आज लखनऊ हाईकोर्ट से विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे को बहुत बड़ा झटका।
कर्मेश प्रताप सिंह को अंतरिम राहत देते हुए मामले में विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दिया। मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी।
सौरभ सोमवंशी

कर्मेश प्रताप सिंह को अंतरिम राहत देते हुए मामले में विधानसभा अध्यक्ष और प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर दिया।
उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किया गया और छह दिन बाद, 19 जनवरी 2009 को विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार भी सौंप दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद-187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई। याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित पांचवें संशोधन पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर रखा ही नहीं गया और इन्हीं के आधार पर
दुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया गई जाता रहा। वर्ष 2011 में लागू की ‘सर्विस ट्रांसफर’ व्यवस्था को भी नियमों के विपरीत बताते हुए कहा गया है कि इसी के माध्यम से उनकी स्थिति नियमित करने का प्रयास किया गया। दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे। बाद में 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है। दुबे को प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार सिद्ध करने का निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट से क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है।
आज उत्तर प्रदेश के समाचार पत्र उस विधानसभा के प्रमुख सचिव की करगुजारियों से भरे पड़े हैं जहां से उत्तर प्रदेश के भाग्य का निर्धारण होता है।
उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि विधानसभा का प्रमुख सचिव अपने पद पर नियुक्ति को लेकर विवादों में है।
सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट Rreena N Singh ने उप्र विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में पद पर बने रहने की वैधता को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में याचिका के माध्यम से चुनौती दी है।उन्होंने याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से आरोप लगाया गया है कि दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक प्रविधानों के विपरीत है। वह बिना किसी वैध अधिकार के पद पर बने हुए हैं। सोमवार को जस्टिस जसप्रीत सिंह व जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ के सामने ज्यों ही याचिका प्रस्तुत हुई, जस्टिस सिंह ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया। उन्होंने निर्देश दिया कि याचिका को मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत कर किसी अन्य पीठ को नामित कराया जाए, जिसमें वह स्वयं सदस्य न हों। पीठ ने यही आदेश पारित कर मामले की सुनवाई स्थगित कर दी और नई पीठ के गठन के बाद इसे पुनः सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।विधानसभा अध्यक्ष के पूर्व सूचना अधिकारी रहे कर्मेश प्रताप सिंह का कहना है कि वर्ष 2009 में दुबे की नियुक्ति विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें)नियमावली, 1974 की अनदेखीकरते हुए की गई थी। नियमावली के अनुसार चयन श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय उनकी आयु इससे अधिक थी। दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उप्र न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली थी।उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त किया गया और छह दिन बाद, 19 जनवरी 2009 को विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का प्रभार भी सौंप दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद-187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई। याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित पांचवें संशोधन पर भी सवाल उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर रखा ही नहीं गया और इन्हीं के आधार परदुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया गई जाता रहा। वर्ष 2011 में लागू की ‘सर्विस ट्रांसफर’ व्यवस्था को भी नियमों के विपरीत बताते हुए कहा गया है कि इसी के माध्यम से उनकी स्थिति नियमित करने का प्रयास किया गया। दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके थे। बाद में 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है। दुबे को प्रमुख सचिव पद पर बने रहने का कानूनी अधिकार सिद्ध करने का निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट से क्वो वारंटो रिट जारी करने की मांग की गई है।क्वो वारंटी एक ऐसी रिट है जो किसी व्यक्ति को ऐसे सार्वजनिक पद पर कार्य करने से रोकने के लिए जारी की जाती है जिसके लिए वह हकदार नहीं है। याची ने विधानसभा सचिवालय सहकारी समिति से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं, कुछ कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न, मनमानी नियुक्तियों आदि का भी उल्लेख है। याची का आरोप है कि सूचना अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने कई सूचनाएं सार्वजनिक करने का प्रयास किया, जिसके कारण उन्हें प्रताड़ित कर फरवरी 2024 में सेवा से हटा दिया गया।क्वो वारंटों –अधिकार पृच्छा या“किस अधिकार से पद पर बैठे हो?”यह एक संवैधानिक रिट है, जिसके माध्यम से न्यायालय किसी व्यक्ति से पूछता है कि वह किसी सार्वजनिक पद (Public Office) पर किस कानूनी अधिकार या योग्यता के आधार पर कार्य कर रहा है।उदाहरणयदि किसी सरकारी पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति हो गई हो जो कानूनन उस पद के लिए पात्र नहीं है, तो कोई भी नागरिक न्यायालय में क्वो वारंटो रिट याचिका दायर कर सकता है।
उद्देश्यअवैध नियुक्तियों को चुनौती देना।सार्वजनिक पदों पर योग्य और विधिसम्मत नियुक्ति सुनिश्चित करना।प्रशासन में पारदर्शिता बनाए रखना।सरल भाषा में“आप इस सरकारी/सार्वजनिक पद पर किस अधिकार से बैठे हैं?” — यही क्वो वारंटो रिट का मूल अर्थ है।यह रिट Supreme Court of India और High Courts of India द्वारा जारी की जा सकती है।




उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य है कि विधानसभा का प्रमुख सचिव अपने पद पर नियुक्ति को लेकर विवादों में है।

