साईकल हॉकर से विदेशी यात्राओं और करोड़ो की संपत्ति का तिलस्मी खज़ाना (भाग-1)

इन सभी समाचार पत्र हेतु एक ही संपादक और मात्र 2 से 4 लोगों की टीम के द्वारा किस तरह से संचालित किया जाता है और संपादकीय दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण संपादन जिस सुचारू रूप से किया जाता है इसके हर पहलू और खबरों का अध्ययन करके युवा पत्रकार जो अपनी आंखों में पत्रकारिता क्षेत्र में ग्लैमर का सपना सजाए हैं उसको प्राप्त कर सकते है। कामयाबी की मंजिल तो प्राप्त हो जाएगी लेकिन इस सफर में आने वाली परेशानियां भी बहुत है ऐसा नहीं है कि समाचार पत्र निष्पक्ष दिव्य संदेश के लिए यह सफर बहुत आसान था, गलत और झूठी खबरों के आधार पर प्रेस काउंसिल आफ इंडिया ने समाचार पत्र पर सेंसरशिप लागू करने का आदेश जारी किया परंतु अपने योग्य और परिश्रम से समाचार पत्र आगे बढ़ता जा रहा है और ऐसी ऐसी खबरों को लगाता है कि उसकी मांग पाठको में बढ़ती जा रही है।

निष्पक्ष दिव्य संदेश – सिलसिलेवार,भाग 1

फर्श से राजसी ठाठ-बाठ और ग्लैमर की पूरी संघर्ष गाथा

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र निष्पक्ष दिव्य संदेश का विवादों से गहरा नाता रहा है। कभी किसी वरिष्ठ पत्रकार को ठग बताना या किसी पत्रकार संगठन के विरुद्ध अनाप-शनाप खबरों को लिखना या प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ लगातार खबरों को चलाने के बाद खबरों को गायब कर देना ये मामूली बात दिखती है। एक कुलपति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध लगातार खबरे चलाने वाला अखबार उनके हाथों में अखबार की प्रतियां थमा कर सोशल मीडिया पर तस्वीरें प्रचारित करते हुए कौन सी पत्रकारिता का संदेश देना चाहता था ये उसकी मालियत देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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समाचार जगत या मीडिया व्यवसाय को संघर्षपूर्ण बताने वाले अन्य मीडिया कर्मियों को निष्पक्ष दिव्य संदेश या तिजारत जैसे सफल मीडिया घराने से बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है जहां ED, EOW, इनकम टैक्स और जीएसटी जैसे विभाग के आला अधिकारी भी सर पटकने के बाद कुछ नहीं पाते हैं वहीं मात्र कुछ वर्षों में कामयाबी और राजसी ठाठ बाट का ये परचम न सिर्फ बड़े संघर्ष और तपस्या से हासिल किया गया है बल्कि उसके पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प और मजेदार है।
इस कामयाबी की तपस्या के हर पहलू, हर कदम का बड़ी बारीकी से अध्ययन करने के बाद ऐसे आश्चर्यजनक खुलासे हुए हैं जिनका अनेक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पढ़ने वाले छात्रों को गहनता से न सिर्फ अध्ययन करना चाहिए बल्कि प्रशिक्षण कार्यक्रम में ऐसे समाचार पत्र जिनकी कामयाबी का डंका और निष्पक्ष पत्रकारिता का बैंड बज रहा हो उस पर रिसर्च करना चाहिए।

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मीडिया क्षेत्र में रोजगार के घटते अवसर को देखते हुए समाचार घरानों द्वारा जहां प्रसार संख्या कम।की जा रही हों, अखबार बंद हो रहे हों वहां उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दो दो दैनिक समाचार पत्र जिनकी प्रचार संख्या 30000 से ऊपर है का सफलतापूर्वक प्रसारण और प्रकाशन कराया जा रहा है, यह शोध का विषय है और यही नहीं एक साप्ताहिक समाचार पत्र भी निकाला जा रहा है जो आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय प्रतीत होता है। अखबारी कागज़ों और छपाई में होने वाले खर्चो का तुलनात्मक ब्यौरा निकाला जाए तो प्रतिदिन के खर्चे ही लाखों में होते होंगे, लेकिन इस सबको किस तरह से मैनेज किया गया यही तो सीखना सीखाना होगा।

इनसे मिलिए ये हैं बीबीसी के पूर्व सवाददाता, गोमती नगर…

इन सभी समाचार पत्र हेतु एक ही संपादक और मात्र 2 से 4 लोगों की टीम के द्वारा किस तरह से संचालित किया जाता है और संपादकीय दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण संपादन जिस सुचारू रूप से किया जाता है इसके हर पहलू और खबरों का अध्ययन करके युवा पत्रकार जो अपनी आंखों में पत्रकारिता क्षेत्र में ग्लैमर का सपना सजाए हैं उसको प्राप्त कर सकते है।

कामयाबी की मंजिल तो प्राप्त हो जाएगी लेकिन इस सफर में आने वाली परेशानियां भी बहुत है ऐसा नहीं है कि समाचार पत्र निष्पक्ष दिव्य संदेश के लिए यह सफर बहुत आसान था, गलत और झूठी खबरों के आधार पर प्रेस काउंसिल आफ इंडिया ने समाचार पत्र पर सेंसरशिप लागू करने का आदेश जारी किया परंतु अपने योग्य और परिश्रम से समाचार पत्र आगे बढ़ता जा रहा है और ऐसी ऐसी खबरों को लगाता है कि उसकी मांग पाठको में बढ़ती जा रही है।
आखिर कैसे बढ रहा है ये कामयाबी का सफर, कहा से होती है प्रतिदिन लाखो रुपये की भरपाई, GST के दायरे को कैसे पूरा किया जाता है, कागज़ों की खरीद और अखबार की बिक्री का मंत्र और तंत्र अगली कड़ी में।

भाग 2
मीडिया घराने की कराड़ों की कामयाबी और सफलता के पीछे महिला नहीं पुरुष का है कमाल

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