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तथाकथित रीलबाज पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव का नहीं चल पाया एजेंडा

किसी के प्रायोजित एजेंडे के तहत उठकर चिल्लाना, चिल्लाने और नाटक का वीडियो बन जाने के बाद फिर रिएक्शन देना कि “मेरा काम हो गया” और कैमरा चलता देख फिर से चिल्लाना ये पत्रकारिता है?

आदर्श सिंह-

आज लखनऊ में मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारिता के नाम पर ड्रामा हुआ वो सही है?

किसी के प्रायोजित एजेंडे के तहत उठकर चिल्लाना, चिल्लाने और नाटक का वीडियो बन जाने के बाद फिर रिएक्शन देना कि “मेरा काम हो गया” और कैमरा चलता देख फिर से चिल्लाना ये पत्रकारिता है? मैंने दुर्भाग्यवश मोहतरमा की पूरी प्रोफाइल देखी तब जाकर समझ आया कि असल में आज जो हुआ वो पत्रकारिता नहीं बल्कि किसी “राजकुमार” के इशारे पर और किसी के निशाने पर की जाने वाली शुद्ध रूप से ठेकेदारी थी। क्योंकि करीब 24 घंटे पहले इस विषय पर पहले से वीडियो पोस्ट किया गया था मतलब मामला पहले से प्रायोजित था? और हाँ जो लोग वीडियो शेयर कर रहे हैं जरा एक बार इनसे पूछें तो कि आखिर सवाल था क्या? सिर्फ जवाब चाहिए था लेकिन सवाल तो पूछा ही नहीं। और अंत में यूपी बीजेपी की मीडिया टीम को बधाई, आपने बेहद सफल आयोजन कराया, भीड़ दिखाने के लिए ABCD जहां से जो मिला सबको बुलाया और बैठाया, अंत में नतीजा आपके सामने है।


देवकी नंदन मिश्रा-

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और BJP राज्य प्रमुख पंकज चौधरी की पत्रकार वार्ता BJP मुख्यालय में थी। प्रेस कान्फ्रेंस का मुद्दा ग़ायब हो गया और एक तथाकथित पत्रकार का “सवाल का जवाब देते जाइये CM साहब” कहना सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया। मैंने इसके फ़ैक्ट पर वीडियो बनाया तो कई ने कमेंट में मुझे चाटुकार कह दिया। कोई बात नहीं लेकिन सच सबको जानना चाहिये फिर कमेंट करना होता है। घटनाक्रम रखता हूँ…

प्रेस कान्फ्रेंस में सबसे पहले पंकज चौधरी जी बोलते हैं उसके बाद CM योगी जी का नंबर आता है। वह अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हैं और धन्यवाद देकर उठ जाते हैं। किसी पत्रकार ने सवाल नहीं किया। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सवाल नहीं होना चाहिये? पत्रकार का काम है सवाल पूछना लेकिन कोई बताये कि मोहतरमा पत्रकार ने सवाल क्या पूछा? वह तो सिर्फ यही कहती रहीं कि हमारे सवाल का जवाब देते जाइये योगी जी CM साहब। मुझे तो इसमें कोई सवाल नज़र नहीं आया। अरे मैडम सवाल तो पूछी होती। मुझे किसी ने बताया कि यह रील बनाकर फेमस होने के लिये यहाँ आई थीं और हो भी गईं। उनका काम तो हो गया लेकिन पत्रकार बिरादरी तो अनायास ही बदनाम हो गई।

पत्रकार संगठनों को इस तरह के लोगों पर नज़र रखकर रोक लगानी चाहिये। मैडम पत्रकार को यह खुलासा करना चाहिये कि वह किस मीडिया/सोशल मीडिया संस्थान के लिये काम करतीं थीं। कहीं मैंने सुना बोल रहीं थी नौकरी चली गई। लेकिन पहले यह तो पता चले कि उनके संस्थान का नाम क्या है?

