जब कलमकारों ने छोड़ दी भाषा की मर्यादा, लखनऊ का एनेक्सी मीडिया सेंटर बना अखाड़ा
एनेक्सी मीडिया सेंटर में यह पहला मामला नहीं है। कभी-कभी शब्दों के ओलों की बौछार ऐसी होती है कि बाहर बैठे अफसर दबी जुबान में कहते हैं, जब बुद्धिजीवी यही कर रहे हैं, तो फिर आम जनता किससे उम्मीद करे ?
पत्रकारिता के मंदिर में जूते-चप्पल की आरती
कलम के धुरंधरों ने दिखाया नया एंगल बहस नहीं, बौछार अब जूतों की
कलम के धुरंधरों ने दिखाया नया एंगल,बहस नहीं, बौछार अब जूतों की
एनेक्सी में खुद हेडलाइन बन गए पत्रकार, शब्दों की जगह अब उड़ रहे जूते और संवादों की जगह विवाद
जब पत्रकारिता शर्मसार हुई सवालों से नहीं जूतों से निकली अमर्यादा
भड़ास 4 जर्नलिस्ट डेस्क
कल तक पत्रकार खबर लिखते थे।
आज खुद खबर बनते दिख रहे हैं।।
जूते चल रहे हैं, और लोकतंत्र पूछ रहा है।
क्या यही है वो चौथा स्तंभ जिस पर देश खड़ा है।।
यह है उत्तर प्रदेश लखनऊ की पत्रकारिता जिसे कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, अब उसी स्तंभ पर दरारें पड़ती दिख रही हैं। एनेक्सी मीडिया सेंटर में गत दिनों वह मंजर देखने को मिला जिसे देखकर कलम भी शर्मसार हो गई।
दो वरिष्ठ पत्रकारों के बीच बातों-बातों में हंसी-मजाक शुरू हुआ, लेकिन यह हंसी धीरे-धीरे ज्वालामुखी बन गई। पहले शब्दों के तीर चले, फिर अपशब्दों की गोलाबारी हुई और देखते ही देखते दोनों सज्जन कलम छोड़कर जूते निकाल बैठे।
अगर सीनियर पत्रकार बीच में न आते तो शायद एनेक्सी की फर्श पर लोकतंत्र का ब्रेकिंग न्यूज खून के छींटों के साथ लिखा जाता।
वहां मौजूद पत्रकारों ने किसी तरह दोनों को अलग किया, मगर जो दृश्य छूट गया, वह पत्रकारिता की आत्मा को घायल कर गया।
यह वही पत्रकार हैं जिन्हें समाज बुद्धिजीवी वर्ग कहता है। कहा जाता है कि जब बाकी सब सोचना बंद कर देते हैं, तब पत्रकार सोचना शुरू करते हैं। लेकिन अब सवाल उठता है, जब यही सोचने वाले जूते चलाने लगें, तो समाज दिशा मांगे किससे ?
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एनेक्सी मीडिया सेंटर में यह पहला मामला नहीं है। कभी-कभी शब्दों के ओलों की बौछार ऐसी होती है कि बाहर बैठे अफसर दबी जुबान में कहते हैं, जब बुद्धिजीवी यही कर रहे हैं, तो फिर आम जनता किससे उम्मीद करे ?
एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, अब पत्रकारिता सवाल पूछने की जगह, एक-दूसरे से हिसाब चुकाने का मैदान बनती जा रही है। उनका कहना है कि अगर यह प्रवृत्ति नहीं रुकी, तो समाज का चौथा स्तंभ जल्द ही गिरता हुआ खंडहर बन जाएगा।
पत्रकारों की कलम ने कभी देश को आज़ादी दिलाई थी, पर आज वही कलम अपशब्दों और आक्रोश की धूल में खोती जा रही है। वरिष्ठों को चाहिए कि इस गिरावट पर अंकुश लगाएं, ताकि पत्रकारिता की गरिमा फिर से लौट सके, वरना आने वाली पीढ़ियां कहेंगी, जहां खबरें बनती थीं, अब वहां झगड़े छपते हैं।
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…जब पत्रकारों ने कलम छोड़ी, तब जूतों ने संभाली अपनी जिम्मेदारी
कभी कलम से आग उगलने वाले पत्रकार अब जूतों की रफ्तार से सुर्खियां बना रहे हैं। एनेक्सी मीडिया सेंटर में जो कुछ हुआ, उसने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव हिला दी। जहां कभी विचारों की भिड़ंत होती थी, अब वहां जूतों की बौछार और अपशब्दों की आतिशबाज़ी हो रही है। दो वरिष्ठ पत्रकारों के बीच के बीच बहस इस कदर गर्माई कि संवाद की जगह संग्राम और पत्रकारिता का मंच अखाड़ा बन गया। पहले बहस, फिर बरसात वो भी शब्दों की नहीं, जूतों की। कहते हैं कलम में ताकत होती है, पर एनेक्सी में ताकत का प्रदर्शन किसी और ब्रांड से हुआ। मौजूद पत्रकारों ने किसी तरह बीच-बचाव किया, लेकिन लोकतंत्र का चेहरा उस दिन धूल में लथपथ हो गया। अफसरों ने दबी जुबान में कहा, जब खबर लिखने वाले ही खबर बन जाएं, तो समाज किससे उम्मीद करे? एक वरिष्ठ पत्रकार ने व्यंग करते हुए कहा अब प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, प्रेस कॉम्बैट चल रहा है।
