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जब पत्रकारिता ने खुद को कटघरे में खड़ा किया, लोकभवन में लज्जा का लाइव टेलीकास्ट

आज लोकभवन के प्रेस रूम में वह दृश्य सामने आया, जिसे देखकर शब्द भी सिर झुका लें। जिन कंधों पर समाज ने चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी रखी, उन्हीं कंधों से जातीय कुंठा की बदबू फैलती दिखी। कलम जिन हाथों में सच लिखने के लिए होनी चाहिए थी, उन्हीं हाथों से अमर्यादित भाषा उछाली गई, वह भी जाति को निशाना बनाकर। यह पत्रकारिता नहीं, यह आत्मघाती तमाशा था।

लोकभवन का प्रेस रूम आज लोकतंत्र का मंदिर नहीं, बल्कि कुंठा का कुश्ती अखाड़ा बन गया। कलम, जो सवाल पूछने के लिए जानी जाती है, अचानक जाति तौलने का तराजू बन गई और ज़ुबान, जो सच बोलने की कसमें खाती है, ज़हर उगलने लगी। चौथा स्तंभ, जो सत्ता को आईना दिखाता है, खुद ही अपनी शक्ल देखकर मुंह छिपाने लगा। पत्रकारिता की आड़ में जातीय तंज ऐसे उछाले गए मानो संविधान कोई फुटनोट हो और मर्यादा प्रेस नोट से भी हल्की। माफी की जगह मांसल अहंकार दिखा, और लोकतंत्र शर्म से लाइव प्रसारण में सिर झुकाए खड़ा।

आज लोकभवन के प्रेस रूम में वह दृश्य सामने आया, जिसे देखकर शब्द भी सिर झुका लें। जिन कंधों पर समाज ने चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी रखी, उन्हीं कंधों से जातीय कुंठा की बदबू फैलती दिखी। कलम जिन हाथों में सच लिखने के लिए होनी चाहिए थी, उन्हीं हाथों से अमर्यादित भाषा उछाली गई, वह भी जाति को निशाना बनाकर। यह पत्रकारिता नहीं, यह आत्मघाती तमाशा था।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक जिला-मान्यता प्राप्त पत्रकार ने लोकभावन प्रेस रूम में उपस्थित साथियों के बीच जाति-विशेष को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। विरोध हुआ जोरदार, क्योंकि पत्रकार चाहे किसी भी पृष्ठभूमि से हो, उसकी पहचान जाति नहीं, उसकी दृष्टि होती है। लेकिन यहां दृष्टि धुंधली थी और भाषा जहरीली।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने सच कह दिया, जहां अधिकारों की गणना रुकती है, वहीं से पत्रकार का विवेक शुरू होता है, दुर्भाग्य यह कि विवेक की जगह वर्चस्व बोल रहा था। किसी ने सही कहा, जाति को गाली देने से जाति नहीं, बोलने वाला छोटा पड़ता है। इतिहास गवाह है कि अपशब्दों से प्रगति नहीं रुकती, बल्कि कुंठा उजागर होती है।

सोशल ग्रुप में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। बेहद निंदनीय, बिना शर्त सार्वजनिक माफी हो मैं भी वहां था,घटना मेरे सामने हुई, ये आवाज़ें बताती हैं कि मामला निजी नहीं, सार्वजनिक मर्यादा का है। कुछ ने नाम उजागर करने की मांग की, तो कुछ ने नियमों की याद दिलाई, लोकभवन में प्रवेश से लेकर मान्यता की सीमाएं तक। एक पत्रकार ने संकेत देते हुए कहा कि यह पत्रकार एक साप्ताहिक/पाक्षिक के संपादक है जो जिला मान्यता प्राप्त और सचिवालय पास पत्रकार है, यानि पात्रता की परतों में छिपा अहंकार है।

यह अमर्यादित शब्द किसी जाति की नहीं, पत्रकारिता की परीक्षा है। प्रेस रूम कोई जातीय अखाड़ा नहीं, लोकतंत्र की प्रयोगशाला है। यहां भाषा मर्यादा की होती है, विचार संवैधानिक और विरोध सभ्य। इसलिए मांग स्पष्ट है, सार्वजनिक माफी। नहीं तो विधिसम्मत कार्रवाई का रास्ता खुला है।

अंत में एक कड़वा सच यह भी है, जो जाति से बड़ा बनने की कोशिश करता है, वह पत्रकार नहीं, शोर मचाने वाला पात्र बन जाता है। कलम उठाइए, स्तर न गिराइए।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने वर्तमान हालात पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल के दिनों में पत्रकारों पर दर्ज हो रही एफआईआर और प्रशासनिक स्तर पर उत्पन्न हो रही असहज स्थितियों के लिए कुछ गैर-जिम्मेदार और तथाकथित पत्रकारों का आचरण भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। उनका कहना था कि मंत्री और अधिकारियों के समक्ष पत्रकारों की जो छवि धूमिल हो रही है, वह पत्रकारिता के मूल मूल्यों से भटके कुछ लोगों के कारण बनी है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता एक जिम्मेदारीपूर्ण पेशा है, जिसकी गरिमा अनुशासन, सत्यनिष्ठा और मर्यादा से जुड़ी होती है। यदि समय रहते आत्मसंयम और पेशेवर आचरण में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि प्रशासनिक कार्यालयों में पत्रकारों के प्रवेश को लेकर सख्त कदम उठाए जा सकते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार ने सभी पत्रकार साथियों से अपील की कि वे अपनी जिम्मेदारी को समझें, तथ्यपरक और मर्यादित पत्रकारिता को प्राथमिकता दें, ताकि लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तंभ की गरिमा बनी रहे और समाज में पत्रकारों के प्रति सम्मान और विश्वास सुदृढ़ हो सके।

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