पत्रकारों पर हमला नहीं, सत्ता की सरपरस्ती में सच की सुपारी है
सत्ता की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध, जिस प्रदेश में पत्रकारों को राजधानी में इस तरह उठाकर पीटा जा सकता है, वहाँ कानून-व्यवस्था की रीढ़ टूटी नहीं,टकसाल की तरह कुचली जा चुकी है। सरकार की चुप्पी इस पूरे कृत्य को और अधिक संदिग्ध बनाती है। ऐसा लगता है जैसे हमलावरों का मनोबल किसी अदृश्य सुरक्षा-कवच से मजबूत किया गया हो।
भड़ास4जर्नलिस्ट डेस्क
लखनऊ में घटित पत्रकार सुशील अवस्थी पर जानलेवा हमला न सिर्फ एक आपराधिक वारदात है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा और निर्मम प्रहार है। यह घटना साफ इशारा करती है कि प्रदेश में सच लिखने वालों की सुरक्षा रामभरोसे है और सत्ता का मौन किसी खतरनाक सहमति जैसी गूंज रहा है।
राजधानी में राज्य-मान्यता प्राप्त कैमरामैन सुशील अवस्थी को घर से फोन कर बाहर बुलाया गया, फिर योजनाबद्ध तरीके से कार में बैठाकर इस कदर पीटा गया कि वे मरणासन्न अवस्था में पहुंच गए। हमलावरों ने जाते-जाते चेतावनी दी कि यदि उन्होंने दोबारा किसी बड़े नेता या उसके बेटे के खिलाफ कुछ लिखा-बोला, तो अगली बार सीधे जान ले लेंगे। यह केवल धमकी नहीं,सत्ता-संरक्षित गुंडागर्दी का खुला प्रदर्शन है।
सत्ता की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध, जिस प्रदेश में पत्रकारों को राजधानी में इस तरह उठाकर पीटा जा सकता है, वहाँ कानून-व्यवस्था की रीढ़ टूटी नहीं,टकसाल की तरह कुचली जा चुकी है। सरकार की चुप्पी इस पूरे कृत्य को और अधिक संदिग्ध बनाती है। ऐसा लगता है जैसे हमलावरों का मनोबल किसी अदृश्य सुरक्षा-कवच से मजबूत किया गया हो।
पत्रकार संगठनों की बेहोशी,घटना के बाद पत्रकार संगठनों से जिस तेज प्रतिक्रिया की उम्मीद थी, वह कहीं दिखाई नहीं दी। मानो वे विज्ञापन-कोमा में पड़े हों न निंदा, न ज्ञापन, न सड़क पर विरोध। यह खामोशी पत्रकारिता की आत्मा पर सबसे बड़ा तमाचा है।
निदेशक सूचना विशाल सिंह ने तत्काल लिया संज्ञान
यह गंभीर घटनाक्रम सोशल मीडिया और पत्रकार जगत में तीव्रता से चर्चा का विषय बना हुआ है।
सुदर्शन न्यूज़ चैनल के राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त छायाकार श्री सुशील अवस्थी जी को कल धोखे से घर से बुलाकर गाड़ी में बैठाया गया, जहां कुछ असामाजिक तत्वों ने उन्हें जान से मारने की नीयत से बेरहमी से पीटा और मरणासन्न अवस्था में उनके घर के निकट छोड़कर धमकी देते हुए फरार हो गए। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि सोशल मीडिया पर उनके नेता के खिलाफ कोई टिप्पणी की गई तो परिणाम जानलेवा होंगे। यह घटना थाना मानक नगर, लखनऊ क्षेत्र की है।इस संवेदनशील मामले की जानकारी जब माननीय निदेशक सूचना महोदय को दी गई, तो उन्होंने तत्काल संज्ञान लेकर उच्च अधिकारियों से इस प्रकरण में शीघ्र कार्रवाई हेतु निवेदन किया। उनके प्रयास का ही परिणाम है कि पुलिस प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ और कार्रवाई प्रारंभ की गई।
सोशल मीडिया पर आग, और मैदान में सन्नाटा
सुशील अवस्थी की चोटों की तस्वीरें व वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, पत्रकार समुदाय गुस्से में है, लेकिन प्रशासन की कार्रवाई अब तक कछुआ-गति से भी धीमी है। लोग पूछ रहे हैं, क्या पुलिस भी किसी दबाव में है? यह शक अब आरोप बनता जा रहा है और आरोप अब खुले सवालों में बदल चुका है।
मुख्य मांगें,पत्रकार जगत की एकजुट आवाज
पत्रकारों ने एक स्वर में कहा है कि, हमलावरों की तत्काल गिरफ्तारी की जाए। इस घटना की हाई-लेवल जांच हो। पीड़ित पत्रकार को सरकारी सुरक्षा व सर्वोत्तम इलाज मुहैया कराया जाए। लखनऊ में सभी पत्रकार संगठन आपात बैठक कर विरोध-कार्यक्रम तय करें।
यह हमला व्यक्ति पर नहीं,पत्रकारिता पर है
यह मामला सिर्फ सुशील अवस्थी का नहीं। यह पत्रकारिता की रीढ़, अभिव्यक्ति की आज़ादी, लोकतंत्र की सांस पर वार है। जो पत्रकार सत्ता से सवाल नहीं पूछते, जो हमेशा सेटिंग-मोर्चा में रहते हैं,आज वे भी डरे हुए हैं क्योंकि यह हमला बताता है कि सत्ता-समर्थन भी अब सुरक्षा की गारंटी नहीं।
चेतावनी,यदि आज चुप रहे तो कल कोई आवाज़ नहीं बचेगी
यह घटना सिर्फ खबर नहीं,चेतावनी है।पहले वे आए दूसरों के लिए,मैं चुप रहा,फिर वे आए मेरे लिए और तब तक कोई नहीं बचा था। लखनऊ की यह घटना उसी कविता की जीवित हकीकत बन चुकी है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह हमला एक अपराध नहीं,पत्रकारों को दी गई सरकारी-सरंक्षित सूचनात्मक धमकी माना जाएगा।

सोशल मीडिया पर आग, और मैदान में सन्नाटा

