वायरल वीडियो बनाम हकीकत: सूचना विभाग पर आरोपों की पड़ताल में उठे कई सवाल
मामले का दूसरा पहलू रोजगार और कार्यक्षमता से जुड़ा है। पीआर एजेंसी या सोशल मीडिया से जुड़े काम में केवल नियुक्ति होना पर्याप्त नहीं है। भाषा पर मजबूत पकड़, कंटेंट की समझ, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने की क्षमता इस क्षेत्र की मूल जरूरतें हैं। किसी संस्थान में किसी व्यक्ति को काम का अवसर मिलना सकारात्मक बात है, लेकिन लंबे समय तक बने रहने के लिए काम की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त होती हैं तो उसके पीछे कार्यक्षमता, संस्थागत आवश्यकता या अन्य प्रशासनिक कारण हो सकते हैं। इसलिए नौकरी समाप्त होने के बाद सामने आए आरोपों को स्वतः सत्य मान लेना भी उचित नहीं है।
सोशल मीडिया पर एक महिला द्वारा सूचना विभाग के निदेशक, विभागीय अधिकारियों और पीआर एजेंसी को लेकर लगाए जा रहे आरोपों ने बहस जरूर छेड़ दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी वायरल वीडियो में कही गई बात अपने आप में प्रमाण बन जाती है? गंभीर आरोपों के बीच यही सबसे बड़ा सवाल है, क्योंकि अब तक सार्वजनिक तौर पर सामने आई बातों के समर्थन में ठोस दस्तावेज अथवा स्वतंत्र पुष्टि दिखाई नहीं देती। पूरे मामले को समझने के लिए पहले सूचना विभाग की कार्यप्रणाली को समझना होगा। आईएएस अधिकारी किसी राजनीतिक दल के नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन के अधिकारी होते हैं। सरकार भाजपा की हो या किसी अन्य दल की, अधिकारी की जिम्मेदारी सरकारी नीतियों और योजनाओं को नियमों के तहत लागू कराने तथा उनका प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने की होती है। इसलिए किसी अधिकारी के प्रशासनिक निर्णय को सीधे राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होगा।
नौकरी गई तो आरोपों की ‘कहानी’ क्यों?
मामले का दूसरा पहलू रोजगार और कार्यक्षमता से जुड़ा है। पीआर एजेंसी या सोशल मीडिया से जुड़े काम में केवल नियुक्ति होना पर्याप्त नहीं है। भाषा पर मजबूत पकड़, कंटेंट की समझ, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जानकारी, सोशल मीडिया नेटवर्किंग और समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने की क्षमता इस क्षेत्र की मूल जरूरतें हैं। किसी संस्थान में किसी व्यक्ति को काम का अवसर मिलना सकारात्मक बात है, लेकिन लंबे समय तक बने रहने के लिए काम की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त होती हैं तो उसके पीछे कार्यक्षमता, संस्थागत आवश्यकता या अन्य प्रशासनिक कारण हो सकते हैं। इसलिए नौकरी समाप्त होने के बाद सामने आए आरोपों को स्वतः सत्य मान लेना भी उचित नहीं है।
क्या महिला होने का मतलब जवाबदेही से छूट है?
महिला सशक्तिकरण का वास्तविक उद्देश्य महिलाओं को अवसर और सम्मानजनक रोजगार देना है। लेकिन किसी भी संस्थान में काम करने वाले व्यक्ति की कार्यक्षमता का मूल्यांकन उसके काम के आधार पर ही होना चाहिए। महिला होने के कारण अवसर देना सशक्तिकरण है, मगर अवसर मिलने के बाद जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही जरूरी है। यदि संबंधित महिला के साथ कोई अन्याय हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन यदि आरोप व्यक्तिगत असंतोष अथवा नौकरी समाप्त होने के बाद की नाराजगी से जुड़े हैं, तो इसकी भी निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।
विशाल सिंह की कार्यशैली पर भी अलग-अलग दावे
सूचना निदेशक विशाल सिंह
सूचना विभाग के वर्तमान निदेशक विशाल सिंह को लेकर विभागीय कामकाज से जुड़े लोगों का कहना है कि उनका व्यवहार सहज, सहयोगात्मक और संवेदनशील रहा है। कई लोगों का दावा है कि वे मिलने आने वालों की समस्याएं सुनते हैं और विशेष रूप से महिलाओं के मामलों को गंभीरता से लेते हैं। हालांकि, किसी अधिकारी की अच्छी छवि अपने आप में आरोपों को खारिज करने का प्रमाण नहीं है। उसी तरह किसी महिला का सोशल मीडिया वीडियो भी अधिकारी को दोषी साबित नहीं करता। अब फैसला सोशल मीडिया नहीं, रिकॉर्ड करेगा पूरे प्रकरण में सबसे जरूरी सवाल यही है कि आरोपों के साथ प्रमाण कहां हैं? यदि कोई गंभीर अनियमितता हुई है तो नियुक्ति पत्र, कार्य आवंटन, आधिकारिक पत्राचार, भुगतान रिकॉर्ड और सेवा समाप्ति से जुड़े दस्तावेज जांच के सामने रखे जाने चाहिए। क्योंकि सोशल मीडिया पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोप को प्रमाणित करना ही असली कसौटी है। यदि आरोप सही हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए और यदि वे निराधार हैं तो तथ्य सामने आने चाहिए। किसी अधिकारी, कर्मचारी या संस्था की प्रतिष्ठा को केवल वायरल वीडियो के आधार पर तय करना न प्रशासनिक न्याय है और न पत्रकारिता का तकाजा। अंततः इस पूरे विवाद का सच वीडियो की आवाज नहीं, बल्कि दस्तावेज और निष्पक्ष जांच ही तय कर सकती है।