प्रशासन के खेल का शिकार हुई उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति (पुनर्गठित)
प्रशासन ने एनेक्सी में रोकी एंट्री, धूप में सड़क पर वोटिंग; शेखर पंडित अध्यक्ष, ज्ञानेश पाठक महासचिव चुने गए
फुटपाथ पर लोकतंत्र

एनेक्सी का गेट बंद : सड़क पर हुआ पत्रकारों का चुनाव
प्रशासन ने रोकी एंट्री, धूप में सड़क पर वोटिंग; शेखर पंडित अध्यक्ष, ज्ञानेश पाठक महासचिव चुने गए
प्रभात त्रिपाठी का व्यक्तित्व और उनका जुनून साफ तौर पर यह दर्शाता है कि वे एक जिंदादिल, कर्मठ और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले पत्रकार हैं। आज के दौर में, जब पत्रकारिता अनेक चुनौतियों और दबावों से गुजर रही है, ऐसे समय में प्रभात त्रिपाठी जैसे लोगों का साहस, समर्पण और निडरता उन्हें एक अलग पहचान दिलाती है।
उनकी कार्यशैली में ईमानदारी, स्पष्टता और जनहित के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। वे न केवल खबरों को सामने लाने का कार्य करते हैं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाकर आम जनमानस की आवाज बनने का भी साहस रखते हैं। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व और कार्यों की जितनी भी सराहना की जाए, वह कम ही प्रतीत होती है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान प्रेरणादायक है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। यदि वे इसी तरह अपने कर्तव्यपथ पर दृढ़ता और निष्ठा के साथ आगे बढ़ते रहे, तो निश्चित रूप से पत्रकारिता के इतिहास में प्रभात त्रिपाठी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया जाएगा। उनके जैसे समर्पित पत्रकार समाज और लोकतंत्र दोनों की मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
राजधानी लखनऊ में बुधवार को लोकतंत्र की एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने न सिर्फ पत्रकार जगत को चौंकाया, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति (पुनर्गठित) का वर्ष 2026-27 का चुनाव, जो एनेक्सी मीडिया सेंटर के भीतर संपन्न होना था, वह अंततः लाल बहादुर शास्त्री भवन (एनएफसी गेट) के बाहर सड़क पर कराया गया। तपती धूप, बैरिकेडिंग और पुलिस मौजूदगी के बीच पत्रकारों ने सड़क पर ही मतदान किया और यहीं मतगणना भी पूरी हुई। यह पूरा घटनाक्रम करीब छह घंटे तक चला, जिसके दौरान यातायात भी प्रभावित रहा।
अनुमति के बावजूद बदले हालात
चुनाव की प्रक्रिया की शुरुआत पूरी तरह व्यवस्थित और प्रशासनिक अनुमति के साथ हुई थी। 16 मार्च से नामांकन शुरू होकर 23 मार्च तक एनेक्सी मीडिया सेंटर के प्रेस रूम में ही नामांकन, जांच और नाम वापसी की प्रक्रिया शांतिपूर्वक संपन्न हुई। चुनाव अधिकारियों की मौजूदगी में सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं और 25 मार्च को मतदान के लिए भी पहले से स्थान निर्धारित था।
लेकिन मतदान के दिन अचानक स्थिति बदल गई। पत्रकारों को एनेक्सी परिसर में प्रवेश से रोक दिया गया और गेट बंद कर दिए गए। यह कदम न केवल अप्रत्याशित था, बल्कि इससे पूरी चुनाव प्रक्रिया पर अनिश्चितता के बादल छा गए।सड़क पर शुरू हुआ मतदान
एनेक्सी में प्रवेश न मिलने के बाद संयोजक प्रभात त्रिपाठी ने मौके पर ही निर्णय लेते हुए सड़क पर चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। एनएफसी गेट के बाहर बीच सड़क पर बैलट बॉक्स रखे गए और पत्रकारों ने कतारबद्ध होकर मतदान किया।