आज की इस घटना के बाद अब जब BJP दफ्तर में पत्रकार वार्ता होगी तो कड़ी पड़ताल के बाद ही किसी को भीतर आने दिया जायेगा। CM के यहाँ तो और कड़ा पहरा होगा। इससे नुक़सान उनका होगा जो लोग वाक़ई पत्रकार हैं इनकी तरह नहीं जो किसी भी तरह फ़ेमस होना चाहती थीं। सपा दफ़्तर में भी पत्रकारों पर बंदिश लगेगी।

इन्हीं ग़लत हरकतों की वजह से पत्रकार सरकार और सत्ता से दूर कर दिये जा रहे। एक समय था जब मैं गृह विभाग देखता रोज़ प्रमुख सचिव गृह शाम को पाँच बजे पत्रकार वार्ता करते थे। जिसमें पुलिस विभाग के एक अफ़सर भी होते थे। अब तो सरकार किसी घटना के बारे में क्या सोचती है पता ही नहीं चलता। इसके लिये सरकार के नुमाइन्दे तो जिम्मेदार हैं ही लेकिन पत्रकार उनसे भी ज़्यादा। एक वक़्त आयेगा नेता LIVE बोल देंगे आप उनको सामने से देख भी नहीं पायेंगे।

इस लड़की को पत्रकार मत कहिए यह डिजीटल क्रियेटर थी जो डिजीटल कंटेंट तैयार कर गई
CM योगी की प्रेस कान्फ्रेंस में सवाल का शोर मचाने वाली महिला के बारे में सोशल मीडिया में चल रहा है कि दिव्या श्रीवास्तव ने 2 दिन पहले ही न्यूज चैनल ज्वाइन किया था, जहाँ से उन्हें निकाल दिया गया है।
मेरा सवाल है कि वह किस न्यूज़ चैनल के लिये काम करती थीं? क्या कोई बता सकता है? कोई क्यों नहीं बता रहा है कि पत्रकार मैडम किस न्यूज़ चैनल में काम करती थीं। सोशल मीडिया पर भले ही कुछ लोग उनके समर्थन में हैं लेकिन मैं नहीं हूँ क्योंकि उन्होंने सवाल तो पूछा ही नहीं। “केवल मुख्यमंत्री जी मेरे सवाल का जवाब का जवाब देते जाइये” यह कोई सवाल है क्या? आप सवाल पूछती तो जरूर आपका समर्थन करता। इस लड़की को पत्रकार मत कहिए यह डिजीटल क्रियेटर थी जो डिजीटल कंटेंट तैयार कर गई।

अनिल कुमार-

पत्रकारिता ऐसे ही होनी चाहिये कि जब मंचासीन व्यक्ति उठकर निकल जाये तब वीडियो बनवाते हुए जोर जोर से चिल्लाकर कहना चाहिये कि मेरे सवालों का जवाब दीजिये, मेरे सवालों का जवाब दीजिये. भले ही मंच पर रहते समय कोई सवाल ना पूछा हो, लेकिन चिल्लाना तो चाहिये ही कि सवाल का जवाब दीजिये.
मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है, कि आप रील बनाने के लिये चीखो चिल्लाओ, लेकिन मैं आने वाले आगे के समय को देखकर परेशान जरूर हो रहा हूं. अभी फिलहाल ये स्थिति है कि नेता और अधिकारी एजेंडाधारी पत्रकारों के सवालों से आजीज आकर प्रेस कांफ्रेंस करना बिल्कुल ही ना खत्म कर दें.
अक्सर मैं देखता हूं कि प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार जनहित के मुद्दों से जुड़े सवाल कम पूछते हैं, एजेंडे से जुड़े सवाल ज्यादा करते हैं. ऐसा अखिलेश की भी पीसी में होता है, योगी की पीसी में भी होने लगा है, मोदी तो खैर पीसी करते ही नहीं हैं, राहुल गांधी के यहां तो इस तरह के लोगों की इंट्री नहीं होती है.
फिर भी हम पत्रकारों को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिये कि हम सचमुच में पत्रकारिता ही कर रहे हैं? दरअसल, पत्रकारिता के पेशे में आने के लिये वकालत की तरह कोई कोर एसोसिएशन नहीं है, जहां से प्राथमिक परीक्षा पास करके ही आपको पत्रकारिता के पेशे में घुसना आवश्यक हो.
यहां कोई भी पत्रकार बन सकता है. उसके लिये शिक्षा या पढ़ाई लिखाई की कोई जरूरत नहीं है. यह पेशा नेतागिरी से ठीक मिलता जुलता हुआ है, जहां आप चमचागिरी करके, अपनी पार्टी बनाकर, तेल लगाकर पद पा जाते हैं. पत्रकारिता में भी ऐसा ही है, अखबार, मैगजीन निकालिये और सीधे संपादक हो जाइये.
गलती सबसे होती है. पढ़े लिखे पत्रकारों से भी गलती होती है, इंसान हैं तो गलती भी स्वभाविक है, लेकिन पत्रकारिता को नौकरी या पेशा समझने की बजाय वसूली और पॉवर का माध्यम समझकर आने वाले इसकी लुटिया डूबो देते हैं. इस फील्ड में इस तरह की मानसिकता के लोगों की भरमार हो गई है.
मैं निजी रूप से ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जो दूसरे धंधे करते थे और पत्रकारों के चमचे थे. उनसे अपना काम निकलवाने के लिये दारू-मुर्गा कराते थे. बाद में वह अपना धंधा संभालते हुए कार्ड बनवाकर, मान्यता लेकर, अखबार-मैगजीन निकालकर पत्रकार हो गये हैं, और उनकी हनक भी बहुत है.
कोई आरटीआई डालते डालते पत्रकार हो गया, कोई पुराने कार की खरीद बिक्री में मदद के बदले पत्रकारों को दारू पिलाते पिलाते पत्रकार हो गया, कोई स्टैंड का ठेका के चक्कर में पत्रकार के पीछे घूमते घूमते पत्रकार हो गया, कोई समाज सेवा करके विज्ञप्ति छपवाने के चक्कर में पत्रकार हो गया.
दरअसल, पत्रकार हो जाना कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब आप उचित तरीके से किसी पेशे में नहीं आते, उसके तौर तरीकों को समझकर पेशे में नहीं आते, तब दिक्कत वहां होती है. जैसे कंपाउंडरी करते करते बहुतेरे झोला छाप डाक्टर हो जाते हैं, वैसे ही इस पेशे में कई झोला छाप पत्रकार हैं, जो पत्रकारिता को गलत इंजेक्शन दे रहे हैं.
गलत इंजेक्शन लगने की वजह से ही आज लोकतंत्र का स्वघोषित चौथा खंभा लगातार दरकता जा रहा है. अब तो नये दौर में रीयल पत्रकारिता को खत्म कर रील पत्रकारिता का उदय हो चुका है. अब यह रील पत्रकारिता इस पेशे को कहां तक ले जायेगा, इसका तो बस इंतजार ही किया जा सकता है!

