हैप्पी बर्थडे: देश के सबसे ‘युवा’ पत्रकार राजदीप सरदेसाई


संजीव पालीवाल

एग्जिक्यूटिव एडिटर, ‘आजतक’ ।।

देश के सबसे युवा पत्रकार राजदीप सरदेसाई को जन्मदिन की शुभकामनाएं। वैसे उन्हें ये मुबारकबाद मैं तड़के ही दे चुका हूं। बस युवा नहीं लिखा था। मेरे लिये वो युवा ही हैं। बावजूद इसके कि वो हर वक्त रिटायरमेंट की बात करते हैं। अपने सफेद बालों की बात करते हैं। उम्र को गिनाते रहते हैं। लेकिन वाकई वो युवा हैं। न्यूज को लेकर उनका जज्बा आज भी 25 साल के नौजवान से बेहतर है। खबर के लिये जो पागलपन उनमें है वो आजकल कम ही दिखता है।

राजदीप सरदेसाई को आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। इसलिये नहीं कि जब आज के दौर में जब सब एकतरफ चल रहे थे तो वो विपरीत दिशा में जा रहे थे। लोग वाहवाही में जुटे थे तो वो सवाल पूछ रहे थे। जो सत्ता और उससे जुड़े लोगों को असहज करते थे। ये कोई बड़ी बात नहीं है। हर दौर में ऐसे लोग होते हैं जो सवाल करते रहते हैँ। सत्ता को असहज करते रहते हैं। आज फर्क इतना है कि सोशल मीडिया के दौर में सवाल करने वाले का विरोध ज्यादा होता है। लोग उसे गाली देते हैं। नफरत करते हैं। उससे ज्यादा लोग उस इंसान से प्यार करते हैं।

आदर्श रिपोर्टर को कैसा होना चाहिए। एडिटर को कैसा होना चाहिए। ये राजदीप से सीखा जा सकता है।  वो बैचेन रहते हैं खबर के लिये। अभी दो दिन पहले तमिलनाडु के टूटीकोरिन में 11 लोग पुलिस की गोली से मारे गये। पेट्रोल के दामों में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि हुई। देश के ज्यादातर चैनलों के बड़े एंकर एक पादरी के बयान पर दिन रात एक किए हुए थे। उस दिन राजदीप की छटपटाहट देखने लायक थी। उन्होंने अपना शो टूटीकोरिन से शुरू किया। खबर और पत्रकारिता के स्तर को लेकर वो लगातार चिंतित रहते हैं। वो लगातार सबको टोकते रहते हैं। पूरे न्यूजरूम को आगाह करते रहते हैं कि आने वाली पीढियां आज के पत्रकारों को माफ नहीं करेंगी।

अभी  कर्नाटक पर जब सुप्रीम कोर्ट में आधी रात के बाद सुनवाई हो रही थी, तो देश के ज्यादातर दिग्गज संपादक सो रहे थे या कम से कम सक्रिय तो नहीं ही दिख रहे थे, उस वक्त अकेले राजदीप थे जो लगभग पूरी रात लाइव बैठकर खालिस पत्रकारीय और संपादकीय टिप्पणियां कर रहे थे। जिन भी लोगों ने उस रात आजतक की लाइव कवरेज देखी होगी, उन्हें याद होगा कि किस तरह वह संवैधानिक संस्थाओं, सरकार और सत्ता दल की जिम्मेदारी, पत्रकारीय धर्म निभाते हुए सामने आने वाली चुनौतियों का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने बहुत से ऐसे किस्से भी उस दौरान शेयर किए जो कम ही लोगों को मालूम हैं। कोर्ट में जारी सुनवाई के दौरान छन-छन कर आने वाली जानकारियों पर उनकी टिप्पणियां और उसके आगामी राजनीतिक परिदृश्य पर संभावित प्रभाव को लेकर उनका नजरिया पत्रकारिता के छात्रों और आज की पत्रकार पीढ़ी के लिए अनुकरणीय साबित हो सकता है।

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अभी हाल में किसी बड़े चैनल के बड़े एडिटर ने कहा कि एक पद पर आने के बाद भीड़ में संपादक को नहीं जाना चाहिए। इससे उसकी गरिमा कम होती है। लेकिन राजदीप इसके विपरीत सड़क और भीड़ में जाने के लिये छटपटातें हैं। मचलने लगते हैं। वो जानते हैं कि लोग उन पर हमले करेंगे। तंज करेंगे। उकसायेंगे। लेकिन वो परवाह नहीं करते। पिछले साल साहित्य आजतक के दौरान उन्हें लोगो ने घेर रखा था। करीब करीब घंटे भर से ज्यादा हो गया। लोग सवाल करते रहे और वो जवाब देते रहे। ज्यादातर सवाल ऐसे थे जो उकसाने के लिये काफी थे। माहौल गर्म होते देख मैंने सिक्योरिटी को बुलाकर राजदीप को चलने के लिये कहा। उन्होने मना कर दिया। बोले पूछने दो। जनता से ऐसे ही संवाद होना चाहिए। सीधे सवाल जवाब में बड़ा मजा आता है।

2012 के गुजरात चुनाव के वक्त राजदीप उस वक्त वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू करके लौटे थे। इंटरव्यू एक बस में था नरेंद्र मोदी अपनी सीट पर थे और राजदीप नीचे फर्श पर बैठे हुए थे। ऑफिस के बहुत से लोगों ने इस बात पर आपत्ति जतायी कि उन्होंने फर्श पर बैठकर इंटरव्यू क्यूं किया। राजदीप का जवाब था कि मैं एक पत्रकार हूं मेरा काम इंटरव्यू करना है। सवाल पूछना है। मैं कहां बैठकर सवाल करता हूं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वाकई ये उनके लिये की बड़ी बात नहीं है।

देश के हर राज्य का चुनाव राजदीप का आखिरी चुनाव होता है। हर बार वो यही दोहराते हैं और ट्वीट करते हैं कि ये मेरा आखिरी चुनाव है। अब बस। लेकिन वो बस कभी नहीं होता। ये अच्छी बात है कि राजदीप अपनी बात पर कायम नहीं रहते हैं।

और हां, एक बात और जिस पर राजदीप हमेशा जोर देते हैं, वह है अच्छी खबर, उनका हमेशा मानना रहा है कि देश में सब तरफ बहुत कुछ गड़बड़ है, बहुत कुछ चिंतनीय है, लेकिन इसी माहौल में कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी घटित हो रहा होता है जो हमारे तनाव भरे जीवन में सुखद एहसास देता है। वह कोशिश करते हैं कि जब उनका शो समाप्ति की ओर जाए, तो एक ऐसी खबर दर्शकों के सामने रखी जाए, जिसे देखकर उसके चेहरे पर अवसाद नहीं बल्कि मुस्कुराहट आए।

और, अंत में…हर रात किसी एक हिंदी गीत के बहाने दिन भर की गहमागहमी पर उनकी टिप्पणी का तो सबको इंतजार रहता ही है।

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