सुबह 11 बजे शुरू हुई यह प्रक्रिया शाम करीब 4 बजे तक चली। पुलिस और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। मतदान समाप्त होने के बाद उसी स्थान पर मतगणना भी की गई, जिससे यह पूरा चुनाव एक असामान्य लेकिन व्यवस्थित रूप में सड़क पर ही पूरा हुआ।गुटबाजी और आरोपों का दौर
इस चुनाव के दौरान पत्रकार संगठनों के भीतर चल रही गुटबाजी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई। इससे पहले भी यह संगठन दो धड़ों में बंट चुका थे, जहां एक पक्ष का नेतृत्व हेमंत तिवारी और दूसरे का प्रांशु मिश्रा कर चुके हैं।
इस बार भी आरोप लगाए गए कि दूसरे गुट ने प्रशासन को प्रभावित कर चुनाव को एनेक्सी में होने से रोका। संयोजक और अन्य पत्रकारों ने यह भी कहा कि कुछ अधिकारियों के निर्देश पर गेट बंद कराए गए, जिससे चुनाव को बाधित करने की कोशिश हुई। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।प्रमुख पदों पर परिणाम घोषित
सड़क पर हुए इस चुनाव में कई महत्वपूर्ण पदों के परिणाम घोषित किए गए। अध्यक्ष पद पर शेखर पंडित ने स्पष्ट बढ़त के साथ जीत हासिल की, जबकि महासचिव पद पर ज्ञानेश पाठक विजयी घोषित हुए। कोषाध्यक्ष पद पर विक्रम राव ने जीत दर्ज की।
उपाध्यक्ष पदों पर अमन अग्रवाल, जितेंद्र कुमार सिंह यादव और कृष्णा कुमार सिंह को सफलता मिली। संयुक्त सचिव पद पर राजू यादव, अर्चना गुप्ता के साथ दीपक अवस्थी और लखन लाल मिश्रा को बराबर मत मिलने के कारण संयुक्त रूप से विजयी घोषित किया गया। कार्यकारिणी में भी कई वरिष्ठ और सक्रिय पत्रकारों ने जीत दर्ज की, जिनमें सुरेंद्र कुमार दुबे और अनिल तिवारी को सर्वाधिक मत मिले।प्रशासन पर उठे सवाल
पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रशासन की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे। पत्रकारों का आरोप है कि जब नामांकन और अन्य प्रक्रियाएं एनेक्सी के भीतर कराई जा सकती थीं, तो मतदान के समय ही गेट बंद करने का निर्णय क्यों लिया गया।
संयोजक प्रभात त्रिपाठी ने साफ कहा कि सड़क पर हुए मतदान की जिम्मेदारी प्रशासन की है और इस मामले की जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि सरकार इस पूरे प्रकरण का संज्ञान लेकर स्थिति स्पष्ट करे।यातायात प्रभावित, फिर भी शांतिपूर्ण रहा चुनाव
करीब छह घंटे तक सड़क पर चले इस चुनाव के दौरान यातायात प्रभावित रहा, लेकिन इसके बावजूद मतदान शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हुआ। पत्रकारों ने अनुशासन बनाए रखते हुए मतदान किया और किसी प्रकार की अव्यवस्था की खबर नहीं आई।
लोकतंत्र पर खड़े हुए बड़े सवाल
लखनऊ में पत्रकारों का यह चुनाव अब केवल एक संगठन का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और प्रशासनिक हस्तक्षेप पर बहस का विषय बन गया है।
जब एक संगठित चुनाव प्रक्रिया को सड़क पर पूरा करना पड़े, तो यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है—क्या यह केवल गुटबाजी का परिणाम है या फिर प्रशासनिक निर्णयों की वजह से उत्पन्न हालात?
फिलहाल, चुनाव संपन्न हो चुका है और परिणाम भी सामने आ गए हैं, लेकिन यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।




