वकालत या पत्रकारिता, दोनों साथ नहीं, मान्यताएँ हों रद्द: सुप्रीम कोर्ट
बार काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, वकील और पत्रकार की दोहरी भूमिका व्यावसायिक कदाचार है। लेकिन सूचना विभाग को शायद कोर्ट के आदेशों से ज्यादा दबंग पत्रकारों की चमक दमक प्यारी है। अगर सूचना विभाग अब भी नहीं जागा तो कल प्रेस पास अपराधियों के पासपोर्ट बन जाएंगे। पत्रकारिता आस्था का नहीं, वसूली का धंधा बन जाएगी। अब वक्त आ गया है कि निदेशक सूचना ऐसे नकली पत्रकारों की मान्यता तत्काल निरस्त कर दें और इस पेशे की गरिमा बचाएं।
अधिवक्ता बनकर पत्रकारिता करना नियम विरुद्ध, तत्काल निरस्त हों मान्यताएँ
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद भी जारी नियमों की धज्जियाँ
लोक भवन की सुरक्षा पर सवाल, अधिवक्ताओं को पत्रकार मान्यता क्यों?
पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी, वकील साहब बने प्रेस के ठेकेदार
विधानसभा में सेंध, वसूली में रौनक, यही है मान्यता प्राप्त पत्रकारिता
सूचना विभाग जागे, नहीं तो प्रेस पास बनेंगे अपराधियों का पासपोर्ट
वी. एन. सिंह की रिपोर्ट
यह पत्रकारिता है या गुंडागर्दी, सवाल इसलिए क्योंकि राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में ऐसे लोग भी शान से बैठे हैं जो हाईकोर्ट में वकालत करते हैं और प्रेस रूम में दबंगई। सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के साफ आदेश,या तो वकालत करो या पत्रकारिता, को ठेंगा दिखाकर कुछ लोग दोहरी रोटी सेंक रहे हैं।
मामला अजय कुमार सेठ उर्फ ए.के. सेठ का है। यह सज्जन वकालत भी करते हैं और सूचना विभाग की मान्यता के दम पर पत्रकारिता का लबादा भी ओढ़े हुए हैं। गत माह विधानसभा सत्र में इनकी दबंगई चरम पर पहुंची, जब अपनी महिला मित्र को धोखे से पास दिलाकर सुरक्षा में सेंध लगा दी। दोनों अंदर बैठकर सत्र का कवरेज कर रहे थे। जब वरिष्ठ पत्रकारों ने विरोध किया तो साहब ने धमकी दे डाली,फर्जी मुकदमों में फंसा दूंगा। आखिर यही है मान्यता प्राप्त पत्रकार की ताकत!

एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं ए.के. सेठ पत्रकारिता नहीं करते, बल्कि पत्रकारिता का रुतबा दिखाकर करके सरकारी भवनों में मनमानी करते हैं। उसके पीछे वही बदनाम चेहरा है जिसे गत वर्ष ईंट भट्ठे पर वसूली करते जेल भेजा गया था। वही वसूलीबाज अब फिर से पत्रकारिता का लिबास पहनकर ए.के. सेठ और उनकी महिला मित्र के साथ सरकारी दफ्तरों में चहलकदमी करता दिखाई देता है। सवाल यह है,क्या सूचना विभाग ने ऐसे लोगों को मान्यता इसलिए दी है कि वे वसूली और दबंगई को पत्रकारिता का नाम दें।
बार काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, वकील और पत्रकार की दोहरी भूमिका व्यावसायिक कदाचार है। लेकिन सूचना विभाग को शायद कोर्ट के आदेशों से ज्यादा दबंग पत्रकारों की चमक दमक प्यारी है। अगर सूचना विभाग अब भी नहीं जागा तो कल प्रेस पास अपराधियों के पासपोर्ट बन जाएंगे। पत्रकारिता आस्था का नहीं, वसूली का धंधा बन जाएगी। अब वक्त आ गया है कि निदेशक सूचना ऐसे नकली पत्रकारों की मान्यता तत्काल निरस्त कर दें और इस पेशे की गरिमा बचाएं।
जेल की हवा खा चुके गालीबाज पत्रकार सुमंत शुक्ल ने सूचना निदेशक से की बत्तमीजी
मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के एक सदस्य नाम न छापने की शर्त पर उनका कहना है कि पत्रकारिता की आड़ में वकालत और वकालत की आड़ में पत्रकारिता,यह दोहरी दुकानदारी आखिर कब तक चलेगी? मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची में छिपे अधिवक्ताओं का खेल न सिर्फ नियमों की धज्जियां उड़ाता है बल्कि दोनों पेशों की गरिमा का मखौल उड़ाता है। सुप्रीम कोर्ट तक कह चुका है कि या तो कलम थामो या वकालतनामा, लेकिन जनाब को दोनों ही कुर्सियों पर विराजमान रहने का शौक है। सवाल यह है कि सूचना विभाग कब नींद से जागेगा और इस पेशेवर जुगलबंदी की मान्यता रद्द कर सख्त संदेश देगा? वरना पत्रकारिता और न्याय,दोनों ही हंसी का पात्र बनेंगे।
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कुछ वरिष्ठ पत्रकारों कहना है कि न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की स्पष्ट टिप्पणी के बाद भी प्रदेश में वकालत और पत्रकारिता का दोहरा खेल जारी रहना शासन और विभागीय लापरवाही का प्रमाण है। यह केवल व्यावसायिक कदाचार ही नहीं, बल्कि दोनों पेशों की गरिमा पर प्रहार है। अजय कुमार सेठ जैसे अधिवक्ताओं को राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार बनाना न केवल सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि शासन की पारदर्शिता पर भी गहरी चोट है। विभाग को तत्काल संज्ञान लेकर ऐसी मान्यताओं को निरस्त करना चाहिए।
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पत्रकारिता या वसूली का धंधा
राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची अब पत्रकारिता से ज्यादा दबंगई और वसूली का चार्ट लगती है। मिसाल है अजय कुमार सेठ उर्फ ए.के. सेठ। साहब दिन में वकालत करते हैं, रात में प्रेस पास का सिक्का चलाते हैं। सुप्रीम कोर्ट और बार काउंसिल कहे चाहे, पर इनके लिए कानून सिर्फ कागज पर है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती , एक वसूलीबाज तथाकथित पत्रकार से भी जुड़ी है जिसे ईंट भट्ठे से वसूली करते जेल भेजा गया था। आज वही फिर से प्रेस पास का कवच पहनकर सरकारी दफ्तरों में शान से घूम रहा है।
सवाल बड़ा है क्या सूचना विभाग ने मान्यता इसलिए दी है कि वकील साहब और उनकी टोली पत्रकारिता के नाम पर वसूली और दबंगई का खेल खेलें? अगर अब भी कार्रवाई न हुई तो प्रेस पास अपराधियों का पासपोर्ट बन जाएगा। वक्त है कि ए.के. सेठ जैसे नकली पत्रकारों की मान्यता तत्काल रद्द कर पत्रकारिता की गरिमा बचाई जाए।