दिलीप कुमार सिंह –

प्रेसकॉन्फ्रेंस की मर्यादा और सोशल मीडिया का तमाशा: अब आत्ममंथन जरूरी
लोकतंत्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ सवाल-जवाब का मंच नहीं, बल्कि संवाद की एक बेहद गंभीर और मर्यादित प्रक्रिया होती है। लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ लोगों ने इसकी गरिमा को तार-तार करना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कुछ हुआ, वह इसी कड़वी सच्चाई का प्रमाण है।
प्रेस दीर्घा में हमेशा गंभीर और जिम्मेदार पत्रकारों को बुलाया जाता है, जो खबरों की नब्ज समझते हैं। लेकिन ‘फेमस’ होने की अंधी दौड़ और रील्स-लाइक्स के चक्कर में कुछ लोग किसी भी हद तक जाने लगे हैं। आज एक तथाकथित फेसबुकिया महिला पत्रकार ने जिस तरह का अशोभनीय व्यवहार किया, उसने न सिर्फ उस मंच की गरिमा को ठेस पहुंचाई, बल्कि वहां मौजूद तमाम पेशेवर पत्रकारों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। सवाल पूछने का एक सलीका और शालीनता होती है, जिसका उस महिला में पूरी तरह अभाव दिखा।
इस पूरी घटना का एक और डरावना पहलू यह रहा कि कुछ तथाकथित योगी-विरोधी पत्रकार इस वाकए का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने और ऐसी स्तरहीन हरकतों को सही ठहराने में जुट गए। विरोध अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक दुश्मनी या विरोध में इतना अंधा हो जाना कि एक गलत और शर्मनाक हरकत को बढ़ावा मिलने लगे—यह खुद पत्रकारिता की बिरादरी के साथ बड़ा विश्वासघात है।
यह घटना हम सबके लिए एक गंभीर चेतावनी है। अगर समय रहते पत्रकारिता के इस विकृत और सतही रूप पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में प्रेस की विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। गंभीर पत्रकारों और जिम्मेवार लोगों को अब इस पर खुलकर बोलने का समय आ गया है।


