Trending

पुलिस के मनोवैज्ञानिक रणनीति के आगे सुदर्शन चैनेल के ब्यूरो हेड ने घुटने टेक पत्रकारों के आन्दोलन को किया ढेर

वकीलों की एकता से सीखने की नसीहत देते हुए भी ये पत्रकार अपने ही पेशे की इज्जत का टॉफी रैपर तक न बचा पाए। पुलिस क्या सेंध लगाएगी, आंदोलन में तो दरार अपने ही लोगों ने डाल दी।

दो पत्रकारों ने पुलिस की मौखिक काउंसलिंग में आकर आंदोलन में ही लगा दी सेंध 

दो मिनट की गद्दारी, लखनऊ आंदोलन में पुलिस नहीं, पत्रकार ही पिघले

राजभवन पर बैरिकेड, आंदोलन में ब्रेक, दो पत्रकारों ने पूरी लड़ाई ऑफ-एयर कर दी

सुदर्शन चैनेल के ब्यूरो हेड रजत मिश्रा

यह आंदोलन था सुशील अवस्थी को न्याय दिलाने का, पर सुदर्शन चैनल के ही ब्यूरो हेड रजत मिश्रा और एक साथी पत्रकार ने पुलिस के इशारे पर विरोध से ही मुक्ति ले ली। जिन कंधों पर एकता का झंडा होना चाहिए था, वहीं चैनल की वफादारी का बोझ लटकता दिखा। नतीजा अपराधियों से कम, दो पत्रकारों की रणनीति से ज्यादा चोट पहुँची आंदोलन को, सड़क पर खड़े सैकड़ों पत्रकार न्याय की लड़ाई लड़ रहे थे, और दो साथी उसी लड़ाई में छेद कर रहे थे। वकीलों की एकता से सीखने की नसीहत देते हुए भी ये पत्रकार अपने ही पेशे की इज्जत का टॉफी रैपर तक न बचा पाए। पुलिस क्या सेंध लगाएगी, आंदोलन में तो दरार अपने ही लोगों ने डाल दी। जिस दिन पत्रकारों को अपराधियों से नहीं, अपने ही दो साथियों की निष्ठा से खतरा महसूस होने लगे समझिए लड़ाई सड़क पर नहीं, अंदर से हारने लगी है।

घायल पत्सुरकार शील अवस्थी

लखनऊ की सड़कों पर आज पत्रकार उतरे तो थे न्याय की लड़ाई लड़ने, पर लौटे अपने ही दल के झगड़े समेटकर, सुदर्शन चैनल के पत्रकार सुशील अवस्थी उर्फ राजन पर हुए हमले के चार दिन बाद भी पुलिस की गिरफ्तारी सिर्फ फाइलों में ही दौड़ रही है, जमीन पर नहीं, गांधी प्रतिमा पर जुटे सैकड़ों पत्रकारों को उम्मीद थी कि आज सिस्टम हिलेगा,लेकिन पहले तो दो पत्रकारों ने आंदोलन की जमीन ही हिला दी।

दो घंटे तक सीपी का इंतजार हुआ, पर पुलिस का हम आएंगे, वाला रूटीन आज भी कायम रहा। पत्रकार सीएम आवास की ओर बढ़े, पुलिस ने रोका, फिर भी जत्था राजभवन तक पहुंच गया। सड़क जाम होने लगा, तो पत्रकारों ने खुद सड़क छोड़कर जनता को रास्ता दिया,मतलब विरोध भी, और संस्कार भी। पर असली मज़ा तो राजभवन कॉलोनी चौराहे पर शुरू हुआ। पुलिस ने बैरिकेड लगा दिए, पत्रकार जमीन पर बैठ गए। एसीपी-डीसीपी आए, समझाया, मनाया, पर पत्रकारों ने साफ कह दिया, न्याय चाहिए, नौटंकी नहीं। तभी पुलिस ने अपनी मनोवैज्ञानिक रणनीति चलाई और चमत्कार हो गया,भीड़ नहीं, दो पत्रकार पिघल गए।

पत्रकारों पर हमला नहीं, सत्ता की सरपरस्ती में सच की सुपारी है

एक थे सुदर्शन चैनल के ब्यूरो चीफ रजत मिश्रा, दूसरे के. विश्वदेव राव। पुलिस ने इन दोनों पर ऐसा असर डाला कि उन्होंने खुद ही आंदोलन को समेटने का काम शुरू कर दिया। वरिष्ठ पत्रकार प्रभात त्रिपाठी तक को उठने की सलाह देकर दोनों ने आंदोलन नहीं, पूरी एकता की रीढ़ तोड़ दी। जहाँ पूरा प्रेस समाज एक साथी पत्रकार पर हुए हमले का न्याय मांग रहा था, वहीं दो पत्रकारों ने पुलिस की मौखिक काउंसलिंग में आकर आंदोलन में ही सेंध लगा दी। मौके पर बहसबाजी, नाराज़गी और तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। वरिष्ठ पत्रकारों को बीच में आकर समझौता कराना पड़ा। आज की लड़ाई पुलिस की नाकामी से ज़्यादा पत्रकारों की आंतरिक राजनीति की वजह से सुर्खियों में रही। कहते हैं,वकील एकता से लड़ते हैं। और पत्रकार और हर चैनल अपनी TRP से।

Loading...
loading...

Related Articles

Back to top button