पत्र के माध्यम से प्रभात रंजन दीन ने बताया की अबकी बार वो भी हैं मान्यता समिति के अध्यक्ष पद के दावेदार

यह संघर्ष की शुरुआत का आवाहन है. संघर्ष मेरा स्वभाव है और उसी भाव से मैं खुद को आगे करता हूं और आपसे आगे आने को कहता हूं

उत्तर प्रदेश के मान्यता प्राप्त पत्रकार साथियो..!
पत्रकारीय आत्मसम्मान की स्थापना का मेरा सुर स्थायी है, यह मौसमी नहीं है. मित्रों के चेहरे वाली इस किताब (फेसबुक) पर मैं कभी अपनी व्यक्तिगत बातें नहीं लिखता, यह मंच सार्वजनिक सामाजिक मसलों पर बहस करने और निर्णय तक पहुंचने का कारगर मंच है, लिहाजा, अपनी विधा (पत्रकारिता) से जुड़े सार्वजनिक मसले पर आपसे मुखातिब होने के लिए इस सोशल-फोरम का इस्तेमाल कर रहा हूं. आज मान्यता प्राप्त पत्रकारों की समिति की तरफ से बैठक बुलाई गई थी. बहुत दिनों से मैं भी एनेक्सी प्रेस रूम नहीं जा पाया था. सारे साथियों से मिलने का मौका था, इसलिए वहां जाने से खुद को रोक नहीं सका. मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बीच का मैं एक साथी सदस्य हूं, लेकिन बैठक के बारे में कोई औपचारिक सूचना नहीं मिली थी. यही पीड़ा अपने ढेर सारे साथियों की भी थी. बैठक में 14 अप्रैल को हो रहे मान्यता समिति के चुनाव को लेकर सुझाव और शिकायतें सामने रखी गईं. कनिष्ठ पत्रकारों, वरिष्ठ पत्रकारों, गरिष्ठ पत्रकारों की रेखाएं तय होती रहीं और मैं सोचता रहा कि अब वह दौर भी आने वाला होगा जब अपने बीच बलिष्ठ पत्रकार भी संज्ञायित होगा… तो क्या कभी कर्तव्यनिष्ठ और नीतिनिष्ठ पत्रकार भी सम्मान के साथ खड़ा हो पाएगा और संबोधित हो पाएगा? यह समानान्तर प्रश्न मेरे दिमाग में कौंध ही रहा था कि सभा के संचालक साथी ने मेरा नाम भी घोषित कर दिया कि मैं भी दो मिनट में कुछ कहूं. मैंने एक मिनट में अपनी बात समेटी. साथियों को 1996 से लेकर 2004 तक के अपने अनुभव सामने रखे जब खबर पर वर्जन देने के लिए मुख्यमंत्री सीधे फोन पर मुखातिब होते थे. मुख्य सचिव और प्रमुख गृह सचिव या नियुक्ति सचिव की तो बात ही छोड़ दीजिए. सारे अधिकारियों के लिए यह जरूरी होता था कि शाम पांच बजे के बाद वे प्रेस के लिए खाली रहें. रात में नौ से दस बजे तक टेलीफोन पर वर्जन लेने का समय तय था, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम नौकरशाह तक टेलीफोन पर उपलब्ध होते थे. न किसी से समय लेना होता था न नेतागीरी या नौकरशाही का कोई छिछोरा आंडबर था. मान्यता प्राप्त पत्रकार पंचम तल पर बेरोक-टोक जा सकते थे और खबरें खोज सकते थे. प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखे सवाल पूछ सकते थे और कोई मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता या नौकरशाह पत्रकारों के साथ अमर्यादित व्यवहार करने का साहस नहीं कर सकता था. आज कोई भी पत्रकार मुख्यमंत्री तो छोड़िए किसी मंत्री या किसी वरिष्ठ नौकरशाह से खबर के सिलसिले में वर्जन के लिए सीधे बात नहीं कर सकता. प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई ‘अप्रिय’ सवाल पूछने पर नेता कैसे भड़कता है, इसे अब पूरा समाज देखता है. उन्हें भड़कने की औकात किसने दी? ऐसा क्या हुआ कि आज पत्रकारों की मान-मर्यादा इस धरातल पर आ गई? ऐसा क्या किया हमने कि हमारीप्रतिष्ठा सामान्य शिष्टाचारिक सम्मान पाने की हैसियत में भी नहीं रही? हमारे सामुदायिक प्रतिनिधियों ने भी सामूहिक-सारगर्भिता का कोई ख्याल नहीं रखा. अगर हमने अपनी सारगर्भिता के प्रति 

सजगता रखी होती तो क्या मुख्यमंत्री, मंत्री और संत्री की हिम्मत हो सकती है कि वह किसी भी पत्रकार के मान पर उंगली उठाए? सत्ता व्यवस्था क्या पत्रकारों की समवेत-शक्ति के आगे यह ‘स्पेयर’ कर सकती है कि पत्रकार-हित का कोई मसला उपेक्षित रह जाए और पत्रकार उसके लिए रिरियाए? सम्मान के मसले पर किसी भी मुख्यमंत्री, मंत्री और संत्री के खिलाफ ‘कम्प्लीट ब्लैक-आउट’ मैंने अपने जीवन में कई बार देखा है, किया है और सम्मान के संघर्ष में सक्रिय तौर पर सहभागी रहा हूं… क्या वही सम्मान हम फिर से हासिल कर पाएंगे? यह सवाल नहीं है, यह संघर्ष की शुरुआत का आवाहन है. संघर्ष मेरा स्वभाव है और उसी भाव से मैं खुद को आगे करता हूं और आपसे आगे आने को कहता हूं. मान्यता समिति के अध्यक्ष पद के लिए मैं प्रभात रंजन दीन अपना नाम अग्रसारित करता हूं. ऐसा करके आपके समक्ष मैं एक विकल्प प्रस्तुत कर रहा हूं… ताकि परिवर्तन चुनने में परिवर्तन-कामी और प्रतिष्ठा-हामी पत्रकार साथियों को कोई अड़चन महसूस न हो… 

आप सबको ढेर सारी शुभकामनाएं,

प्रभात रंजन दीन

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