प्रभात त्रिपाठी- 

कल सवाल पूछने के नाम पर सुखिॅयो में आने वाली यह पत्रकार अब कल से लेकर जो बेखौफ तरह से लम्बी लम्बी जुबान चला रही है कि मै पांच साल से पत्रकारिता कर रही हूं तो समाज और सरकारे देखने वाले लोग कया करे। यह लगातार शोशल मीडिया इस्टा ट्यूटर में भाजपा काय॔कताॅओ ओर प्रवक्ता गोदी मीडिया के पत्रकार कहकर अब अपने बचाव में सभी पर आरोप लगा रही है इसे क्या एक अच्छा पत्रकार कहा जा सकता है ? कल से लगातार वीडियो डालकर विपक्ष को लगातार मुद्दा सरकार के खिलाफ देने का काम करके शोशल मीडिया की और खबरो में बने रहने का काम क्यो कर रही हो सिफ॔ सुखिया में रहने और किसी के पीछे से चलाये जाने वाले एजेण्डे को पूरा करने के लिये चिल्ला चिल्ला कर विलाप कर रही है।
एक तथा कतिथि बडें एजेण्डे में काम करने वाला बाहम्मण पत्रकार लगाता झूठा नेगेटिव प्रदेश की राजनीति और सरकार के खिलाफ गाने में लगा है।लगातार अफवाह और साजिस से अपने को दुनिया का एक मात्र सवाल उठाने वाला पत्रकार साबित करने में लगा है जिसे पीत पत्रकारिता का पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित करना चाहिए। पदमश्री अवार्ड तो नही मिलेगा यश भारतीय पुरूस्कार जरूर मिल सकता है। मै चिन्तित हूं पत्रकारिता का स्तर कहाॅ जा रहा है एजेण्डे के तहत झूठा नेरेटिव गढ कर करोड़ों रूपये का खेल लगातार चल रहा है जिसे समाज में बैठे लोगो को समझ कर इस तरह के वीडियो देखने अःआईगसे बचना चाहिए क्योकि एजेण्डा रहित नेरेटिव समाज को दूषित न कर सके।
अभिव्यक्त की आजादी की आड़ में एजेण्डा रहित पत्रकारिता का खेल शोशल मीडिया में चल रहा है यह खतरनाक खेल है इस पर सरकार रोक लगाये। देश की सुप्रीम कोई को भी सजग होना होगा कि झूठ का सहारा लेकर सुप्रीम कोटॅ में गलत तथ्य रखकर इन परजीवी बाहम्मण पत्रकार को राहत देकर उसे और गन्दगी फैलाने और किसी का चरित्र हनन करने की ताकत दे देती है। इस तरह के परजीवी एजेण्डा वाले पत्रकारो पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट का चाबुक चलना चाहिए जिससे यह गन्दगी जो अब संडाध और बदबूदार होने लगी है। जय हिंद जय भारत


प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल नहीं, शोर क्यों? माइक हाथ में होना पत्रकार होने का प्रमाण नहीं,

