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बड़ा सवाल : क्या फर्जी पत्र के सहारे प्रदीप दुबे बने थे प्रमुख सचिव ?

क्या पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर के फर्जी हस्ताक्षर से प्रमुख सचिव बने थे प्रदीप दुबे!

जब 24 दिसंबर 2011 से 9 मार्च 2012 तक उत्तर प्रदेश में आचार संहिता लगी थी तो आचार संहिता समाप्त होने के तीन दिन पहले 6 मार्च को प्रमुख सचिव कैसे बने प्रदीप दुबे?

क्या आचार संहिता के दौरान प्रमुख सचिव के पद पर नियुक्त हो सकते थे प्रदीप दुबे?

जिस 6 मार्च 2012 को विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने प्रदीप दुबे की नियुक्ति की है उस दिन राजभर आजमगढ़ के दीदारगंज क्षेत्र से अपने चुनाव की काउंटिंग करवा रहे थे और वह चुनाव हार चुके थे, और वह लखनऊ में नहीं थे ही नहीं

सौरभ सोमवंशी की रिपोर्ट


उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में अब तक के सबसे अधिक विवादित अधिकारी रहे प्रदीप दुबे की नियुक्ति को चुनौती देते हुए लखनऊ हाई कोर्ट में एक “क्यो वारंटो” याचिका दाखिल की गई है जिसमें मांग की गई है कि वह अवैध रूप से प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्त हैं।छुट्टी के दौरान लखनऊ हाई कोर्ट के जस्टिस राजेश सिंह चौहान और देवेश चंद्र सावंत की डिवीजन बेंच के सामने जब विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप का पक्ष सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट रीना एन सिंह Rreena N Singh
ने रखना शुरू किया तो उन्होंने साक्ष्यों के साथ कोर्ट को बताया कि दूबे की नियुक्ति अवैध है,राज्य की भ्रष्टाचार के प्रति शून्य-सहनशीलता (Zero Tolerance) नीति के विपरीत है।”
तब माननीय न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “बड़े-बड़े संवैधानिक पदों पर रहने वाले लोग 65 वर्ष की उम्र के बाद नमस्ते करके चले जाते हैं आप अभी 70 साल तक बने हुए हैं क्या 80 तक रहने का विचार है।”
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि 6 जून तक आप अपने पद पर बने रहेंगे तो काउंटर एफिडेविट दाखिल कर सकते हैं।मामले की अगली सुनवाई 6 जून को होगी।

इसी बीच एक पत्र जो दो पेज का है वह सामने आया है यह उस दिन का है जिस दिन उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव परिणाम के रिजल्ट आ रहे थे वो दिन था 6 मार्च 2012
तीन दिन बाद 09 मार्च को आचार संहिता समाप्त होने वाली थी अर्थात आचार संहिता का समय चल रहा था। विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर आजमगढ़ के दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी थे और वह आजमगढ़ जिला मुख्यालय पर उस दिन अपने चुनाव की काउंटिंग में व्यस्त थे।
इसी 6 मार्च 2012 का एक पत्र है जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि

” उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय सेवा भर्ती तथा सेवा की शर्तों की नियमावली 1974 के तहत कमेटी की संस्तुति के आधार पर प्रदीप दुबे पुत्र बीएन दूबे को प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर नियुक्त किए जाने की स्वीकृति माननीय विधानसभा अध्यक्ष प्रदान करते हैं।”

इस पत्र को देखने के बाद केवल तीन सवाल मन में आता है।
१. क्या आचार संहिता के दौरान प्रदीप दुबे की नियुक्ति प्रमुख सचिव के पद पर हो सकती थी ?

२.क्या आचार संहिता के दौरान विधानसभा अध्यक्ष को यह अधिकार था?

३. सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर जब 6 मार्च को आजमगढ़ दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र से अपने चुनाव परिणाम की काउंटिंग में व्यस्त थे तो उन्होंने उस दिन कमेटी की संस्तुति के आधार पर प्रदीप दुबे की नियुक्ति कैसे कर दी, लखनऊ में उनके हस्ताक्षर किसने किया होंगे!
फिलहाल इस तरह के प्रदीप दुबे के दो दर्जन से अधिक करनामे पिछले दो दशक से विधानसभा व ब्यूरोक्रेसी के गलियारों तक में गूंज रहे हैं।

अब चलते हैं 2008 के दौर में साल भर से बहुजन समाज पार्टी की सरकार सत्ता में थी तत्कालीन प्रमुख सचिव विधानसभा राजेंद्र प्रसाद पांडे के विवाद में पडने के बाद तत्कालीन समय में संसदीय सचिव के पद पर काम कर रहे प्रदीप दुबे ने 13 जनवरी 2009 को अपने पद से वी आर एस ले लिया, जिसके पत्र का डिस्पैच नंबर 67 था।
उसी दिन थोड़ी देर बाद डिस्पैच नंबर 68 के पत्र के आधार पर वह प्रमुख सचिव संसदीय कार्य बन गए।
और 6 दिन बाद 19 जनवरी को प्रदीप दुबे प्रमुख सचिव विधानसभा के पद का भी कार्यभार ग्रहण कर लिया लेकिन अस्थाई तौर पर।

इसके अलावा 27 जून 2011 का भी एक पत्र चर्चा में है जिसमें स्थानांतरण के आधार पर प्रदीप दुबे विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर नियुक्त किया जा रहे हैं। जो की पूरी तरह से अवैधानिक था।
क्योंकि स्थानांतरण के आधार पर कोई नई नियुक्ति नहीं हो सकती है। फिलहाल सारी चीज न्यायालय के सामने हैं।

प्रथम दृष्टया देखने में यह ऐसा लगता है कि प्रदीप दुबे तीर पर तीर चलाते रहे और अभी भी चला रहे हैं परिणाम यह है कि लगभग 70 वर्ष का हो जाने के बावजूद भी वह अपने पद पर बने हुए हैं।
परंतु सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश भी 65 वर्ष की उम्र में रिटायर हो जाते हैं तो 70 वर्ष के प्रदीप दुबे आखिर विधानसभा में क्या कर रहे हैं वह भी उसे समय जब उनकी नियुक्ति पर ही पूरे उत्तर प्रदेश में सवाल उठ रहे हैं।

अब एक बार फिर से उत्तर प्रदेश विधानसभ सचिवालय में प्रमुख सचिव पद पर नियुक्तियों, सेवा विस्तार, सेवा नियमावली में संशोधनों तथा कथित भ्रष्टाचार एवं कर्मचारियों के उत्पीड़न से जुड़े गंभीर आरोपों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है। आरोप येभी है कि वर्ष 2008 से अब तक हुई कई नियुक्तियां एवं सेवा विस्तार नियमों के विपरीत रहे हैं। साथ ही सेवा नियमावली में कथित अनियमित संशोधन, आयु संबंधी विसंगतियां, कर्मचारियों के उत्पीड़न तथा वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं के गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ मामलों में कर्मचारियों की आत्महत्या और उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं, जिनकी स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है। जब सरकार भ्रष्टाचार के प्रति “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करती है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि आरोपों में सत्यता है तो इतने वर्षों तक इतने गंभीर मामलों की जांच और जवाबदेही क्यों सुनिश्चित नहीं की गई?

यूपी विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे को हाईकोर्ट से झटका, पढ़ें नोटिस

सौरभ सोमवंशी-

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे विचारार्थ स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने मामले में विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति देवेश चंद्र सावंत की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता एवं विधानसभा के पूर्व सूचना अधिकारी कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने पक्ष रखा, जबकि प्रतिवादी पक्ष की ओर से भी विस्तृत बहस की गई।

