासुदेव यादव‘ यह एक ऐसा नाम है, जो अखिलेश सरकार के पूरे पांच वर्षीय कार्यकाल में नियम कानून और न्यायपालिका को चुनौती देता रहा है। जिसके खिलाफ हाइकोर्ट ने सख्त कार्रवाई के निर्देश दिये थे, वह शान से सेवानिवृत्ति के बाद एम.एल.सी. बनकर लालबत्ती में घूमने लगा। जिसे भ्रष्टाचार के मामले में सलाखों के पीछे होना चाहिये था, उसकी सुरक्षा में सरकारी गनर लगे हुए हैं।……जिसने एम.एल.सी. बनने के लिये फर्जी हलफनामा दिया, वह मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की आंख का तारा बना हुआ है। वर्ष 2014 में वासुदेव यादव के खिलाफ दायर की गयी जनहित याचिका में उसे आय से अधिक लगभग 100 करोड की संपत्ति का मालिक बताया गया है और वह भी दस्तावेजों के साथ।

इस पत्रिका के अप्रैल 2014 के अंक में कहा गया है कि ‘राजधानी लखनऊ के अतिविशिष्ट क्षेत्रों में लगभग 90 की संख्या में विशाल सरकारी कोठियां हैं। इनमें से दो दर्जन कोठियों पर अनियमित तरीके से प्रदेश के तथाकथित माननीय और नौकरशाह काबिज हैं। यहां तक कि कुछ कोठियों में नेताओं के परिजनों तक का कब्जा है।‘ इसके मई 2016 के अंक में ‘मंत्री बना भूमाफिया‘ शीर्षक से प्रकाशित आलेख में प्रदेश के तत्कालीन खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के बारे मे कहा है कि ‘गायत्री के ‘लूटमंत्र‘ के सामने सियासत के दिग्गज पहलवान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी धोबी पछाड खा गये।….कुछ समय पहले तक वे गायत्री प्रजापति के खिलाफ कार्रवाई के लिये पूरी तरह मन बना चुके थे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को गायत्री को क्लीनचिट क्या दी, पूरा मामला ही दफन हो गया।

जून 2016 के अंक में ‘बाप बेटे का आतंक‘ शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि ‘अवैध खनन से अरबों रु पैदा करके रातोरात जमीनों का इतिहास तथा भूगोल बदल डालने वाले सूबे के खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के खिलाफ अमेठी में इतना आतंक है कि उनके खिलाफ आवाज उठाने की किसी की हिम्मत नहीं है। जिस किसी ने गायत्री और उनके परिवार के खिलाफ आवाज उठाई, वह खुद उठने के काबिल नहीं बचा। अपने पैरों पर खडा होने लायक नहीं बचा। बाप के नक्शेकदम पर गायत्री का सपूत भी चल निकला है। बाप प्रदेश भर में जमीन लूटने में व्यस्त है, तो बेटा लडकियों की अस्मत लूट रहा है।

पत्रिका के सितंबर,2016 के अंक में ‘उत्तर प्रदेश का लूटकाल‘ शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कहा गया है कि (अखिलेश यादव की सरकार में) विकास के नाम पर खरबों के बजट में अरबों की अवैध कमाई संतरी से लेकर मंत्री तक और कर्मचारी से लेकर नौकरशाही तक ने की।……….पूरा सूबा अपराधियों के आतंक से कराहता रहा।…..हत्या, हत्या के प्रयास, लूट, चोरी, डकैती, अपहरण, बलात्कार, गैंगरेप जैसी गंभीर वारदातों ने सूबे की जनता का जीना दूभर कर दिया।

दूसरी ओर, पत्रकारों के प्रति अखिलेश सरकार और उनके लौहपुरुष नवनीत सहगल की इस नकारात्मक सोच के एकदम विरुद्ध है महाराष्ट्र की फडनवीस सरकार। महाराष्ट्र की विधान सभा के कल ही पत्रकारों की सुरक्षा का विधेयक पारित कर दिया गया है। इसके तहत पत्रकारों या मीडिया कार्यालयों पर हमला करनेवालों को तीन साल की सजा का प्रावधान और 50000 रु के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इससे संबंधित हिंसा को संज्ञेय, गैरजमानती और प्रथम श्रेणी के मैजिस्ट्रेट के द्वारा ही सुने जाने लायक अपराध माना जायेगा। इसकी जांच डिप्टी एस.पी. या सहायक पुलिस आयुक्त के नीचे के अधिकारी नहीं कर सकेंगे। यदि कोई पत्रकार झूठी शिकायत दर्ज कराता है, तो उसे भी तीन साल की सजा और 50000 रु का जुर्माना भरना पड सकता है। उसे ये दोनों सजाएं एक साथ भी मिल सकती हैं।

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