भाष्कर दुबे-

और माइक पर सबसे ऊंची आवाज होना पत्रकारिता की पहचान नहीं।पत्रकार वही है जिसकी खबर में तथ्य हो,
सवाल में धार हो और जनहित सबसे ऊपर हो माइक मिला तो चीखने लगे! पत्रकारिता की मर्यादा बचाने के लिए सरकार को अब लेना होगा बड़ा फैसला
लखनऊ।
मुख्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस का उद्देश्य सरकार से सवाल पूछना और जनता से जुड़े मुद्दों पर जवाब हासिल करना है, लेकिन यदि सवाल पूछने के बजाय कोई पत्रकार ऊंची आवाज में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे तो यह सिर्फ एक व्यक्ति के आचरण का मामला नहीं, बल्कि पत्रकारिता की गिरती मर्यादा पर गंभीर सवाल है।
हाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऐसा दृश्य देखने को मिला, जहां प्रश्न पूछने की अपेक्षा जोर-जोर से बोलकर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश ज्यादा दिखाई दी। सवाल यह है कि आखिर प्रेस कॉन्फ्रेंस पत्रकारिता का मंच है या अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अखाड़ा?विडंबना यह है कि वहां मौजूद कई वरिष्ठ पत्रकार भी इस पर सवाल उठाने के बजाय खामोश दिखाई देते हैं। जब पत्रकार ही पत्रकारिता की मर्यादा पर सवाल नहीं उठाएंगे तो फिर लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की विश्वसनीयता की रक्षा कौन करेगा?पत्रकारिता में आवाज नहीं, सवाल की ताकत मायने रखती है
सरकार से सवाल पूछना पत्रकार का अधिकार है। मुख्यमंत्री से तीखा सवाल हो सकता है, असहज सवाल हो सकता है और सरकार की नीति पर कठोर सवाल भी हो सकता है। लेकिन सवाल में तथ्य होना चाहिए, तर्क होना चाहिए और जनहित होना चाहिए।सिर्फ ऊंची आवाज में बोलना पत्रकारिता नहीं है।
किसी अधिकारी या सरकार पर आरोप लगा देना खबर नहीं है।सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर सनसनी पैदा कर देना भी खोजी पत्रकारिता नहीं है।पत्रकारिता की असली ताकत प्रमाण, तथ्य और सवाल की धार में है।सोशल मीडिया ने बढ़ाई चुनौती
YouTube, Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्मों ने पत्रकारिता को नई पहुंच दी है। आज कोई भी व्यक्ति अपनी बात हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।पिछले कुछ समय में ऐसी सामग्री की बाढ़ दिखाई दे रही है जिसमें सरकार, अधिकारियों और सार्वजनिक संस्थानों के खिलाफ गंभीर आरोप तो लगाए जाते हैं, लेकिन उनके समर्थन में पर्याप्त तथ्य या दस्तावेज दिखाई नहीं देते।सरकार की आलोचना लोकतंत्र में जरूरी है, लेकिन आलोचना और दुष्प्रचार के बीच की रेखा मिटनी नहीं चाहिए।
यदि किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप है तो दस्तावेज सामने रखे जाएं। यदि किसी सरकारी योजना में गड़बड़ी है तो प्रमाण के साथ सवाल उठाया जाए। यदि किसी निर्णय से जनता प्रभावित है तो उसके आंकड़े सामने रखे जाएं।आरोप जितना बड़ा हो, प्रमाण उतना ही मजबूत होना चाहिए।
सरकार बनाए स्पष्ट मीडिया प्रोटोकॉलऐसे माहौल में उत्तर प्रदेश सरकार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी मीडिया प्रोटोकॉल बनाने पर विचार करना चाहिए।मुख्यमंत्री आवास हो, सरकारी कार्यक्रम हो अथवा पार्टी कार्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस—मीडिया संस्थान और पत्रकार की पेशेवर पहचान का सत्यापन हो। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों के लिए भी स्पष्ट मानदंड तय हों। प्रेस कॉन्फ्रेंस में व्यवधान पैदा करने या लगातार मर्यादा भंग करने की स्थिति में आयोजकों के पास कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था हो।लेकिन इस व्यवस्था का उद्देश्य आलोचनात्मक पत्रकारिता को रोकना नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले पत्रकार और केवल शोर करने वाले व्यक्ति के बीच अंतर स्पष्ट करना होना चाहिए।
सरकार के सामने कठिन सवाल रखने वाले पत्रकारों का स्वागत होना चाहिए। सरकार की कमियां सामने लाने वाली खबरों का भी सम्मान होना चाहिए। लेकिन तथ्यहीन आरोप, व्यक्तिगत अभियान और जानबूझकर पैदा किया गया शोर पत्रकारिता का विकल्प नहीं बन सकता।वरिष्ठ पत्रकारों की भी जिम्मेदारी
सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन पत्रकारों की है जो वर्षों से पत्रकारिता में हैं और खुद को वरिष्ठ कहते हैं।
उन्हें तय करना होगा कि वे नई पीढ़ी को पत्रकारिता की कौन-सी परंपरा सौंपना चाहते हैं—सवालों की या शोर की?
यदि प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई व्यक्ति लगातार हंगामा करता है तो वरिष्ठ पत्रकारों को आयोजकों और अपने साथियों के सामने स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि पत्रकारिता की मर्यादा बनाए रखी जाए।क्योंकि पत्रकारिता में सबसे बड़ा सम्मान सबसे ऊंची आवाज वाले को नहीं, बल्कि सबसे सटीक सवाल पूछने वाले को मिलना चाहिए।अब समय है व्यवस्था सुधारने का उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया संवाद की पूरी व्यवस्था की समीक्षा करे। मीडिया संस्थानों की पहचान, पत्रकारों की पेशेवर स्थिति और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की विश्वसनीयता के लिए पारदर्शी मानक बनाए जाएं।जहां प्रमाणित रूप से कानून का उल्लंघन हो, वहां नियमानुसार कार्रवाई हो। लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने के कारण किसी पत्रकार की आवाज दबाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगा।सरकार मजबूत तब दिखती है जब वह सवालों से भागती नहीं, बल्कि सवालों का जवाब देती है।और पत्रकारिता मजबूत तब होती है जब वह सरकार की प्रशंसा से भी आगे बढ़कर सही समय पर सही सवाल पूछती है।आज जरूरत किसी की आवाज बंद करने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता में सवाल की आवाज बुलंद करने की है।
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