लखनऊ हाईकोर्ट के कक्ष संख्या-9 में करीब आधे घंटे तक चली सुनवाई के दौरान अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने अदालत को बताया कि मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर कथित रूप से अवैध नियुक्ति और पद पर बने रहने से जुड़ा है। ऐसे में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत से यह भी अनुरोध किया गया कि याचिका के अंतिम निस्तारण तक प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को किसी भी प्रशासनिक अथवा आधिकारिक शक्ति के प्रयोग से रोका जाए। साथ ही उनकी नियुक्ति के प्रभाव और संचालन पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई।

प्रदीप कुमार दुबे

सुनवाई के दौरान प्रदीप कुमार दुबे की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाए और इसे सुनवाई योग्य न मानने का आग्रह किया। हालांकि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए प्रतिवादियों से जवाब मांगा।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई को निर्धारित की है।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह ने प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में प्रमुख सचिव के पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उनकी नियुक्ति निर्धारित नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत की गई तथा सेवानिवृत्ति के बाद भी वह बिना वैध अधिकार के पद पर कार्यरत हैं। हालांकि इन आरोपों पर अभी न्यायालय का अंतिम निर्णय आना बाकी है।

प्रदीप दुबे की नियुक्ति के खिलाफ याचिका सुनने से हाईकोर्ट के इन जजों ने खड़े किए हाथ!

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने स्वयं को मामले से अलग कर लिया।

न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ के समक्ष जैसे ही याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुईं, दोनों न्यायाधीशों ने प्रदीप दुबे से पूर्व परिचय का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

क्या है मामला?

उत्तर प्रदेश विधानसभा में पूर्व सूचना अधिकारी रहे कर्मेश प्रताप सिंह ने याचिका दायर कर विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और पद पर बने रहने की वैधता पर सवाल उठाए हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता रीना एन. सिंह का कहना है कि उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत विभिन्न सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष भी शिकायतें की थीं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है तथा वह बिना वैध अधिकार के पद पर बने हुए हैं।

नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए गए सवाल

याचिका के अनुसार, वर्ष 2009 में प्रदीप दुबे की नियुक्ति उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 के प्रावधानों की अनदेखी कर की गई थी।

याचिकाकर्ता का दावा है कि चयन श्रेणी के पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय प्रदीप दुबे की आयु इससे अधिक थी।

याचिका के मुताबिक, 13 जनवरी 2009 को उन्होंने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली और उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त कर दिया गया। इसके छह दिन बाद 19 जनवरी 2009 को उन्हें विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई।

सेवा विस्तार पर भी सवाल

याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित संशोधनों पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर नहीं रखा गया और इन्हीं के आधार पर प्रदीप दुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया जाता रहा।

याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि वर्ष 2011 में लागू की गई ‘सर्विस ट्रांसफर’ व्यवस्था के माध्यम से उनकी स्थिति को नियमित करने का प्रयास किया गया।

सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बने रहने का आरोप

याचिका के अनुसार, प्रदीप कुमार दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर चुके थे। याचिकाकर्ता का कहना है कि 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है।

कोर्ट से क्या मांग की गई है?

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से प्रदीप कुमार दुबे के खिलाफ ‘क्वो वारंटो’ रिट जारी करने की मांग की है। इसके तहत अदालत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से पूछती है कि वह किस वैधानिक अधिकार के आधार पर उस पद पर बना हुआ है।

याचिका में मांग की गई है कि—

  • प्रदीप दुबे से उनके पद पर बने रहने का कानूनी आधार पूछा जाए।
  • उनकी नियुक्ति और पद पर बने रहने को अवैध घोषित किया जाए।
  • उन्हें पद से हटाया जाए।
  • प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर विधिसम्मत चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्ति की जाए।
  • मामले में कथित अनियमितताओं की जांच कराई जाए।

क्या होता है ‘क्वो वारंटो’?

‘क्वो वारंटो’ एक संवैधानिक रिट है, जिसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तब जारी कर सकती है जब यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर किस अधिकार से बना हुआ है। यदि अदालत को लगता है कि संबंधित व्यक्ति वैधानिक रूप से उस पद का अधिकारी नहीं है, तो उसे पद छोड़ने का निर्देश दिया जा सकता है।

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